श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 18.14

मूल श्लोक :

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

इसमें (कर्मोंकी सिद्धिमें) अधिष्ठान तथा कर्ता और अनेक प्रकारके करण एवं विविध प्रकारकी अलगअलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ कारण दैव (संस्कार) है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

भगवान् श्रीकृष्ण अपने दिये हुए वचन को पूर्ण करते हुए इस श्लोक में कर्मसिद्धि के पाँच कारणों का नामोल्लेख करते हैं। यहाँ प्रस्तुत शब्दों के अर्थ बताने में गीता के व्याख्याकारों में थोड़ा अन्तर मिलता है। तथापि यह अन्तर विशेष महत्त्व का नहीं है।प्रत्येक कर्म स्थूल शरीर (अधिष्ठान) की सहायता से ही करना पड़ता है? क्योंकि ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों का यही निवास स्थान है। यह शरीर स्वत कुछ भी कर्म नहीं कर सकता। इस शरीर को धारण करने वाला जीव (कर्ता) ही विषयों की इच्छाएं करता है और फिर उनकी पूर्ति के लिए कर्म करता है। विषय ग्रहण के लिए उसे ज्ञानेन्द्रियों की आवश्यकता होती है? जिन्हें यहाँ करण शब्द से इंगित किया गया है। इन करणों के बिना कर्ता जीव इस जगत् का न ज्ञान प्राप्त कर सकता है और न ही भोग।श्री शंकराचार्य अपने भाष्य में पृथक् चेष्टा का अर्थ प्राणापानादि बताते हैं। वेदान्त सिद्धांत से परिचित विद्यार्थियों को इतना स्पष्टीकरण पर्याप्त है। परन्तु सामान्य लोगों को उसका अर्थ समझने में कठिनाई होती है। प्राणिक क्रियाओं के फलस्वरूप ही शरीर का स्वास्थ्य बना रहता है? जिससे कि मनुष्य कर्म करने में समर्थ होता है। अत? इस श्लोक को समझने की दृष्टि से हम चेष्टा शब्द का अर्थ कर्मेन्द्रिय ले सकते हैं। जैसा कि गीता में ही अनेक स्थानों पर कहा जा चुका है? हमारी इन्द्रियों के अधिष्ठातृ देवता हैं जिनके अनुग्रह से श्रोत्र नेत्रादि इन्द्रियाँ स्वविषय ग्रहण करने में समर्थ होती हैं। इन देवताओं को यहाँ दैव शब्द से इंगित किया ग्ाया है।सारांश में? कर्म सम्पादन के पाँच कारण हैं (1) शरीर? (2) कर्ता जीव?(3) ज्ञानेन्द्रियाँ? (4) कर्मेन्द्रियाँ? तथा (5) दैव अर्थात् अधिष्ठातृ देवता।भगवान् आगे कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

The seat (body), the doer, the various senses, the different functions of various sorts, and the presiding deity, also, the fifth.

Transliteration

adhiṣṭhānaṃ tathā kartā karaṇaṃ ca pṛthagvidham
vividhāśca pṛthakceṣṭā daivaṃ caivātra pañcamam

अनुवाद

अधिष्ठान (शरीर) तथा कर्ता, और विभिन्न प्रकार के करण (इन्द्रियाँ), और विविध प्रकार की पृथक चेष्टाएँ, तथा पाँचवाँ कारण दैव (परमात्मा) ही है।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण किसी भी कर्म की सिद्धि के लिए पाँच आवश्यक कारणों का वर्णन कर रहे हैं। ये पाँच कारण हैं: शरीर (अधिष्ठान), कर्ता (जीवात्मा), विभिन्न इन्द्रियाँ (करण), अनेक प्रकार की चेष्टाएँ (प्रयास), और अंत में दैव (परमात्मा की इच्छा या प्रारब्ध)। इन पाँचों के बिना कोई भी कर्म संपन्न नहीं हो सकता।

Translation

The seat of action, the doer, the various senses, the many different kinds of endeavors, and the divine providence as the fifth factor.

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes the five factors that are responsible for the accomplishment of any action. These five factors are: the seat of action (the body), the doer (the soul), the various instruments (the senses), the many different kinds of endeavors, and ultimately, divine providence (the Supreme Will). No action can be performed without the combination of these five.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
अधिष्ठानम्अधिष्ठान (शरीर)
तथातथा
कर्ताकर्ता (जीवात्मा)
करणम्करण (इन्द्रियाँ)
और
पृथक्-विधम्विभिन्न प्रकार के
विविधाःविविध प्रकार की
और
पृथक्-चेष्टाःपृथक चेष्टाएँ (प्रयास)
दैवम्दैव (परमात्मा)
और
एवही
अत्रयहाँ (इनमें)
पञ्चमम्पाँचवाँ

Word by word

WordMeaning
adhiṣṭhānamthe seat of action (the body)
tathāand
kartāthe doer
karaṇamthe instruments (senses)
caand
pṛthag-vidhamof various kinds
vividhāḥmanifold
caand
pṛthak-ceṣṭāḥdistinct endeavors
daivamdivine providence
caand
evaindeed
atraherein
pañcamamthe fifth