श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग

Bhagavad Gita 16.24

मूल श्लोक :

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

अतः तेरे लिये कर्तव्यअकर्तव्यकी व्यवस्थामें शास्त्र ही प्रमाण है -- ऐसा जानकर तू इस लोकमें शास्त्रविधिसे नियत कर्तव्य कर्म करनेयोग्य है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

पूर्व के तीन श्लोकों में दी गई युक्तियों का यह निष्कर्ष निकलता है कि साधक को शास्त्र प्रमाण के अनुसार अपनी जीवन पद्धति अपनानी चाहिए। कर्तव्य और अकर्तव्य का निश्चय शास्त्राध्ययन के द्वारा ही हो सकता है। सत्य की प्राप्ति के मार्ग को निश्चित करने में प्रत्येक साधक अपनी ही कल्पनाओं का आश्रय नहीं ले सकता । शास्त्रों की घोषणा उन ऋषियों ने की है? जिन्होंने इस मार्ग के द्वारा पूर्णत्व का साक्षात्कार किया था। अत जब उन ऋषियों ने हमें उस मार्ग का मानचित्र दिया है? तो हमारे लिए यही उचित है कि विनयभाव से उसका अनुसरण कर स्वयं को कृतार्थ करें।ज्ञात्वा  इसलिए आत्मदेव की तीर्थयात्रा प्रारम्भ करने के पूर्व हमें इन शास्त्रों का बुद्धिमत्तापूर्वक अध्ययन करना चाहिए। लक्ष्य? मार्ग? विघ्न और विघ्न के निराकरण के उपायों का जानना किसी भी यात्रा के लिए अत्यावश्यक और लाभदायक होता है।तुम्हें कर्म करना चाहिए  अनेक लोग शास्त्र को जानते हैं?परन्तु ऐसे अत्यन्त विरले लोग ही होते हैं? जिनमें शास्त्रोपदिष्ट जीवन जीने का साहस? दृढ़ संकल्प और आत्मानुभूति के लक्ष्य की प्राप्ति होने तक धैर्य बना रहता है। इसलिए? भगवान् श्रीकृष्ण का यह उपदेश है कि काम? क्रोध और लोभ का त्याग कर मनुष्य को शास्त्रानुसार जीवन यापन करना चाहिए। यही कर्मयोग का जीवन है।conclusion तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसंपद्विभागयोगो नाम षोढशोऽध्याय।।

English Translation By Swami Sivananda

Therefore, let the scripture be thy authority in determining what ought to be done and what ought not to be done. Having known what is said in the ordinance of the scriptures, thou shouldst act here in this world.

Transliteration

tasmāc chāstraṃ pramāṇaṃ te kāryākāryavyavasthitau
jñātvā śāstravidhānoktaṃ karma kartum ihārhasi

अनुवाद

इसलिए तुम्हारे लिए कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। शास्त्र के विधान द्वारा कहे गए कर्म को जानकर तुम यहाँ कर्म करने के योग्य हो।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि जीवन में क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इसका निर्णय व्यक्तिगत इच्छाओं के बजाय शास्त्रों के अनुसार होना चाहिए। शास्त्र हमें धर्म और अधर्म का सही मार्ग दिखाते हैं। अतः मनुष्य को शास्त्रों के नियमों को समझकर उसी के अनुरूप अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

Translation

Therefore, let the scripture be your authority in determining what ought to be done and what ought not to be done. Having known what is declared by the ordinances of the scripture, you should perform your duty here.

Meaning

In this verse, Lord Krishna emphasizes that scriptures should be the ultimate authority for determining duty and non-duty, rather than personal whims. Scriptures provide the objective framework for righteous living (dharma). Therefore, one must understand the scriptural injunctions and perform their prescribed duties accordingly in this world.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
तस्मात्इसलिए
शास्त्रम्शास्त्र
प्रमाणम्प्रमाण (प्राधिकरण)
तेतुम्हारे लिए
कार्यकर्तव्य
अकार्यऔर अकर्तव्य की
व्यवस्थितौव्यवस्था में
ज्ञात्वाजानकर
शास्त्रशास्त्र के
विधानविधान द्वारा
उक्तम्कहे गए
कर्मकर्म को
कर्तुम्करने के लिए
इहइस संसार में
अर्हसितुम योग्य हो

Word by word

WordMeaning
tasmāttherefore
śāstramthe scripture
pramāṇamthe authority
tefor you
kāryawhat ought to be done
akāryaand what ought not to be done
vyavasthitauin determining
jñātvāknowing
śāstraof scripture
vidhānaby the rules
uktamdeclared
karmaaction
kartumto perform
ihain this world
arhasiyou should