Chapter 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
Bhagavad Gita 16.5
मूल श्लोक :
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डवHindi Translation By Swami Ramsukhdas
दैवीसम्पत्ति मुक्तिके लिये और आसुरीसम्पत्ति बन्धनके लिये है। हे पाण्डव तुम दैवीसम्पत्तिको प्राप्त हुए हो? इसलिये तुम्हें शोक (चिन्ता) नहीं करना चाहिये।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
दैवी और आसुरी गुणों की इतनी विस्तृत सूचियों को श्रवण कर कोई भी लगनशील साधक जानना चाहेगा कि वह किस सम्पदा से सम्पन्न है। प्राय साधकगण अपने अवगुणों के प्रति अधिक जागरूक होते हैं और इस कारण उन्हें स्वयं में दैवी गुणों की सम्पन्नता में पूर्ण विश्वास नहीं हो पाता। सम्भवत? इसी प्रकार की निराशा के भाव अर्जुन के मुख पर देखकर भगवान् श्रीकृष्ण उसे तत्काल सांत्वना देते हुए कहते हैं? हे पाण्डव तुम शोक मत करो? तुम दैवी गुणों के साथ जन्मे हो। यदि कोई विद्यार्थी रुचि और अध्यवसाय के साथ अध्ययन करते हुए गीता के इस अध्याय तक पहुँच जाता है? तो यही इस तथ्य का प्रमाण है कि वह दैवी सम्पदा से सम्पन्न है यहाँ सदाचार की सुन्दरता और दुराचार की कुरूपता का वर्णन करने का प्रय़ोजन सत्पुरुषों को नित्य स्वर्ग का और असत्पुरुषों को नित्य नारकीय यातनाओं का भोग करने हेतु भेजने का नहीं है यहाँ? विषय वस्तु के विवेचन का वैज्ञानिक आधार है। नैतिक गुणों का पालन करना मनुष्य की क्षीण शक्तियों और कलान्त प्रेरणाओं को पुनर्जीवित करने का बुद्धिमत्तापूर्ण साधन है। इन गुणों को अपने जीवन में जीने से? मनुष्य स्वनिर्मित संकल्पों के बन्धनों से मुक्त हो जाता है दैवी सम्पदा मोक्ष का साधन है। इसके विपरीत? पापी पुरुषों के द्वारा अनुचरित दुष्प्रवृत्तियाँ मनुष्य को भ्रान्ति और दुख के साथ बांध कर रखती हैं और उसे अपने आन्त्ारिक व्यक्तित्व के विकास से वंचित रखती हैं आसुरी सम्पदा बन्धन का कारण है।तुम शोक मत करो कभीकभी साधकगण अत्यधिक भावुक बनकर निराश हो जाते हैं। तब उनकी प्रवृत्ति अपनी ही आलोचना करने की ओर हो जाती है। परिणामस्वरूप वे विषाद और अवसाद को प्राप्त होते हैं? जो कि एक प्रकार का मानसिक रोग है। ऐसा पुरुष कभी भी स्वयं में शक्तिवर्धक प्रसन्नता? आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प को नहीं पाता है जो कि आत्मनिरीक्षण और आत्मोपचार के लिए आवश्यक होते हैं। सदाचार का जीवन अपने आप में ही इस प्रकार के कुछ रोगों का उपचार कर देता है। हिन्दुओं की दृष्टि में? पापी पुरुष कोई मानसिक रूप से कुष्ठ रोगी नहीं है और न ही वह सर्वशक्तिमान् ईश्वर की विफलता का द्योतक है। वेदान्ती लोग असुर या राक्षस को ईश्वर के लिए नित्य चुनौती के रूप में नहीं देखते हैं।दुर्बलता और अज्ञान से युक्त शुभ ही अशुभ कहलाता है और इन दोषों से मुक्त अशुभ ही शुभ बन जाता है। धूलि से आच्छादित दर्पण अपने समक्ष स्थित वस्तु को प्रतिबिम्बित नहीं कर पाता परन्तु इसका कारण दर्पण की अक्षमता न होकर उस पर धूलि का आच्छादन है? जो वस्तुत उससे भिन्न है। दर्पण को स्वच्छ कर देने पर उसमें वस्तु का प्रतिबिम्ब स्पष्ट प्रकाशित होता है। इसी प्रकार? एक दुराचारी पुरुष के हृदय में भी सच्चित्स्वरूप आत्मा का प्रकाश विद्यमान होता है। परन्तु? दुर्भाग्य है कि वह प्रकाश उस पुरुष की अपनी ही मिथ्या धारणाओं एवं असत् मूल्यों के कारण आच्छादित रहता है।अब? असुरों का विशेष अध्ययन करने की दृष्टि से भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
The divine nature is deemed conducive to liberation, and the demoniacal to bondage. Grieve not, O Arjuna, thou art born with divine endowments.
Transliteration
daivī sampadvimokṣāya nibandhāyāsurī matā
mā śucaḥ sampadaṃ daivīmabhijāto'si pāṇḍavaअनुवाद
दैवी सम्पदा मोक्ष के लिए और आसुरी सम्पदा बन्धन के लिए मानी गई है हे पाण्डव! तुम शोक मत करो, क्योंकि तुम दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए हो
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि दैवी गुण मनुष्य को मुक्ति की ओर ले जाते हैं, जबकि आसुरी गुण उसे संसार के बन्धन में बाँधते हैं। अर्जुन को युद्ध के इस धर्मसंकट में व्याकुल देखकर कृष्ण कहते हैं कि उसे शोक करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह जन्म से ही दैवी गुणों से युक्त है। यह आश्वासन अर्जुन के भीतर के संशय और शोक को दूर करने के लिए दिया गया है।
Translation
The divine destiny is deemed to lead to liberation, and the demonic to bondage Do not grieve, O Pandava, for you are born with divine qualities
Meaning
In this verse, Lord Krishna reassures Arjuna that divine qualities lead to liberation, whereas demonic qualities lead to bondage. Seeing Arjuna in grief and dilemma, Krishna comforts him by stating that he need not worry as he is born with divine virtues. This assurance is meant to dispel Arjuna’s anxiety about his duty and spiritual standing.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| दैवी | दैवी (दिव्य) |
| सम्पत् | सम्पदा (गुण) |
| विमोक्षाय | मुक्ति के लिए |
| निबन्धाय | बन्धन के लिए |
| आसुरी | आसुरी सम्पदा |
| मता | मानी गई है |
| मा | मत |
| शुचः | शोक करो |
| सम्पदम् | सम्पदा को |
| दैवीम् | दैवी |
| अभिजातः | उत्पन्न (युक्त) |
| असि | तुम हो |
| पाण्डव | हे पाण्डव (अर्जुन) |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| daivī | the divine |
| sampat | wealth (qualities) |
| vimokṣāya | for liberation |
| nibandhāya | for bondage |
| āsurī | the demonic |
| matā | is considered |
| mā | do not |
| śucaḥ | grieve |
| sampadaṃ | qualities |
| daivīm | divine |
| abhijātaḥ | born with |
| asi | you are |
| pāṇḍava | O son of Pandu |