Chapter 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
Bhagavad Gita 16.3
मूल श्लोक :
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारतHindi Translation By Swami Ramsukhdas
तेज (प्रभाव)? क्षमा? धैर्य? शरीरकी शुद्धि? वैरभावका न रहना और मानको न चाहना? हे भरतवंशी अर्जुन ये सभी दैवी सम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
तेज यह केवल मुखमण्डल की ही आभा नहीं है? जो पौष्टिक आहार और पर्याप्त विश्राम से प्राप्त होती है। तेज शब्द से ज्ञानी पुरुष के मात्र शारीरिक सौन्दर्य या तेज से ही अभिप्राय नहीं है। अध्यात्म की आभा कोई ऐसा प्रभामण्डल नहीं है? जो ज्ञानी के मुख के चारों ओर अग्निवृत के समान जगमगाता हो। तत्त्वदर्शी ऋषि का तेज है? उसकी बुद्धि की प्रतिभा? नेत्रों में जगमगाता आनन्द? सन्तप्त हृदयों को शीतलता प्रदान करने वाली शान्ति की सुरभि? कर्मों में उसका अविचलित सन्तुलन? प्राणिमात्र के प्रति उसके हृदय में स्थित प्रेम का आनन्द और उसके अन्तरतम से प्रकाशित आनन्द का प्रकाश। यह तेज ही उस ऋषि के व्यक्तित्व का प्रबल आकर्षण होता है? जो प्रचुर शक्ति और उत्साह के साथ सब की सेवा करता है और उसी में स्वयं को धन्य समझता है।क्षमा जिस सन्दर्भ में इस गुण का उल्लेख किया गया है? उससे इसका अर्थ गाम्भीर्य बढ़ जाता है। सामान्य दुख और कष्ट? अपमान और पीड़ा को धैर्यपूर्वक सहन करनै की क्षमता ही क्षमा का सम्पूर्ण अर्थ नहीं है। बाह्य जगत् के अत्यधिक शक्तिशाली विरोध तथा उत्तेजित करने वाली परिस्थितयों के होने पर भी उनका सामना करने का सूक्ष्म कोटि का साहस और अविचलित शान्ति का नाम क्षमा है।धृति जब कोई व्यक्ति साहसपूर्वक जीना चाहता है? तब वह अपने जीवन में सदैव सुखद वातावरण? अनुकूल परिस्थितयाँ और अपने कार्य में सफलता के सहायक सुअवसरों को प्राप्त करने की अपेक्षा नहीं कर सकता है। सामान्यत? एक दुर्बल व्यक्तित्व के पुरुष को अचानक निराशा आकर घेर लेती है और वह कार्य को अपूर्ण ही छोड़कर अपने कार्य क्षेत्र से निवृत्त हो जाता है। अनेक लोग तो ऐसे समय हतोत्साह होकर कार्य को त्याग देते हैं? जब विजयश्री उन्हें वरमाला पहनाने को तत्पर हो रही होती है निश्चल भाव से कार्यरत रहने के लिए मनुष्य को एक अतिरिक्त शक्ति की आवश्यकता होती है? जिसके द्वारा वह अपनी क्लान्त और श्रान्त आस्था काे पोषित कर दृढ़ बना सकता है। पुन एक युक्त पुरुष में निहित वह गुप्त शक्ति है धृति अर्थात् धैर्य। श्रद्धा की शक्ति? लक्ष्य में आस्था? उद्देश्य की एकरूपता? आदर्श का स्पष्ट दर्शन और त्याग की साहसिक भावना ये सब वे शक्ति श्रोत हैं? जहाँ से धृति की बूंदें रिसती हुई प्रवाहित होकर श्रम? अवसाद एवं निराशा आदि का परिहार करती हैं।शौचम् (शुद्धि) यह शब्द न केवल अन्तकरण के विचारों एवं उद्देश्यों की शुद्धि को इंगित करता है? वरन् इसके द्वारा वातावरण की शुद्धि? अपने वस्त्रों की और वस्तुओं की स्वच्छता भी सूचित की गयी है। आन्तरिक शुद्धि पर ही अत्यधिक बल देने के फलस्वरूप हम अपने समाज में बाह्य शुद्धि की सर्वथा उपेक्षा की जाते हुए देखते हैं। वस्त्रों की तथा नगर की स्वच्छता हमारे राष्ट्र में दुर्लभ हो गयी है। यद्यपि हमारे धर्म में साधक के लिए शुद्धि और स्वच्छता इन दोनों को ही अपरिहार्य बताया गया है? तथापि धर्णप्राण भक्तगण भी इनके प्रति उदासीन ही दिखाई देते हैं।अद्रोह अहिंसा का अर्थ है? किसी को भी पीड़ा न पहुँचाना और अद्रोह का अर्थ है मन में कभी हिंसा का भाव न उठना। जैसे? कोई भी व्यक्ति कभी स्वप्न में भी स्वयं को पीड़ित करने का विचार नहीं करता? वैसे ही आत्मैकत्व का बोध प्राप्त पुरुष के मन में किसी के प्रति भी द्रोह की भावना नहीं आती? क्योंकि अन्य को कष्ट देने का अर्थ स्वयं को ही पीड़ित करना है।न अतिमानिता इसका अर्थ है स्वयं की पूजनीयता के विषय में अतिशयोक्ति पूर्ण विचार न रखना। अतिमान के नहीं होने पर मनुष्य स्वयं को तत्काल ही सहस्रों अपरिहार्य उत्तेजनाओं से तथा अनावश्यक उत्तरदायित्वों से मुक्त कर सकता है। गर्वमुक्त पुरुष के लिए जीवन पक्षी के पंख के समान भारहीन होता है? जबकि एक अतिमानी पुरुष के लिए अपना जीवन प्राणदण्ड की शूली के समान बन जाता है? जिसे अत्यन्त कष्टपूर्वक वहन करते हुए उसे चलना पड़ता है? जब कि वह शूली उसके कंधों के मांस को निर्दयतापूर्वक छील रही होती है।उपर्युक्त छब्बीस गुण दैवीसम्पदा से सम्पन्न व्यक्ति के स्वभाव का पूर्ण चित्रण करते हैं। पूर्णत्व प्राप्ति के सभी इच्छुक साधकों के मार्गदर्शन के रूप में इन गुणों का यहाँ उल्लेख किया गया है। जिस मात्रा में? उपर्युक्त दैवीगुणों के अनुरूप हम अपने जीवन को पुर्नव्यवस्थित करने में सक्षम होते हैं और जीवन की ओर देखने के अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन ला सकते हैं? उसी मात्रा में हम अपनी शक्तियों के निष्प्रयोजक व्यय को अवरुद्ध कर उन्हें सुरक्षित रख सकते हैं। इन जीवन मूल्यों का सम्मान करते हुए उन्हें जीने का अर्थ ही सम्यक् जीवन पद्धति को अपनाना है।अब? आसुरी सम्पदा का वर्णन करते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Vigour, forgiveness, fortitude, purity, absence of hatred, absence of pride these belong to the one born for a divine state, O Arjuna.
Transliteration
tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucamadroho nātimānitā
bhavanti sampadaṃ daivīmabhijātasya bhārataअनुवाद
तेज, क्षमा, धैर्य, शुद्धि, किसी के प्रति द्रोह-भाव का न होना और अभिमान का न होना — हे भरतवंशी अर्जुन! ये सब दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण दैवी गुणों की सूची को पूर्ण करते हैं। तेज, क्षमा, धैर्य, बाह्य और आंतरिक शुद्धि, किसी के प्रति शत्रुता का न होना और स्वयं में पूज्यता के अभिमान का अभाव — ये सभी गुण दैवी स्वभाव वाले व्यक्ति में स्वाभाविक रूप से पाए जाते हैं। अर्जुन को ‘भारत’ कहकर संबोधित करते हुए वे स्पष्ट करते हैं कि अर्जुन में ये सभी उत्तम गुण विद्यमान हैं।
Translation
Vigor, forgiveness, fortitude, purity, freedom from malice, and absence of pride — these, O descendant of Bharata, belong to one born with a divine nature
Meaning
In this verse, Lord Krishna completes the list of divine qualities. Vigor, forgiveness, fortitude, purity, freedom from malice, and the absence of excessive pride are the final traits that characterize a person born with a divine nature. By addressing Arjuna as ‘Bhārata’, Krishna reassures him of his own noble and divine heritage.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| तेजः | तेज (आत्मिक बल) |
| क्षमा | क्षमाशीलता |
| धृतिः | धैर्य |
| शौचम् | बाहर-भीतर की शुद्धि |
| अद्रोहः | द्रोह-भाव का न होना (किसी से शत्रुता न रखना) |
| न | नहीं |
| अतिमानिता | अत्यधिक अभिमान |
| भवन्ति | होते हैं |
| सम्पदम् | सम्पदा को |
| दैवीम् | दैवी |
| अभिजातस्य | उत्पन्न हुए पुरुष के (लक्षण) |
| भारत | हे भरतवंशी अर्जुन |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| tejaḥ | vigor (spiritual power) |
| kṣamā | forgiveness |
| dhṛtiḥ | fortitude |
| śaucam | purity (cleanliness) |
| adrohaḥ | freedom from malice |
| na | not |
| atimānitā | excessive pride |
| bhavanti | are (manifested) |
| sampadaṃ | wealth / qualities |
| daivīm | divine |
| abhijātasya | of one born with |
| bhārata | O descendant of Bharata |