श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग

Bhagavad Gita 16.20

मूल श्लोक :

असुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे कुन्तीनन्दन वे मूढ मनुष्य मेरेको प्राप्त न करके ही जन्मजन्मान्तरमें आसुरी योनिको प्राप्त होते हैं? फिर उससे भी अधिक अधम गतिमें अर्थात् भयङ्कर नरकोंमें चले जाते हैं।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि जब तक मनुष्य अपनी आसुरी प्रवृत्तियों के वश में उनका दास बना रहता है तब तक वह उसी प्रकार के हीन जन्मों को प्राप्त होता रहता है। वह आत्मा के परमानन्द स्वरूप का अनुभव नहीं कर पाता है।अब तक दैवी और आसुरी सम्पदाओं का स्पष्ट एवं विस्तृत विवेचन किया गया है। बहुसंख्यक लोगों की न्यूनाधिक मात्रा में असुरों की श्रेणी में ही गणना की जा सकती है। परन्तु एक आध्यात्मिक साधक को केवल ऐसे वर्णनों से सन्तोष नहीं होता। वह अपनी पतित अवस्था से स्वयं का उद्धार करना चाहता है। अत? अब भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से मानवमात्र के आत्मविकास का पथ प्रदर्शन करते हैं। कोई भी व्यक्ति नित्य निरन्तर नारकीय यातनाओं का ही भागीदार नहीं हो सकता है शाश्वत नरक प्राप्ति का मत अयुक्तियुक्त और अदार्शनिक है।भगवान् कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Entering into demoniacal wombs and deluded, birth after birth, not attaining Me, they thus fall, O Arjuna, into a condition still lower than that.

Transliteration

āsurīṃ yonimāpannā mūḍhā janmani janmani
māmaprāpyaiva kaunteya tato yāntyadhamāṃ gatim

अनुवाद

हे कुन्तीपुत्र! वे मूढ़ मनुष्य जन्म-जन्म में आसुरी योनि को प्राप्त होकर, मुझे न पाकर ही, उससे भी अति नीच गति को प्राप्त होते हैं।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण आसुरी स्वभाव वाले मनुष्यों के अंतिम पतन का वर्णन कर रहे हैं। वे बताते हैं कि जो लोग द्वेष और अहंकार से भरे होते हैं, वे बार-बार पशु, पक्षी या क्रूर मनुष्यों जैसी नीच योनियों में जन्म लेते हैं। ईश्वर की प्राप्ति के मार्ग से पूरी तरह भटक जाने के कारण, उनका निरंतर आध्यात्मिक पतन होता रहता है और वे अंततः घोर अंधकारमय गतियों को प्राप्त होते हैं।

Translation

O son of Kunti, obtaining demonic wombs birth after birth, those deluded souls, failing to reach Me, sink into the lowest state of existence.

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes the ultimate downfall of those possessing demonic qualities. He explains that due to their hatred and ego, these deluded souls are repeatedly reborn into lower, animalistic, or degraded species. Failing to attain the path toward God, they sink progressively lower into the darkest regions of existence.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
आसुरीम्आसुरी (राक्षसी)
योनिम्योनि को
आपन्नाःप्राप्त हुए
मूढाःमूर्ख लोग
जन्मनिजन्म में
जन्मनिजन्म में
माम्मुझको
अप्राप्यन पाकर
एवही
कौन्तेयहे कुन्तीपुत्र (अर्जुन)
ततःउससे (भी)
यान्तिप्राप्त होते हैं
अधमाम्अत्यंत नीच
गतिम्गति को

Word by word

WordMeaning
āsurīmdemonic
yonimwomb / species
āpannāḥhaving attained
mūḍhāḥthe deluded ones
janmaniin birth
janmaniin birth
māmMe
aprāpyawithout attaining
evaindeed
kaunteyaO son of Kunti
tataḥthan that
yāntithey go to
adhamāmthe lowest
gatimdestination / state