श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 18.19

मूल श्लोक :

ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः
प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

गुणसंख्यान (गुणोंके सम्बन्धसे प्रत्येक पदार्थके भिन्नभिन्न भेदोंकी गणना करनेवाले) शास्त्रमें गुणोंके भेदसे ज्ञान और कर्म तथा कर्ता तीनतीन प्रकारसे ही कहे जाते हैं? उनको भी तुम यथार्थरूपसे सुनो।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

आगामी श्लोकों में विवेच्य विषय को यहाँ केवल सूचित किया गया है। चतुर्दश अध्याय में प्रकृति के सत्त्व? रज और तम इन तीन गुणों के लक्षण? व्यापार एवं प्रभाव का विस्तृत वर्णन किया गया था। इन तीन गुणों में से किसी एक के आधिक्य के कारण अथवा इनके विभिन्न अनुपात में संयोग से? या फिर इनके प्राधान्य के क्रमपरिवर्तन के कारण ही विभिन्न व्यक्तियों के स्वभाव तथा कार्यों में इतना वैचित्र्य दिखाई देता है। इतना ही नहीं? अपितु किसी एक व्यक्ति के जीवन में भी समयसमय पर इन गुणों के कारण परिवर्तन होता रहता है।यहाँ गुणसंख्याने शब्द से कपिल मुनि जी का सांख्यशास्त्र अभिप्रेत है। सांख्य दर्शन में त्रिगुणों के व्यापार का विशेष वर्णन किया गया है। यथावत् का अर्थ है यथान्याय और यथाशास्त्र? अर्थात् शास्त्र और युक्ति से युक्त। अर्जुन तो उपदेश का श्रवण कर ही रहा था? तथापि शृणु कहने का अर्थ यह प्रतीत होता है कि भगवान् चाहते हैं कि अर्जुन आगे के विषय को विशेष ध्यान देकर सुने। विवेच्य विषय का विशेष महत्त्व है।सर्वप्रथम त्रिविध ज्ञान बताते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Knowledge, action and actor are declared in the science of the Gunas (Sankhya philosophy) to be of three kinds only, according to the distinction of the Gunas. Of these also, hear duly.

Transliteration

jñānaṃ karma ca kartā ca tridhaiva guṇabhedataḥ
procyate guṇasaṅkhyāne yathāvacchṛṇu tānyapi

अनुवाद

ज्ञान, कर्म और कर्ता भी गुणों के भेद से तीन-तीन प्रकार के ही कहे गए हैं, गुणों की संख्या करने वाले शास्त्र (सांख्य शास्त्र) में; तुम उनको भी भलीभाँति सुनो

भावार्थ

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज और तम) के प्रभाव के कारण ज्ञान, कर्म और कर्ता भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं। सांख्य दर्शन में इसका विस्तार से वर्णन किया गया है। अब श्रीकृष्ण अर्जुन को इन तीनों के भेदों को विस्तार से समझाने जा रहे हैं ताकि वह इनके वास्तविक स्वरूप को समझ सके।

Translation

Knowledge, action, and the doer are also declared to be of three kinds, according to the distinction of the three guṇas in the science of the guṇas; hear of these also as they are

Meaning

Lord Krishna explains to Arjuna that knowledge, action, and the performer of action are each classified into three types based on the influence of the three modes of material nature (guṇas). This classification is detailed in the Saṅkhya philosophy, which analyzes the constituents of nature. Krishna invites Arjuna to listen carefully to the distinctions of these three elements.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
ज्ञानम्ज्ञान
कर्मकर्म
चऔर
कर्ताकर्ता (करने वाला)
चभी
त्रिधातीन प्रकार का
एवही
गुण-भेदतःगुणों के भेद से
प्रोच्यतेकहा जाता है
गुण-संख्यानेगुणों की संख्या करने वाले शास्त्र (सांख्य शास्त्र) में
यथावत्भलीभाँति / जैसा है वैसा ही
शृणुसुनो
तानिउनको
अपिभी

Word by word

WordMeaning
jñānamknowledge
karmaaction
caand
kartāthe doer
caalso
tridhāof three kinds
evaonly
guṇa-bhedataḥaccording to the distinction of the guṇas
procyateis declared
guṇa-saṅkhyānein the science of the guṇas (Sankhya philosophy)
yathāvatas they are / duly
śṛṇuhear
tānithem
apialso