Chapter 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
Bhagavad Gita 16.16
मूल श्लोक :
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौHindi Translation By Swami Ramsukhdas
कामनाओंके कारण तरहतरहसे भ्रमित चित्तवाले? मोहजालमें अच्छी तरहसे फँसे हुए तथा पदार्थों और भोगोंमें अत्यन्त आसक्त रहनेवाले मनुष्य भयङ्कर नरकोंमें गिरते हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
अनेकचित्त विभ्रान्ता आत्मकेन्द्रित और विषयासक्त पुरुष का मन सदैव अस्थिर रहता है। अनेक प्रकार की भ्रामक कल्पनाओं में वह अपनी मन की एकाग्रता की क्षमता को क्षीण कर लेता है।मोहजाल समावृता यदि ऐसे आसुरी पुरुष का मन सारहीन स्वप्नों में बिखरा होता है? तो उसकी बुद्धि की स्थिति भी दयनीय ही होती है। विवेक और निर्णय की उसकी क्षमता मोह और असत् मूल्यों में फँस जाती है। आश्रियविहीन बुद्धि किस प्रकार उचित निर्णय और जीवन का सही मूल्यांकन कर सकती है ऐसे दोषपूर्ण मन और बुद्धि के द्वारा जगत् का अवलोकन करने पर सर्वत्र विषमता और विकृति के ही दर्शन होंगे? समता और संस्कृति के नहीं।विषयों में आसक्त जिस पुरुष की बुद्धि मोह से आच्छादित हो और मन विक्षेपों से अशान्त हो? तो उसकी इन्द्रियाँ भी असंयमित ही होंगी। यदि कार की चालकशक्ति ही मदोन्मत्त हो? तो कार की गति भी संयमित नहीं हो सकती। इस लिए? ऐसे आसुरी स्वभाव के पुरुष विषयभोगों में अत्यधिक आसक्त हो,जाते हैं।वे अपवित्र नरक में गिरते हैं शरीर से थके? मन से भ्रमित और बुद्धि से विचलित ये लोग यहीं पर स्वनिर्मित नरक में रहते हैं तथा अपने दुख और कष्ट सभी को वितरित करते हैं। इस तथ्य को समझने के लिए हमें कोई महान् दार्शनिक होने की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य में यह सार्मथ्य है कि वह समता के दर्शन से नरक को स्वर्ग में परिवर्तित कर सकता है और विषमता के दर्शन से स्वर्ग को नरक भी बना सकता है। अयुक्त व्यक्तित्व का पुरुष किसी भी स्थिति में शान्ति और पूर्णता का अनुभव नहीं करता। यदि समस्त वातावरण और परिस्थितियाँ अनुकूल भी हों? तो वह अपनी आन्तरिक पीड़ा और दुख के द्वारा उन्हें प्रतिकूल बना देता है।यदि इन आसुरी गुणों से युक्त केवल एक व्यक्ति भी सुखद परिस्थितियों को दुखद बना सकता है? तो हम उस जगत् की दशा की भलीभांति कल्पना कर सकते हैं जहाँ बहुसंख्यक लोगों की कमअधिक मात्रा में ये ही धारणायें होती हैं। स्वर्ग और नरक का होना हमारे अन्तकरण की समता और विषमता पर निर्भर करता है।आगे कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Bewildered by many a fancy, entangled in the snare of delusion, addicted to the gratification of lust, they fall into a foul hell.
Transliteration
anekacittavibhrāntā mohajālasamāvṛtāḥ
prasaktāḥ kāmabhogeṣu patanti narake'śucauअनुवाद
अनेक प्रकार के विचारों से भ्रमित, मोह रूपी जाल से घिरे हुए और काम-भोगों में अत्यंत आसक्त वे अपवित्र नरक में गिरते हैं।
भावार्थ
इस श्लोक में आसुरी प्रवृत्ति वाले मनुष्यों के पतन का वर्णन किया गया है। वे अनेक प्रकार की चिंताओं और कामनाओं के कारण मानसिक रूप से भ्रमित रहते हैं। अज्ञान और मोह के जाल में फंसकर वे केवल इंद्रिय-तृप्ति में लगे रहते हैं, जिसके परिणामस्वरूप अंततः वे घोर नरक में गिरते हैं।
Translation
Bewildered by numerous thoughts, entangled in the net of delusion, and deeply attached to the gratification of desires, they fall into a foul hell.
Meaning
This verse describes the ultimate downfall of those with demoniac qualities. Bewildered by countless desires and anxieties, they are caught in the web of illusion. Being deeply attached to sensory pleasures, they accumulate sinful reactions and eventually fall into a degraded, foul hell.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अनेक | अनेक प्रकार के |
| चित्त | विचारों से |
| विभ्रान्ताः | भ्रमित |
| मोह | मोह रूपी |
| जाल | जाल से |
| समावृताः | घिरे हुए |
| प्रसक्ताः | अत्यंत आसक्त |
| काम-भोगेषु | इंद्रिय-भोगों में |
| पतन्ति | गिरते हैं |
| नरके | नरक में |
| अशुचौ | अपवित्र / अशुद्ध |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| aneka | by numerous |
| citta | anxieties / thoughts |
| vibhrāntāḥ | bewildered |
| moha | of delusion |
| jāla | by the net |
| samāvṛtāḥ | entangled |
| prasaktāḥ | attached |
| kāma-bhogeṣu | to sense gratification |
| patanti | they fall |
| narake | into hell |
| aśucau | unclean / foul |