श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग

Bhagavad Gita 17.16

मूल श्लोक :

मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

मनकी प्रसन्नता? सौम्य भाव? मननशीलता? मनका निग्रह और भावोंकी शुद्धि -- इस तरह यह मनसम्बन्धी तप कहा जाता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

इस श्लोक में उल्लिखित जीवन के पाँच आदर्श मूल्यों को जीवन में अपनाने पर? ये अपने संयुक्त रूप में मानस तप? कहलाते हैं। मन प्रसाद अर्थात् मनशान्ति की प्राप्ति तभी हो सकती है? जब जगत् के साथ हमारा सम्बन्ध ज्ञान? सहिष्णुता और प्रेम के स्वस्थ मूल्यों पर आधारित हो। एक असंयमित और कामुक पुरुष के लिए मन प्रसाद दुर्लभ ही होता है। उसका मन इन्द्रियों के द्वारा सदैव विषयों में ही सुख की खोज में भ्रमण करता रहता है।विषय भोग की इच्छाएं ही मन की इस अन्तहीन दौड़ का कारण है। बाह्य विषय ग्रहण तथा आन्तरिक इच्छाओं से मन को सुरक्षित रखे जाने पर ही मनुष्य को शान्ति प्राप्त हो सकती है। जिस साधक को ऐसा दिव्य और श्रेष्ठ आदर्श प्राप्त हो गया है? जिसमें मन और बुद्धि अपनी चंचलता को विस्मृत कर समाहित हो जाती है? उसे ही वास्तविक मन प्रसाद की उपलब्धि हो सकती है।सौम्यत्व  प्राणिमात्र के प्रति प्रेम और कल्याण की भावना ही सौम्यता है। ऐसे सहृदय साधक के मन में कभी यह भाव उत्पन्न नहीं होता कि लोग उसको बलात् उत्पीड़ित कर रहे हैं? और न ही वह बाह्य परिस्थितियों से कभी विचलित ही होता है।मौन  हम पहले ही देख चुके हैं कि शब्दों का अनुच्चारण मौन नहीं है। सामान्यत? मौन शब्द से हम वाणी का मौन ही समझते हैं? परन्तु यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण मौन का उल्लेख मानस तप के सन्दर्भ में करते हैं। इसमें कोई विरोध नहीं है। कारण यह है कि मन के शान्त रहने पर ही वाणी का मौन या संयम संभव हो सकता है। कामरागादि के कोलाहल से रहित मन की स्थिति को ही वास्तविक मौन कहते हैं। मुनि के स्वभाव को भी मौन कहते हैं। अत मौन का अर्थ हुआ  मननशीलता।आत्मसंयम  उपर्युक्त मन प्रसाद? सौम्यता और मौन की सिद्धि तब तक सफल नहीं होती? जब तक हम सावधानी और प्रयत्नपूर्वक आत्मसंयम नहीं कर पाते हैं। प्राय हमारी पाशविक प्रवृत्तियां प्रबल होकर हमें अपने वश में कर लेती हैं। अत विवेक और सजगतापूर्वक उनको अपने वश में रखना आवश्यकहो जाता है।भावसंशुद्धि  इस शब्द से तात्पर्य हमारे उद्देश्यों की पवित्रता और शुद्धता से है। भावसंशुद्धि के बिना आत्मसंयम कर पाना कठिन होता है। जीवन में कोई श्रेष्ठ लक्ष्य न हो तो विषयों के प्रलोभन के शिकार बन जाने की आशंका बनी रहती है। इसलिए साधक को अपना लक्ष्य निर्धारित करके उसकी प्राप्ति होने तक धैर्यपूर्वक अपने मार्ग पर आगे बढ़ते जाना चाहिए। इस कार्य में हमारा लक्ष्य तथा उद्देश्य ऐसा दिव्य हो? जो हमें स्फूर्ति और प्रेरणा प्रदान कर सके? अन्यथा हम अपनी ही क्षमताओं की जड़े खोदकर अपने ही नाश में प्रवृत्त हो सकते हैं।इस प्रकार उपर्युक्त तीन श्लोकों में तप के वास्तविक स्वरूप का वर्णन किया गया है। विभिन्न साधकों के द्वारा समान श्रद्धा के साथ इस तप का आचरण किया जाता है? परन्तु सबको विभिन्न फल प्राप्त होते दिखाई देते हैं। यह कोई संयोग की ही बात नहीं है। तप करने वाले तपस्वी साधक तीन प्रकार के होते हैं  सात्त्विक? राजसिक और तामसिक। अत इन गुणों के भेद के कारण उनके तपाचरण में भेद होता है। स्वाभाविक ही है कि उनके द्वारा प्राप्त किये गये फलों में भी भेद होगा।अब अगले तीन श्लोकों में त्रिविध तप का वर्णन करते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Serenity of mind, good-heartedness, self-control, purity of nature  this is called mental austerity.

Transliteration

manaḥprasādaḥ saumyatvaṃ maunamātmavinigrahaḥ
bhāvasaṃśuddhirityetattapo mānasamucyate

अनुवाद

मन की प्रसन्नता, सौम्य भाव, मौन, आत्म-संयम और अंतःकरण के भावों की भली-भांति शुद्धि — इस प्रकार यह मन का तप कहा जाता है

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण मानसिक तपस्या के लक्षणों का वर्णन करते हैं। मन को शांत, प्रसन्न और सौम्य रखना, व्यर्थ न बोलना, मन को वश में रखना और अपने विचारों को शुद्ध रखना ही वास्तविक मानसिक तप है। यह तप मनुष्य के आंतरिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।

Translation

Serenity of mind, gentleness, silence, self-control, and purity of individual existence — this is called the austerity of the mind

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes the characteristics of the austerity of the mind. Maintaining serenity, gentleness, silence, self-control, and purity of purpose constitute mental discipline. This internal purification is essential for spiritual growth and self-realization.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
मनःप्रसादःमन की प्रसन्नता
सौम्यत्वम्सौम्यता या कोमलता
मौनम्मौन (वाणी का संयम)
आत्मविनिग्रहःआत्म-संयम (मन का नियंत्रण)
भावसंशुद्धिःभावों की भली-भांति शुद्धि
इतिइस प्रकार
एतत्यह
तपःतप
मानसम्मानसिक
उच्यतेकहा जाता है

Word by word

WordMeaning
manaḥ-prasādaḥsatisfaction or serenity of mind
saumyatvamgentleness or benevolence
maunamsilence
ātma-vinigrahaḥself-control
bhāva-saṃśuddhiḥpurity of feelings or purpose
itithus
etatthis
tapaḥausterity
mānasamof the mind
ucyateis said to be