श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग

Bhagavad Gita 17.6

मूल श्लोक :

कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

जो मनुष्य शास्त्रविधिसे रहित घोर तप करते हैं जो दम्भ और अहङ्कारसे अच्छी तरह युक्त हैं जो भोगपदार्थ? आसक्ति और हठसे युक्त हैं जो शरीरमें स्थित पाँच भूतोंको अर्थात् पाञ्चभौतिक शरीरको तथा अन्तःकरणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करनेवाले हैं उन अज्ञानियोंको तू आसुर निश्चयवाले (आसुरी सम्पदावाले) समझ।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

साधक का अत्युत्साह केवल शारीरिक थकान और मानसिक अवसाद को ही उत्पन्न कर सकता है। केवल धर्म के नाम पर अविवेकपूर्ण साधना करने से किसी प्रकार का आध्यत्मिक विकास नहीं हो सकता। बहुसंख्यक साधकगण अपनी क्षमताओं का दुरुपयोग करके व्यर्थ में कष्ट पाते हैं। इसलिए? भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ ऐसे अविवेकी साधकों का चित्रण कर उनकी मूढ़ साधना का उपहास करते हैं।यह सत्य है कि शास्त्रों में स्थूलकाय अथवा देहासक्त व्यक्तियों के लिए कुछ अवधि पर्यन्त शारीरिक तपाचरण की साधना का उपदेश दिया गया है? परन्तु उससे यह निष्कर्ष निकालना त्रुटिपूर्ण होगा कि यह तप ही एकमात्र साधन है तथा केवल उसी के अनुष्ठान से आन्तरिक विकास भी हो सकता है। तपश्चर्या भी विवेकपूर्ण होनी चाहिए इसलिए धर्मशास्त्रों के विधानों के विरुद्ध उनका आचरण नहीं करना चाहिए।कुछ लोग केवल प्रदर्शन के लिए तप करते हैं। दम्भ और अहंकार से युक्त लोग वास्तविक तप के अधिकारी नहीं होते हैं। उसी प्रकार जिन लोगों के मन में विषयों की कामना और आसक्ति दृढ़ होती है? वे भी मानसिक रूप से तपश्चर्या के योग्य नहीं होते।यदि ऐसे लोग अपने तप के फलस्वरूप कुछ शक्ति प्राप्त भी कर लेते हैं? तो भी अन्तकरण की अशुद्धि के कारण वे उन शक्तियों का दुरुपयोग ही करते हैं। पुराणों में वर्णित हिरण्यकश्यपादि के चरित्र इस तथ्य को प्रमाणित करते हैं। इस प्रकार शास्त्रविधि की उपेक्षा करके तप करने वाले तपस्वी लोग आसुरी श्रेणी में ही गिने जाते हैं।ऐसे अविवेकी जन घोर तप के द्वारा न केवल अपने शरीर को पीड़ा पहुँचाते हैं? वरन् मुझ दिव्य अन्तर्यामी को भी कष्ट देते हैं। इसका आशय यह है कि ऐसे साधकों के हृदय में आत्मचैतन्य अपने पूर्ण वैभव एवं सौन्दर्य के साथ व्यक्त नहीं हो पाता। घोर कष्टदायक तप मूढ़ता का लक्षण है? जिसकी यहाँ निन्दा की गई है। विवेकपूर्ण संयम तप कहलाता है? न कि निर्मम शारीरिक पीड़ा भगवान् आगे कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Senseless, torturing all the elements in the body and Me also, Who dwell in the body,  know thou these to be of demonical resolves.

Transliteration

karṣayantaḥ śarīrasthaṃ bhūtagrāmamacetasaḥ
māṃ caivāntaḥśarīrasthaṃ tān viddhyāsuraniścayān

अनुवाद

शरीर के भीतर स्थित पंचभूतों के समूह को और शरीर के भीतर अंतर्यामी रूप से स्थित मुझको भी दुर्बल करने वाले, उन अज्ञानियों को तुम आसुरी स्वभाव वाला जानो।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण उन लोगों की निंदा करते हैं जो शास्त्रों के विरुद्ध घोर तपस्या करते हैं। वे अपने शरीर के पंचमहाभूतों को कष्ट देते हैं और अंतःकरण में स्थित परमात्मा (कृष्ण) को भी क्लेश पहुँचाते हैं। ऐसे हठयोगियों या तपस्वियों को आसुरी निश्चय वाला समझना चाहिए।

Translation

Senselessly torturing the elements composing the body and Me also who dwells within the body—know them to be of demonic resolves.

Meaning

In this verse, Lord Krishna condemns those who perform severe, non-scriptural austerities. By doing so, they torture the physical elements of their own bodies and, by extension, the Supreme Soul dwelling within them. Such individuals are declared to possess demonic resolves and attitudes.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
कर्षयन्तःकष्ट देते हुए / दुर्बल करते हुए
शरीरस्थम्शरीर में स्थित
भूतग्रामम्इन्द्रिय और पंचभूतों के समूह को
अचेतसःविवेकहीन / मूर्ख लोग
माम्मुझको
चऔर
एवभी / ही
अन्तःभीतर
शरीरस्थम्शरीर में स्थित
तान्उनको
विद्धिजानो
आसुरनिश्चयान्आसुरी निश्चय वाले

Word by word

WordMeaning
karṣayantaḥtorturing / weakening
śarīrasthamsituated in the body
bhūtagrāmamthe group of elements
acetasaḥthe senseless / foolish
māmMe
caand
evaalso / indeed
antaḥwithin
śarīrasthamsituated in the body
tānthem
viddhiknow
āsuraniścayānto be of demonic resolves