Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 18.18
मूल श्लोक :
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
ज्ञान? ज्ञेय और परिज्ञाता -- इन तीनोंसे कर्मप्रेरणा होती है तथा करण? कर्म और कर्ता -- इन तीनोंसे कर्मसंग्रह होता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
कर्म के स्वरूप का युक्तियुक्त विवेचन करते हुए? भगवान् श्री कृष्ण ने कर्म के सम्पादन के पाँच कारणों का वर्णन किया है तथा उनसे भिन्न अकर्ता आत्मा का भी निर्देश किया है। उसी विषय का विस्तार करते हुए? अब वे कर्म के त्रिविध प्रेरक तथा जिससे कर्म संभव होता है वह त्रिविध कर्म संग्रह बताते हैं।प्रत्येक कर्म का प्रेरक है? विषय ज्ञान। इस ज्ञान की सिद्धि के लिए जिन तीन तत्त्वों की आवश्यकता होती है? वे हैं ज्ञाता? ज्ञेय अर्थात् ज्ञान का विषय तथा ज्ञान अर्थात् जानने की क्रिया से प्राप्त हुआ ज्ञान। ज्ञाता? ज्ञेय और ज्ञान इन तीनों को वेदान्त की शब्दावली में त्रिपुटी कहते हैं। इन तीनों के संबंध से ही कर्म के प्रवर्तक विषय का ज्ञान होता है।कर्म की प्रेरणा तीन प्रकार से हो सकती है (1) ज्ञाता के मन में उत्पन्न हुई इच्छा के रूप में? या (2) ज्ञेय वस्तु के प्रलोभन से? अथवा (3) पूर्वानुभूत भोग (ज्ञात सुख) की स्मृति से। इन तीनों के अतिरिक्त कर्म का प्रेरक अन्य कोई कारण नहीं है।अन्तकरण में कर्म की प्रेरणा उत्पन्न होने के पश्चात् उसको पूर्ण करने के लिए कर्ता? करण और कर्म नामक त्रिपुटी की आवश्यकता होती है? जिसे यहाँ त्रिविध कर्मसंग्रह कहा गया है। कामना से प्रेरित जीव कर्म के क्षेत्र में कर्तृत्वाभिमान (मैं कर्ता हूँ) के साथ प्रवेश करता है। यहाँ जीव कर्ता कहलाता है। यह कर्ता जीव जिस फल या लक्ष्य की कामना करता है? उसे यहाँ कर्म शब्द से इंगित किया गया है। यहाँ कर्म का तात्पर्य फल से है।कर्ता जीव को फल (कर्म) प्राप्त करने के लिए क्रिया करनी पड़ती है। क्रिया के ये साधन करण कहे जाते हैं? जिनमें ज्ञानेन्द्रियाँ? कर्मेन्द्रियाँ तथा मन बुद्धि का भी समावेश है। इस प्रकार? कर्ता? कर्म और करण ये कर्म की त्रिपुटी अथवा कर्मसंग्रह कहे जाते हैं।इन तीनों में से किसी एक के भी अभाव में कर्म संभव नहीं हो सकता।समस्त जगत् त्रिगुणात्मिका प्रकृति का कार्य है। इसलिए? ज्ञान? कर्म और कर्ता में भी त्रिगुणों के कारण त्रिविध भेद उत्पन्न होते हैं? जिनका? अब वर्णन किया जायेगा। भगवान् कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Knowledge, the knowable and the knower form the threefold impulse to action; the organ, the action and the agent form the threefold basis of action.
Transliteration
jñānaṃ jñeyaṃ parijñātā trividhā karmacodanā
karaṇaṃ karma karteti trividhaḥ karmasaṅgrahaḥअनुवाद
ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता—ये तीन प्रकार की कर्म-प्रेरणा हैं; करण, कर्म और कर्ता—ये तीन प्रकार का कर्म-संग्रह हैं।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण कर्म के मनोवैज्ञानिक और भौतिक घटकों का विश्लेषण करते हैं। कर्म की प्रेरणा के तीन मानसिक घटक हैं: ज्ञान (जानने की क्रिया), ज्ञेय (जानने योग्य विषय), और परिज्ञाता (जानने वाला)। जब कर्म भौतिक रूप में परिणत होता है, तो उसके तीन घटक होते हैं: करण (इन्द्रियाँ या साधन), कर्म (क्रिया), और कर्ता (करने वाला)।
Translation
Knowledge, the object of knowledge, and the knower—these three constitute the impulse to action; The instrument, the action, and the doer—these three constitute the basis of action.
Meaning
In this verse, Lord Krishna analyzes the psychological and physical components of action. The impulse to act has three mental components: knowledge, the object of knowledge, and the knower. When action manifests physically, it consists of three constituents: the instrument, the action itself, and the doer.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| ज्ञानम् | ज्ञान |
| ज्ञेयम् | ज्ञेय (जानने योग्य) |
| परिज्ञाता | ज्ञाता (जानने वाला) |
| त्रिविधा | तीन प्रकार की |
| कर्म-चोदना | कर्म की प्रेरणा |
| करणम् | करण (साधन) |
| कर्म | कर्म (क्रिया) |
| कर्ता | कर्ता (करने वाला) |
| इति | इस प्रकार |
| त्रिविधः | तीन प्रकार का |
| कर्म-संग्रहः | कर्म का आश्रय (संग्रह) |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| jñānam | knowledge |
| jñeyam | the object of knowledge |
| parijñātā | the knower |
| trividhā | of three kinds |
| karma-codanā | the impulse to action |
| karaṇam | the instrument |
| karma | the action |
| kartā | the doer |
| iti | thus |
| trividhaḥ | of three kinds |
| karma-saṅgrahaḥ | the accumulation or basis of action |