Chapter 18 · मोक्षसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 18.1
मूल श्लोक :
अर्जुन उवाच
संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदनHindi Translation By Swami Ramsukhdas
(टिप्पणी प0 868) अर्जुन बोले -- हे महाबाहो हे हृषीकेश हे केशिनिषूदन मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व अलगअलग जानना चाहता हूँ।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
यद्यपि अर्जुन की जिज्ञासा शैक्षणिक रुचि की है? तथापि भगवान् श्रीकृष्ण पूर्ण गम्भीरता के साथ उसका उत्तर देते हैं। जब शिष्य अपना सन्देह या जिज्ञासा प्रकट करता है? तब निश्चय ही वह स्वयं अपनी कठिनाई नहीं जान पाता है। अत गुरु का यह कर्तव्य हो जाता है कि शिष्य की कठिनाई को समझकर उसका समाधान करे। यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण का यही प्रयत्न है।यह सम्पूर्ण अध्याय त्याग और संन्यास के अर्थ के चारों ओर घूमता रहता है। त्याग के बिना संन्यास अनाकलनीय है? असम्भव है? और यदि कोई ऐसा प्रयत्न करता है? तो उसका संन्यास केवल पाखण्ड ही कहा जायेगा। यह अध्याय हमारी उन वासनाओं? प्रवृत्तियों? उद्देश्यों आदि का वर्णन करता है? जो सर्वथा त्याज्य है। इनके ज्ञान से अवांछनीय गुणों का वास्तविक त्याग संभव हो सकता है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर इस अध्याय का अध्ययन करना चाहिए? अन्यथा? निश्चय ही? यह हमें प्रभावित नहीं कर पायेगा।केशनिषूदन केशि नामक एक असुर अश्व का रूप धारण करके बालकृष्ण की हत्या करने आया था? परन्तु भगवान् ने उसे ही दो भागों में विदीर्ण कर दिया था। अत वे केशिनिषूदन के नाम से प्रसिद्ध हुए।इन शब्दों के तत्त्वनिर्णय हेतु
English Translation By Swami Sivananda
Arjuna said I desire to know severally, O mighty-armed, the essence or truth of renunciation, O Hrishikesa, as also of abandonment, O slayer of Kesi.
Transliteration
arjuna uvāca
saṃnyāsasya mahābāho tattvamicchāmi veditum
tyāgasya ca hṛṣīkeśa pṛthakkeśiniṣūdanaअनुवाद
अर्जुन ने कहा — हे महाबाहो! मैं संन्यास का और हे हृषीकेश! हे केशिनीसूदन! त्याग का तत्त्व पृथक-पृथक जानना चाहता हूँ
भावार्थ
यह अठारहवें अध्याय का पहला श्लोक है जहाँ अर्जुन भगवान कृष्ण से ‘संन्यास’ (कर्मों के स्वरूप से त्याग) और ‘त्याग’ (कर्मफलों के त्याग) के बीच के वास्तविक अंतर को स्पष्ट करने की प्रार्थना करते हैं। अर्जुन कृष्ण को ‘महाबाहो’, ‘हृषीकेश’ और ‘केशिनीसूदन’ जैसे विशेषणों से संबोधित करते हैं, जो उनके सामर्थ्य और इंद्रियों के नियंत्रण को दर्शाते हैं। यहाँ से गीता के उपदेश का उपसंहार और संक्षेप आरंभ होता है।
Translation
Arjuna said: O mighty-armed one, I desire to know the true nature of renunciation and of self-surrender, individually, O Hrishikesha, O slayer of the Keshi demon
Meaning
This is the opening verse of the eighteenth chapter, where Arjuna requests Lord Krishna to clarify the distinct meanings and essential truths of ‘Sannyasa’ (renunciation of actions) and ‘Tyaga’ (renunciation of the fruits of action). By addressing Krishna as Hrishikesha (master of the senses) and Keshinisudana (slayer of the Keshi demon), Arjuna expresses his faith in Krishna’s power to dispel his doubts. This question sets the stage for the final summary of the Gita’s teachings.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अर्जुनः | अर्जुन |
| उवाच | बोले |
| संन्यासस्य | संन्यास का |
| महाबाहो | हे महाबाहो (विशाल भुजाओं वाले) |
| तत्त्वम् | तत्त्व (वास्तविक स्वरूप) |
| इच्छामि | चाहता हूँ |
| वेदितुम् | जानना |
| त्यागस्य | त्याग का |
| च | और |
| हृषीकेश | हे हृषीकेश (इन्द्रियों के स्वामी) |
| पृथक् | पृथक-पृथक (अलग से) |
| केशि-निषूदन | हे केशिनीसूदन (केशी असुर का वध करने वाले) |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| arjunaḥ | Arjuna |
| uvāca | said |
| saṃnyāsasya | of renunciation (sannyasa) |
| mahābāho | O mighty-armed one |
| tattvam | the truth / essence |
| icchāmi | I wish |
| veditum | to know |
| tyāgasya | of relinquishment (tyaga) |
| ca | and |
| hṛṣīkeśa | O Hrishikesha (master of the senses) |
| pṛthak | distinctly / separately |
| keśi-niṣūdana | O slayer of the Keshi demon |