श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 18.15

मूल श्लोक :

शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः।।18.15।।

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।18.15।।मनुष्य? शरीर? वाणी और मनके द्वारा शास्त्रविहित अथवा शास्त्रविरुद्ध जो कुछ भी कर्म आरम्भ करता है? उसके ये (पूर्वोक्त) पाँचों हेतु होते हैं।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

।।18.15।। न्याय्य और विपरीत कर्मों से तात्पर्य क्रमश धर्म के अनुकूल और प्रतिकूल कर्मों से है। निरपवाद रूप से सब प्रकार कर्मों की सिद्धि के लिए शरीरादि पाँच कारणों की आवश्यकता होती है।यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि कर्मों के पञ्चविध कारणों का वर्णन केवल बोनट के नीचे स्थित इंजन का ही है? पेट्रोल का नहीं। पेट्रोल के बिना इंजन कार्य नहीं कर सकता और न ही केवल पेट्रोल के द्वारा यात्रा सफल और सुखद हो सकती है। इंजन और पेट्रोल के सम्बन्ध से वाहन में गति आती है और तब स्वामी की इच्छा के अनुसार चालक उसे गन्तव्य तक पहुँचा सकता है। इस उदाहरण को समझ लेने पर भगवान् श्रीकृष्ण के कथन का अभिप्राय स्पष्ट हो जायेगा।अकर्म चैतन्य स्वरूप आत्मा देहादि उपाधियों से तादात्म्य करके जीव के रूप में अनेक प्रकार की इच्छाओं से प्रेरित होकर उचितअनुचित कर्म करता है। इन समस्त कर्मों के लिए पूर्वोक्त पाँच कारणों की आवश्यकता होती है।पूर्व के दो श्लोकों का निष्कर्ष यह है कि मनुष्य का कर्तृत्वाभिमान मिथ्या है। भगवान् कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

18.15 Whatever action a man performs with his body, speech and mind  whether right or the reverse  these five are its causes.