श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग

Bhagavad Gita 16.4

मूल श्लोक :

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे पृथानन्दन दम्भ करना? घमण्ड करना? अभिमान करना? क्रोध करना? कठोरता रखना और अविवेकका होना भी -- ये सभी आसुरीसम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

केवल एक श्लोक की परिसीमा में ही जगत् के कुरूप व्यक्तित्व के पुरुषों की कुरूपता का इतना बोधगम्य वर्णन इसके पूर्व कभी नहीं किया गया था। आसुरी प्रवृत्तियों के प्रकार अनेक हैं? परन्तु यहाँ केवल कुछ मुख्य दुर्गुणों का उल्लेख किया गया है? जिनके द्वारा हम उन समस्त आसुरी शक्तियों को समझ सकते हैं? जो कभी भी मनुष्य के हृदय में व्यक्त होकर अपना विनाशकारी प्रभाव दिखा सकती हैं। इन सबको जानने का लाभ यह होगा कि हम अपने हृदय से अवांछित प्रवृत्तियों को दूर कर सकते हैं? और इस प्रकार हमें अपने विकास के लिए एक महत् शक्ति उपलब्ध हो सकती है।दम्भ  श्री शंकाराचार्य के अनुसार दम्भ का अर्थ है  वास्तव में अधार्मिक होते हुए भी स्वयं को धार्मिक व्यक्ति के रूप में प्रकट करना। दूसरे शब्दों में? स्वयं को वस्तुस्थिति से अन्यथा प्रकट करना दम्भ है। यह अत्यन्त निम्नस्तर का रूप है? जिसे पापी? दुराचारी लोग धारण करते हैं। उनकी यह सतही साधुता और शुद्धता? धार्मिकता और निष्कपटता वस्तुत अपने घातक उद्देश्यों और दुष्ट संकल्पों को आवृत करने के आकर्षक आवरण हैं।दर्प  धन? जन? यौवन? ज्ञान? सामाजिक प्रतिष्ठा इत्यादि का अत्याधिक गर्व (दर्प) मनुष्य को एक असह्य प्रकार की उच्चता प्रदान करता है। तत्पश्चात् वह मनुष्य जगत् की घटनाओं की ओर आत्मवंचक विपरीत ज्ञान के माध्यम से देखता है और अपने ही काल्पनिक आत्मसम्मान के जगत् में रहता है। फलत? इस दर्प के कारण? वह आन्तरिक शान्ति से वंचित रह जाता है। ऐसा मनुष्य अपने ही समाज के लोगों के प्रेम से निष्कासित हो जाता है। दर्प युक्त पुरुष जगत् में एकाकी रह जाता है। केवल काल्पनिक आत्मसम्मान और अपनी महानता के स्वप्न ही उसके मित्र होते हैं। उसके वैभव को केवल वही स्वयं देख पाता है और अन्य कोई नहीं। ऐसा पुरुष स्वाभाविक ही अभिमानी बन जाता है।क्रोध  दम्भ? दर्प और अभिमान से युक्त पुरुष जब यह पाता है कि लोगों की उसके विषय में जो धारणायें हैं? वे उसकी अपनी धारणाओं से सर्वथा भिन्न हैं? तब उसका मन विद्रोह कर उठता है? जो प्रत्येक वस्तु की ओर क्रोध के रूप में प्रकट होता है। क्रोधावेश से अभिभूत ऐसे पुरुष के कर्मों और वाणी में लोगों को व्यग्र कर देने वाली कठोरता (पारुष्य) और धृष्टता का होना अनिवार्य है।उपर्युक्त दम्भ? दर्प आदि का एकमात्र कारण है  आत्म अज्ञान। वह न स्वयं को जानता है और न अपने आसपास की जगत् की संरचना को जानता है। परिणाम यह होता है कि वह यह नहीं समझ पाता कि उसको जगत् के साथ किस प्रकार का सुखद सम्बन्ध रखना चाहिए। सारांशत? वह नितान्त अहंकार केन्द्रित हो जाता है और वह चाहता है कि बाह्य जगत् उसकी अपेक्षाओं और इच्छाओं के अनुकूल और अनुरूप रहे। इतना ही नहीं? अपितु वह अपने कार्यक्षेत्र के कार्यकर्ताओं के लिए एक मूर्खतापूर्ण आचारसंहिता प्रस्तुत करता है और अपेक्षा करता है कि वे ठीक उसी के अनुसार व्यवहार करें। स्वयं के तथा जगत् के विषय में यह जो अज्ञान है? यही वह गुप्त कारण है जिसके वशीभूत पुरुष समाज के विरुद्ध विद्रोह कर विक्षिप्त के समान व्यवहार करता है।यह है आसुरी सम्पदा अर्थात् असुरों के गुण। इस श्लोक में चित्रित आसुरी सम्पदा की पृष्ठभूमि में? पूर्व वर्णित दैवी सम्पदा अधिक आकर्षक ढंग से उजागर होती है।अब? इन दोनों प्रकार की सम्पदाओं के कार्य अर्थात् फल बताते हैं।

English Translation By Swami Sivananda

Hypocrisy, arrogance and self-conceit, anger and also harshness and ignorance, belong to one who is born for a demoniacal state, O Partha (Arjuna).

Transliteration

dambho darpo'bhimānaśca krodhaḥ pāruṣyameva ca
ajñānaṃ cābhijātasya pārtha sampadamāsurīm

अनुवाद

हे पार्थ! पाखंड, घमंड, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान भी — ये सब आसुरी संपदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण आसुरी (राक्षसी) स्वभाव के मुख्य लक्षणों का वर्णन कर रहे हैं। पाखंड, घमंड, क्रोध और अज्ञान जैसे दुर्गुण व्यक्ति को पतन की ओर ले जाते हैं। अर्जुन को ‘पार्थ’ कहकर वे सचेत करते हैं कि इन अवगुणों को पहचानकर इनसे दूर रहना चाहिए।

Translation

Hypocrisy, arrogance, self-conceit, anger, harshness, and ignorance — these, O Partha, belong to one born with a demoniac nature

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes the primary traits of a person born with a demoniac (asuric) disposition. Qualities like hypocrisy, pride, anger, and ignorance lead to spiritual degradation. By addressing Arjuna as ‘Partha’, Krishna prepares him to distinguish these negative traits from divine virtues.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
दम्भःपाखंड (दिखावा)
दर्पःघमंड
अभिमानःअहंकार
चऔर
क्रोधःक्रोध
पारुष्यम्कठोरता
एवही
चऔर
अज्ञानम्अज्ञान
चऔर
अभिजातस्यउत्पन्न हुए पुरुष के
पार्थहे पृथापुत्र (अर्जुन)
सम्पदम्सम्पदा को (लक्षणों को)
आसुरीम्आसुरी (राक्षसी)

Word by word

WordMeaning
dambhaḥhypocrisy
darpaḥarrogance
abhimānaḥself-conceit
caand
krodhaḥanger
pāruṣyamharshness
evaindeed
caand
ajñānamignorance
caand
abhijātasyaof one born to
pārthaO son of Pritha (Arjuna)
sampadamqualities / wealth
āsurīmdemoniac