Chapter 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
Bhagavad Gita 17.1
मूल श्लोक :
अर्जुन उवाच
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
(टिप्पणी प0 833.2) अर्जुन बोले -- हे कृष्ण जो मनुष्य शास्त्रविधिका त्याग करके श्रद्धापूर्वक देवता आदिका पूजन करते हैं? उनकी निष्ठा फिर कौनसी है सात्त्विकी है अथवा राजसीतामसी
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
पूर्वाध्याय के अन्त में भगवान् श्रीकृष्ण ने शास्त्रों के प्रामाण्य एवं अध्ययन पर विशेष बल दिया था। उसी बिन्दु से विचार को आगे बढ़ाते हुए अर्जुन यहाँ प्रश्न पूछ रहा है। वह चाहता है कि भगवान् श्रीकृष्ण विस्तृतरूप से इसका विवेचन करें कि किस प्रकार हम प्रभावशाली और लाभदायक आध्यात्मिक जीवन को अपना सकते हैं। इसके साथ ही अध्यात्मविषयक भ्रान्त धारणाओं का भी वे निराकरण करें।शास्त्रविधि को त्यागकर प्राय धर्मशास्त्रों से अनभिज्ञ होने के कारण सामान्य जनों को शास्त्रीय विधिविधान उपलब्ध नहीं होते हैं। यदि शास्त्रों को उपलब्ध कराया भी जाये? तो बहुत कम लोग ऐसे होते हैं? जिनमें तत्प्रतिपादित ज्ञान को समझने की बौद्धित क्षमता होती है। सांसारिक जीवन में कर्मों की उत्तेजनाओं तथा मानसिक चिन्ताओं और व्याकुलता के कारण शास्त्रनिर्दिष्ट मार्ग के अनुसार अपना जीवन सुनियोजित करने की पात्रता हम में नहीं होती। परन्तु? इन सबका अभाव होते हुए भी एक लगनशील साधक को श्रेष्ठतर जीवन पद्धति तथा धर्म के आदर्श में दृढ़ श्रद्धा और भक्ति हो सकती है। इसलिए अर्जुन के प्रश्न का औचित्य सिद्ध होता है।यहाँ प्रयुक्त यज्ञ शब्द से वैदिक पद्धति के होमहवन आदि ही समझना आवश्यक नहीं हैं। गीता सम्पूर्ण शास्त्र है और उसमें उन शब्दों की अपनी परिभाषाएं भी दी गयी है। यज्ञ शब्द की परिभाषा में वे समस्त कर्म समाविष्ट हैं? जिन्हें समाज के लोग अपनी लौकिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए निस्वार्थ भाव से करते हैं। अर्जुन की जिज्ञासा यह है कि जगत् के पारमार्थिक अधिष्ठान को जाने बिना भी यदि मनुष्य यज्ञभावना से कर्म करता है? तो क्या वह परम शान्ति को प्राप्त कर सकता है उसकी स्थिति क्या कही जायेगी अपने प्रश्न को और अधिक स्पष्ट करते हुए वह पूछता है कि ऐसे श्रद्धावान् साधक की निष्ठा कौनसी श्रेणी में आयेगी सात्त्विक ?राजसिक या त्ाामसिक
English Translation By Swami Sivananda
Arjuna said Those who, setting aside the ordinances of the scriptures, perform sacrifice with faith, what is their condition, O Krishna? Is is Sattva, Rajas or Tamas?
Transliteration
arjuna uvāca
ye śāstravidhimutsṛjya yajante śraddhayā'nvitāḥ
teṣāṃ niṣṭhā tu kā kṛṣṇa sattvamāho rajastamaḥअनुवाद
अर्जुन ने कहा — हे कृष्ण! जो मनुष्य शास्त्र की विधि को त्यागकर श्रद्धा से युक्त होकर यजन करते हैं, उनकी वह स्थिति कौन-सी है? क्या वह सात्त्विकी है, राजसी है अथवा तामसी?
भावार्थ
इस अध्याय के आरम्भ में अर्जुन भगवान कृष्ण से उन लोगों की आध्यात्मिक स्थिति के बारे में पूछ रहे हैं जो शास्त्रों के नियमों को नहीं जानते या उनका पालन नहीं करते, परन्तु फिर भी श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करते हैं। अर्जुन यह जानना चाहते हैं कि ऐसे मनुष्यों की निष्ठा को किस श्रेणी में रखा जाए—सत्त्वगुण, रजोगुण या तमोगुण में। यह प्रश्न श्रद्धा और शास्त्र-विधि के सम्बन्ध को स्पष्ट करने के लिए पूछा गया है।
Translation
Arjuna said: O Krishna, what is the state of those who, setting aside the ordinances of the scriptures, perform sacrifice filled with faith? Is it one of goodness, passion, or ignorance?
Meaning
At the beginning of this chapter, Arjuna questions Lord Krishna about the spiritual status of those who disregard scriptural injunctions but still perform worship with faith. He wants to know whether their faith and devotion belong to the mode of goodness (sattva), passion (rajas), or ignorance (tamas). This inquiry seeks to clarify the relationship between formal scriptural rules and the inner quality of human faith.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अर्जुनः | अर्जुन |
| उवाच | ने कहा |
| ये | जो |
| शास्त्र-विधिम् | शास्त्र के नियमों को |
| उत्सृज्य | त्यागकर |
| यजन्ते | पूजा करते हैं |
| श्रद्धया | श्रद्धा से |
| अन्विताः | युक्त होकर |
| तेषाम् | उनकी |
| निष्ठा | स्थिति |
| तु | तो |
| का | क्या है |
| कृष्ण | हे कृष्ण |
| सत्त्वम् | सत्त्वगुण |
| आहो | अथवा |
| रजः | रजोगुण |
| तमः | तमोगुण |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| arjunaḥ | Arjuna |
| uvāca | said |
| ye | who |
| śāstra-vidhim | the ordinances of the scriptures |
| utsṛjya | setting aside |
| yajante | worship |
| śraddhayā | with faith |
| anvitāḥ | endowed |
| teṣām | their |
| niṣṭhā | state |
| tu | indeed |
| kā | what |
| kṛṣṇa | O Krishna |
| sattvam | goodness |
| āho | or |
| rajaḥ | passion |
| tamaḥ | ignorance |