श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 18.11

मूल श्लोक :

न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

कारण कि देहधारी मनुष्यके द्वारा सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करना सम्भव नहीं है। इसलिये जो कर्मफलका त्यागी है? वही त्यागी है -- ऐसा कहा जाता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

कोई भी देहधारी जीवित प्राणी चाहे वह एक कोषीय जीव ही क्यों न हो समस्त कर्मों का त्याग नहीं कर सकता। कर्म तो जीवन का प्रतीक या लक्षण है। कर्म ही जीवनरूपी पुष्प की सुगन्ध है जहाँ कर्म नहीं है? वहाँ जीवन समाप्त समझा जाता है। कुछ कर्म किये बिना रहना भी अपने आप में एक कर्म ही है। शारीरिक और मानसिक क्रियाएं मरण पर्यन्त होती ही रहती हैं।अत हम देहधारियों को कर्म करने चाहिए या नहीं? ऐसा विकल्प ही संभव नहीं होता। परन्तु हमको कौन से कर्म और किस प्रकार उन्हें करना चाहिए? इस विषय में अवश्य ही विकल्प संभव है। गीता के उपदेशानुसार हमको अपने कर्तव्य कर्म ईश्वरार्पण की भावना से करने चाहिए।अज्ञानी जन देहादि अनात्म उपाधियों को ही अपना स्वरूप समझकर उसमें आसक्त होते हैं तथा उनके कर्मों का कर्ता भी स्वयं को ही मानते हैं। अत ऐसे लोग सात्त्विक त्याग नहीं कर पाते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण का ऐसे लोगों को यह उपदेश है कि उनको कमसेकम कर्मफलों की आसक्ति त्याग कर कर्मों का आचरण परिश्रम? उत्साह एवं कुशलता के साथ करना चाहिए। कर्मफलत्यागी पुरुष ही वास्तव में त्यागी है? न कि कर्मों को त्यागने वाला व्यक्ति।इस त्याग का क्या प्रयोजन है  सुनो

English Translation By Swami Sivananda

Verily, it is not possible for an embodied being to abandon actions entirely; but he who relinishes the rewards of actions is verily called a man of renunciation.

Transliteration

na hi dehabhṛtā śakyaṃ tyaktuṃ karmāṇyaśeṣataḥ
yastu karmaphalatyāgī sa tyāgītyabhidhīyate

अनुवाद

क्योंकि शरीरधारी किसी भी मनुष्य द्वारा सम्पूर्णता से सब कर्मों का त्याग किया जाना सम्भव नहीं है परन्तु जो कर्मों के फल का त्यागी है, वही वास्तव में त्यागी कहलाता है

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि जब तक मनुष्य के पास भौतिक शरीर है, तब तक पूर्ण रूप से कर्मों का त्याग करना असंभव है, क्योंकि जीवन जीने के लिए भी कुछ न कुछ कर्म करने ही पड़ते हैं। इसलिए, वास्तविक संन्यास या त्याग कर्मों को छोड़ने में नहीं, बल्कि उनके फलों के प्रति आसक्ति को छोड़ने में है। जो व्यक्ति अपने कर्मों के परिणामों की इच्छा का त्याग कर देता है, वही सच्चा त्यागी माना जाता है।

Translation

For it is indeed impossible for an embodied being to renounce all actions entirely but he who renounces the fruits of action is called a true renouncer

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains that as long as one possesses a physical body, it is impossible to abandon all actions entirely, as even basic survival requires action. Therefore, true renunciation does not mean giving up action itself, but rather giving up attachment to the fruits of those actions. One who performs their duty without desiring the results is considered a genuine renouncer.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
नहीं
हिनिश्चय ही
देहभृताशरीरधारी के द्वारा
शक्यम्सम्भव है
त्यक्तुम्त्याग करना
कर्माणिकर्मों का
अशेषतःपूर्ण रूप से
यःजो
तुपरन्तु
कर्मफलत्यागीकर्म के फल का त्यागी है
सःवह
त्यागीत्यागी
इतिऐसा
अभिधीयतेकहा जाता है

Word by word

WordMeaning
nanot
hiindeed
dehabhṛtāby an embodied being
śakyamis possible
tyaktumto renounce
karmāṇiactions
aśeṣataḥentirely
yaḥwho
tubut
karmaphalatyāgīrenouncer of the fruits of action
saḥhe
tyāgīa renouncer
itithus
abhidhīyateis called