श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग

Bhagavad Gita 17.14

मूल श्लोक :

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

देवता? ब्राह्मण? गुरुजन और जीवन्मुक्त महापुरुषका पूजन करना? शुद्धि रखना? सरलता?,ब्रह्मचर्यका पालन करना और हिंसा न करना -- यह शरीरसम्बन्धी तप कहा जाता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

देव? द्विज? गुरु और ज्ञानी जनों का पूजन  अपने आराध्य के साथ तादात्म्य बनाये रखने की साधना पूजा कहलाती है। इस पूजा के फलस्वरूप पूजक अपने आराध्य के गुणों से सम्पन्न हो जाता है। नैतिक विकास एवं सांस्कृतिक उन्नति का उपाय यह पूजन ही है। यह बहुत कुछ चुम्बकीकरण की स्पर्शविधि के समान ही है। जो पुरुष अपने व्यक्तित्व के प्रतिबन्धनों से मुक्त होना चाहता है? उसको अपने आराध्य आदर्श (देव) के प्रति श्रद्धा और भक्ति? आदर और सम्मान का भाव होना अत्यावश्यक है। उसी प्रकार? जिन सत्पुरुषों ने इस आदर्श को प्रस्तुत किया उन द्विजों (ब्राह्मणों) के प्रति तथा उपदेष्टा गुरु और इस आदर्श के अनुमोदक ज्ञानी जनों के प्रति भी वही भक्ति भाव होना चाहिए।द्विज  इस शब्द का वाच्यार्थ है वह व्यक्ति जो दो बार जन्मा हो । यह शब्द ब्राह्मणों का सूचक है और ब्रह्मवित् पुरुष को ही ब्राह्मण कहते हैं। माता के गर्भ से जन्म लेने पर सभी मनुष्य एक समान ही होते हैं। यद्यपि सबमें बौद्धिक क्षमता और सुन्दरता होती है? परन्तु उसके साथ ही अनेक नैतिक दोष भी होते हैं। हम एक गर्भ से तो मुक्त होते हैं परन्तु प्रकृति की जड़ उपाधियों के गर्भ में बन्धे ही रहते हैं  इन उपाधियों के तादात्म्य से स्वयं को मुक्त कर अपने आत्मस्वरूप के परमानन्द में निष्ठा प्राप्त करना ही दूसरा जन्म माना जाता है। इसलिए आत्मानुभवी पुरुष को द्विज कहा जाता है।शौच और सरलता  शरीर की स्वच्छता के साथसाथ आसपास के वातावरण की स्वच्छता की ओर भी साधक को ध्यान देना चाहिए। यह बाह्य शुद्धि ही यहाँ शौच शब्द से इंगित की गयी है। उसी प्रकार साधक के बाह्य व्यवहार में सरलता होनी चाहिए। कुटिलता के कारण व्यक्तित्व के विभाजन की आशंका बनी रहती है। ऐसे विभाजित पुरुष के मन का सन्तुलन? सार्मथ्य और शान्ति नष्ट हो जाती है।ब्रह्मचर्य  सदैव ब्रह्मस्वरूप में रमने के स्वभाव को ही ब्रह्मचर्य कहते हैं।यह रमण तब तक संभव नहीं हो सकता जब तक हमारा शरीर और मन विषयोपभोगों से विरत नहीं होता है। इसलिए? इन्द्रियों व मन के संयम को भी ब्रह्मचर्य की संज्ञा प्रदान की गयी है। जैसे? मेडिकल कालेज में प्रवेश प्राप्त कर लेने पर ही विद्यार्थी को डाक्टर कहा जाने लगता है? क्योंकि उसका साध्य तब दूर नहीं रह जाता।अहिंसा  किसी भी प्राणी को पीड़ा न पहुँचाने का नाम ही अहिंसा है। जीवन में? जाने या अनजाने किसी प्राणी को कदापि शारीरिक पीड़ा न पहुँचाना असम्भव है। परन्तु अपने मन में हिंसा का भाव कभी न आने देना चाहिए? और तब अपरिहार्य शारीरिक पीड़ा भी कल्याण कारक हो सकती है। उदाहरणार्थ? एक शल्य चिकित्सक के द्वारा रोगी को दिया गया शारीरिक कष्ट रोगी के लिए कल्याण कारक ही सिद्ध होता है। उस चिकित्सक की दृष्टि से यह अहिंसा ही है।उपर्युक्त पूजनादि साधनाओं में शरीर की प्रधानता होने से उन्हें शरीर तप कहा गया है।तप का अर्थ शरीर उत्पीड़न ही नहीं है। वस्तुत? तप तो वह विवेकपूर्ण जीवन पद्धति है? जिसके द्वारा हम अपनी समस्त शक्तियों के अपव्यय को अवरुद्ध कर उनका संचय कर सकते हैं। नई शक्तियों को प्राप्त कर उनका संचय करना और तत्पश्चात् उनका रचनात्मक कार्यों में प्रयोग करना  यह सम्पूर्ण योजना तप शब्द के व्यापक अर्थ में समाविष्ट है। ऐसे विवेकपूर्ण तप को यहाँ वास्तविक शरीर तप के रूप में प्रमाणित किया गया है।अब? अगले श्लोक में वाङ्मय (वाणी संबंधी) तप को बताते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Worship of the gods, the twice-born, the teachers and the wise, purity, straightforwardness, celibacy and non-injury are called the austerities of the body.

Transliteration

deva-dvija-guru-prājña-pūjanaṃ śaucam ārjavam
brahmacaryam ahiṃsā ca śārīraṃ tapa ucyate

अनुवाद

देवताओं, ब्राह्मणों, गुरुजनों और ज्ञानियों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा — यह शरीर का तप कहा जाता है

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण शारीरिक तप की व्याख्या करते हैं। शरीर के द्वारा किए जाने वाले शुभ कर्मों जैसे पूजनीय जनों का आदर, आंतरिक और बाह्य शुद्धि, सादगी, इंद्रिय-संयम और किसी भी जीव को कष्ट न पहुँचाना शारीरिक तपस्या के अंतर्गत आते हैं। यह त्रिगुणों के आधार पर तप के वर्गीकरण का पहला भाग है।

Translation

Worship of the gods, the twice-born, the teachers, and the wise; purity, straightforwardness, celibacy, and non-violence — this is declared to be the austerity of the body

Meaning

In this verse, Lord Krishna defines the austerity of the body (śārīraṃ tapaḥ). It consists of physical actions that reflect respect for the divine and elders, cleanliness, simplicity, self-restraint, and non-injury to any living being. This is the first of the three types of austerities classified by the Gita.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
देवदेवताओं
द्विजब्राह्मणों
गुरुगुरुजनों
प्राज्ञऔर ज्ञानियों का
पूजनम्पूजन
शौचम्पवित्रता
आर्जवम्सरलता
ब्रह्मचर्यम्ब्रह्मचर्य (इंद्रिय-संयम)
अहिंसाअहिंसा
और
शारीरम्शरीर का
तपःतप
उच्यतेकहा जाता है

Word by word

WordMeaning
devaof the gods
dvijathe twice-born (priests)
guruthe spiritual teachers
prājñaand the wise
pūjanamworship
śaucampurity
ārjavamstraightforwardness
brahmacaryamcelibacy
ahiṃsānon-violence
caand
śārīramof the body
tapaḥausterity
ucyateis said to be