Chapter 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
Bhagavad Gita 16.18
मूल श्लोक :
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
वे अहङ्कार? हठ? घमण्ड? कामना और क्रोधका आश्रय लेनेवाले मनुष्य अपने और दूसरोंके शरीरमें रहनेवाले मुझ अन्तर्यामीके साथ द्वेष करते हैं तथा (मेरे और दूसरोंके गुणोंमें) दोषदृष्टि रखते हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
एक बार अहंकार के वशीभूत हो जाने पर मनुष्य का पशु से भी निम्नतम स्तर तक निरन्तर पतन होता जाता है। कामना से उन्मत्त वह पुरुष सुसंस्कृत मानव की प्रतिष्ठा से पदच्युत हो जाता है और तत्पश्चात् एक प्रभावहीन पशु के समान संदिग्ध रूप में समाज में विचरण करता है ऐसा व्यक्ति शारीरिक दृष्टि से मनुष्य होते हुए भी मानसिक दृष्टि से पशु ही होता है। इस श्लोक में इन्हीं आसुरी लोगों का वर्णन किया गया है।यहाँ उल्लिखित अहंकारादि अवगुणों में से एक अवगुण भी भ्रष्टता के तल तक गिराने के लिए पर्याप्त है? परन्तु भगवान् कहते हैं कि आसुरी पुरुष इन सभी अवगुणों से युक्त होता है। इतना ही नहीं? अपितु वह इन्हें ही श्रेष्ठ गुण मानकर इनका अवलम्बन भी करता है। इनकी अभिव्यक्ति में ही वह सन्तोष का अनुभव करता है।प्राय नवयुवकों को यह उपदेश दिया जाता है कि उन्हें अपनी निम्नस्तर की हीन प्रवृत्तियों के प्रलोभनों का शिकार नहीं बनना चाहिए। कोई स्वच्छन्द प्रवृत्ति का युवक प्रश्न पूछ सकता है कि इसमें क्या हानि है गीताचार्य कहते हैं कि सभी सांस्कृतिक मूल्यों का अपमान करते हुए अहंकार स्वार्थ और कामुकता का जीवन जीने का परिणाम सम्पूर्ण नाश है।उपर्युक्त आसुरी गुणों से युक्त लोग जीवन की पवित्रता की उपेक्षा करेंगे और बिना किसी पश्चाताप् के उसे अपवित्र करने में भी संकोच नहीं करेंगे। ये परनिन्दा में प्रवृत्त होंगे और सबके शरीर में स्थित मुझ परमात्मा का द्वेष करेंगे। केवल शुद्धांन्तकरण में ही परमात्मा अपने शुद्ध स्वरूप से व्यक्त होता है? न कि विषय वासनाओं से आच्छादित अशुद्ध अन्तकरण में। सदाचार का पालन चित्त को शुद्ध करता है? परन्तु अनैतिकता और दुराचार? जीवन के सुमधुर संगीत को अपने विकृत स्वरों के द्वारा निरर्थक ध्वनि के रूप में परिवर्तित कर देते हैं। दुराचारी पुरुष स्वयं अशान्त होकर अपने आसपास भी अशान्ति का वातावरण निर्मित करता है।अगले श्लोक में इन असुरों के पतन को बताते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Given over to egoism, power, haughtiness, lust and anger, these malicious people hate Me in their own bodies and in those of others.
Transliteration
ahaṅkāraṃ balaṃ darpaṃ kāmaṃ krodhaṃ ca saṃśritāḥ
mām ātmaparadeheṣu pradviṣanto 'bhyasūyakāḥअनुवाद
अहंकार, बल, घमंड, कामना और क्रोध का आश्रय लेकर, वे ईर्ष्यालु लोग अपने और दूसरों के शरीरों में स्थित मुझ परमात्मा से द्वेष करते हैं
भावार्थ
इस श्लोक में आसुरी स्वभाव वाले व्यक्तियों के लक्षणों का वर्णन किया गया है। वे अहंकार, शारीरिक बल, घमंड, वासना और क्रोध के वशीभूत होकर जीवन जीते हैं। ऐसे लोग अपने भीतर और दूसरों के भीतर स्थित परमात्मा (आत्मा) की उपेक्षा करते हैं और उससे द्वेष करते हैं, क्योंकि वे केवल अपने अहंकार की तृप्ति चाहते हैं।
Translation
Taking refuge in egotism, power, pride, lust, and anger, these malicious people despise Me, who am situated in their own and others’ bodies
Meaning
This verse describes the characteristics of those possessing a demoniac nature. Driven by ego, physical power, arrogance, lust, and anger, they lose all sense of the divine presence. Consequently, they harbor malice toward the Supreme Lord who dwells as the Supersoul within their own bodies and the bodies of others.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अहङ्कारम् | अहंकार को |
| बलम् | बल को |
| दर्पम् | घमंड को |
| कामम् | वासना को |
| क्रोधम् | क्रोध को |
| च | और |
| संश्रिताः | शरण लिए हुए (आश्रय लेकर) |
| माम् | मुझको |
| आत्म-पर-देहेषु | अपने और दूसरों के शरीरों में |
| प्रद्विषन्तः | द्वेष करने वाले |
| अभ्यसूयकाः | दूसरों के गुणों में दोष निकालने वाले (ईर्ष्यालु) |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| ahaṅkāram | egotism |
| balam | strength / power |
| darpam | pride / arrogance |
| kāmam | lust / desire |
| krodham | anger |
| ca | and |
| saṃśritāḥ | having taken refuge in |
| mām | Me (the Supreme Lord) |
| ātma-para-deheṣu | in their own and others’ bodies |
| pradviṣantaḥ | hating / despising |
| abhyasūyakāḥ | envious / caviling |