श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग

Bhagavad Gita 16.23

मूल श्लोक :

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

(टिप्पणी प0 829) जो मनुष्य शास्त्रविधिको छोड़कर अपनी इच्छासे मनमाना आचरण करता है? वह न सिद्धि(अन्तःकरणकी शुद्धि) को? न सुखको और न परमगतिको ही प्राप्त होता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

गीताचार्य भगवान् श्रीकृष्ण का उपदेश यह है कि कामक्रोधादि आत्मघातक अवगुणों के त्याग से आन्तरिक शक्तियों का जो संचय किया जाता है? उसका आत्मोन्नति के लिए सदुपयोग करना चाहिए। ऐसा न करने पर मनुष्य का जो पतन होता है? उससे पुन ऊपर उठना अति कठिन हो जाता है। रावणादि के समान असुरों का चरित्र इस तथ्य का विशिष्ट प्रमाण है। ये असुर तपश्चर्या के द्वारा असीम शक्तियां प्राप्त करते थे? परन्तु उसके दुरुपयोग करके वे आत्मनाश ही करते थे  उनकी शक्तियां ऐसी अद्भुत और भयंकर थीं कि उन्होंने अपनी पीढ़ी को हिला दिया था और उसे चूरचूर कर पृथ्वी की धूल चटा दी थी। स्वयं को तथा इस जगत् को अनर्थ से सुरक्षित रख्ाने के लिए लोगों को गम्भीर चेतावनी की आवश्यकता है। इन अन्तिम दो श्लोकों में यही चेतावनी दी गयी है।जो पुरुष शास्त्रविधि की उपेक्षा करके अपनी स्वच्छन्द प्रकृति के अनुसार ही काम करता है? उसे वस्तुत किसी प्रकार का भी लाभ नहीं होता। यहाँ शास्त्र शब्द से कठिन और विस्तृत कर्मकाण्ड को ही समझना आवश्यक नहीं है? जिसका अनुष्ठान और उपदेश रूढ़िवादी लोग विशेष बल देकर करते हैं। ब्रह्यविद्या का तथा तत्प्राप्ति के साधनों का उपदेश जिन ग्रन्थों में दिया गया है उन्हें यहाँ शास्त्र कहा गया है। ऐसे ग्रन्थ मुख्यत उपनिषद् हैं। वेदान्त के प्रतिपाद्य विषय तथा परिभाषिक शब्दावली का वर्णन करने वाले ग्रन्थों को प्रकरण ग्रन्थ कहा जाता हैं। गीता में ब्रह्मविद्या तथा तत्प्राप्ति के साधन उपदिष्ट है? इसलिए गीता भी शास्त्र ही है।कामकारत  प्रस्तुत खण्ड में काम? क्रोध और लोभ के त्याग का उपदेश दिया गया है। हमने यह देखा कि क्रोध और लोभ का मूल कारण काम ही है। इसलिए? भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ केवल काम का ही उल्लेख करते हुए कहते हैं कि काम से प्रेरित मनुष्य को परम लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती।वह न सिद्धि प्राप्त करता है न सुख और न परा गति। गीता के उपदेश का पालन न करने से क्या हानि होगी  इसका उत्तर यह है कि कामना से प्रेरित? लोभ से प्रोत्साहित और क्रोध से विक्षिप्त पुरुष सदैव अशान्ति और क्रूर मनाद्वेगों से पूर्ण जीवन को ही प्राप्त करता है। ऐसा पुरुष न सुख प्राप्त करता है और न आत्मविकास।अत? निष्कर्ष यह निकलता है कि

English Translation By Swami Sivananda

He who, having cast aside the ordinances of the scriptures, acts under the impulse of desire, attains not perfection, nor happiness nor the Supreme Goal.

Transliteration

yaḥ śāstravidhimutsṛjya vartate kāmakārataḥ
na sa siddhimavāpnoti na sukhaṃ na parāṃ gatim

अनुवाद

जो मनुष्य शास्त्र की विधि को त्यागकर अपनी इच्छा के अनुसार आचरण करता है, वह न तो सिद्धि को प्राप्त करता है, न सुख को और न ही परम गति को।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण शास्त्रसम्मत आचरण के महत्व पर बल देते हैं। जो व्यक्ति शास्त्रों के नियमों और मर्यादाओं की उपेक्षा करके केवल अपनी वासनाओं और इच्छाओं के वश में होकर जीता है, उसे जीवन में वास्तविक सफलता या मानसिक शांति नहीं मिल सकती। ऐसा आचरण मनुष्य को आध्यात्मिक पतन की ओर ले जाता है और वह मोक्ष रूपी परम गति से वंचित रह जाता है।

Translation

He who, discarding the injunctions of the scriptures, acts under the impulse of desire, attains neither perfection, nor happiness, nor the supreme goal.

Meaning

In this verse, Lord Krishna emphasizes the importance of following scriptural injunctions. A person who ignores the rules of the scriptures and acts solely out of personal desire and whim cannot achieve spiritual perfection or inner peace. Such self-willed behavior leads to spiritual degradation, preventing one from attaining the ultimate goal of liberation.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
यःजो
शास्त्र-विधिम्शास्त्र के विधान को
उत्सृज्यत्यागकर
वर्ततेआचरण करता है
काम-कारतःइच्छाओं के वश में होकर (स्वेच्छाचारी बनकर)
नहीं
सःवह
सिद्धिम्सिद्धि को (सफलता को)
अवाप्नोतिप्राप्त करता है
सुखम्सुख को
पराम्परम
गतिम्गति को (मुक्ति को)

Word by word

WordMeaning
yaḥwho
śāstra-vidhimthe injunctions of the scriptures
utsṛjyadiscarding
vartateacts
kāma-kārataḥunder the impulse of desire
nanot
saḥhe
siddhimperfection
avāpnotiattains
nanot
sukhamhappiness
nanot
parāmthe supreme
gatimdestination (goal)