Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 18.16
मूल श्लोक :
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
परन्तु ऐसे पाँच हेतुओंके होनेपर भी जो उस (कर्मोंके) विषयमें केवल (शुद्ध) आत्माको कर्ता मानता है? वह दुर्मति ठीक नहीं समझता क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
पूर्व श्लोक में हमने देखा कि आत्मा की उपस्थिति में शरीरादि जड़ उपाधियाँ कार्य करती हैं? परन्तु आत्मा अकर्ता ही रहता है। आत्मा और अनात्मा के इस विवेक के अभाव में अज्ञानी जन स्वयं को कर्ता और भोक्ता रूप जीव ही समझते हैं। जीव दशा में रागद्वेष? प्रवृत्तिनिवृत्ति? लाभहानि और सुखदुख अवश्यंभावी हैं। जिस क्षण कोई पुरुष आत्मा और अनात्मा के भेद को तथा अविद्या से उत्पन्न मिथ्या अहंकार को समझ लेता है? उसी क्षण इस मिथ्या जीव का अस्तित्व दिवा स्वप्न के भूत के समान समाप्त हो जाता है।तत्रैवं सति सभी प्रकार के उचित और अनुचित कर्म शरीर? कर्ता? दशेन्द्रियाँ तथा दैव की सहायता से ही होते हैं? परन्तु इन्हें चेतनता प्रदान करने वाला आत्मा नित्य शुद्ध और अकर्ता ही रहता है। अज्ञानी जन इस आत्मा को ही कर्ता समझ लेते हैं।इस प्रकार के विपरीत ज्ञान के कारणों का निर्देश? यहाँ अकृतबुद्धि और दुर्मति इन दो शब्दों से किया गया है। अकृतबुद्धि का अर्थ है वह पुरुष जिसने अपनी बुद्धि को शास्त्र? आचार्योपदेश तथा न्याय (तर्क) के द्वारा सुसंस्कृत नहीं किया है तथा दुर्मति का अर्थ है दुष्टरागद्वेषादि युक्त बुद्धि का पुरुष। इस कथन का अभिप्राय यह हुआ कि जो पुरुष अपने चित्त को शुद्ध कर आत्मविचार करता है? वह अपने में ही यह साक्षात् अनुभव करता है? कि शरीरादि जड़ उपाधियाँ ही कार्य करके थकान का अनुभव करती हैं? अकर्ता आत्मा नहीं।विपरीत ज्ञान का वर्णन करने के पश्चात् अब यथार्थ ज्ञान का वर्णन करते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Now, such being the case, verily he who owing to untrained understanding looks upon his Self, which is isolated, as the agent, he of perverted intelligence, sees not.
Transliteration
tatraivaṃ sati kartāramātmānaṃ kevalaṃ tu yaḥ
paśyatyakṛtabuddhitvānna sa paśyati durmatiḥअनुवाद
ऐसी स्थिति में भी, जो मनुष्य अशुद्ध बुद्धि होने के कारण केवल अपने आप को ही कर्ता मानता है, वह दुर्बुद्धि वाला मनुष्य वास्तव में नहीं देखता है।
भावार्थ
भगवान कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि कर्म के सिद्ध होने में पाँच कारण (अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव) होते हैं। इसके बावजूद, जो व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार या विवेक-बुद्धि के अभाव के कारण केवल अपनी आत्मा को ही एकमात्र कर्ता मानता है, वह अज्ञानी है। उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है, इसलिए वह सत्य को नहीं देख पाता।
Translation
Such being the case, he who, owing to an untrained intellect, looks upon his pure Self as the sole doer, is of perverted intelligence and does not see at all.
Meaning
Sri Krishna explains that since five factors (the body, the doer, the senses, the endeavors, and destiny) are responsible for the accomplishment of all actions, the soul alone is not the doer. Anyone who, due to an unrefined intellect, considers the pure Self to be the sole agent of action is ignorant. Such a person has a distorted vision and does not perceive the truth of reality.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| तत्र | वहाँ (उस विषय में) |
| एवम् | इस प्रकार |
| सति | होने पर |
| कर्तारम् | कर्ता |
| आत्मानम् | आत्मा को |
| केवलम् | केवल / एकमात्र |
| तु | लेकिन |
| यः | जो |
| पश्यति | देखता है |
| अकृत-बुद्धित्वात् | अशुद्ध बुद्धि होने के कारण |
| न | नहीं |
| सः | वह |
| पश्यति | देखता है |
| दुर्मतिः | दुर्बुद्धि मनुष्य |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| tatra | there (in that matter) |
| evam | thus |
| sati | being |
| kartāram | the doer |
| ātmānam | the self |
| kevalam | alone / only |
| tu | but |
| yaḥ | who |
| paśyati | sees |
| akṛta-buddhitvāt | due to an unrefined intellect |
| na | not |
| saḥ | he |
| paśyati | sees |
| durmatiḥ | the foolish person / of perverted intelligence |