Chapter 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
Bhagavad Gita 16.15
मूल श्लोक :
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हम धनवान् हैं? बहुतसे मनुष्य हमारे पास हैं? हमारे समान और कौन है हम खूब यज्ञ करेंगे? दान देंगे और मौज करेंगे -- इस तरह वे अज्ञानसे मोहित रहते हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
अज्ञान और उससे उत्पन्न विपरीत ज्ञान से मोहित तथा गर्व और मद से उन्मत्त आसुरी पुरुष जगत् की ओर इसी भ्रामक दृष्टि से देखता है। ऐसी स्थिति में स्वयं का तथा जगत् के साथ अपने संबंध का त्रुटिपूर्ण मूल्यांकन करना स्वाभाविक ही है। उसे अपने धन? वैभव और कुल का इतना अभिमान होता है कि वह अपने समक्ष सभी को तुच्छ समझता है। स्वयं ही समाज से बहिष्कृत होकर वह मिथ्या अभिमान के महल में रहता है और असंख्य प्रकार की मानसिक यातनाओं का कष्ट भी भोगता रहता है। उसकी महत्त्वाकांक्षा यह होती है कि यज्ञादि के द्वारा वह देवताओं पर भी शासन करे और दान के द्वारा सम्पूर्ण जगत् का क्रय कर ले। इस प्रकार? सम्मानित और पूजित होकर मैं मौज करूँगा। वे अज्ञान के गर्त में पड़े हुए आसुरी पुरुष के कुछ अत्यन्त विक्षिप्ततापूर्ण कथन हैं।उपर्युक्त तीन श्लोकों का सारांश बताते हुए कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
"I am rich and born in a noble family. Who else is eal to me? I shall perform sacrifices. I shall give (charity). I shall rejoice," thus deluded by ignorance.
Transliteration
āḍhyo'bhijanavānasmi ko'nyo'sti sadṛśo mayā
yakṣye dāsyāmi modiṣya ityajñānavimohitāḥअनुवाद
मैं धनवान हूँ और कुलीन हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और आमोद-प्रमोद करूँगा—इस प्रकार वे अज्ञान से मोहित रहते हैं।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण आसुरी प्रवृत्ति वाले मनुष्यों की मानसिक स्थिति का वर्णन कर रहे हैं। ऐसे लोग अत्यधिक अहंकार, धन और सामाजिक प्रतिष्ठा के मद में चूर रहते हैं। वे स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं और धार्मिक कार्यों (जैसे यज्ञ और दान) को भी केवल अपनी कीर्ति और अहंकार की संतुष्टि के लिए करते हैं, जो कि उनके गहरे अज्ञान को दर्शाता है।
Translation
I am wealthy and well-born. Who else is equal to me? I will perform sacrifices, I will give charity, I will rejoice—thus they are deluded by ignorance.
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes the mindset of those possessing demoniac qualities. Such individuals are blinded by pride, wealth, and social status, believing themselves to be superior to everyone else. Even their religious acts, like performing sacrifices and giving charity, are driven by self-glorification and ego, reflecting their profound ignorance.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| आढ्यः | धनवान |
| अभिजनवान् | कुलीन (उच्च कुल में जन्मा) |
| अस्मि | मैं हूँ |
| कः | कौन |
| अन्यः | दूसरा |
| अस्ति | है |
| सदृशः | समान |
| मया | मेरे |
| यक्ष्ये | मैं यज्ञ करूँगा |
| दास्यामि | मैं दान दूँगा |
| मोदिष्ये | मैं आनंद मनाऊँगा |
| इति | इस प्रकार |
| अज्ञान-विमोहिताः | अज्ञान से अत्यंत मोहित (लोग) |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| āḍhyaḥ | wealthy |
| abhijanavān | well-born (of noble heritage) |
| asmi | I am |
| kaḥ | who |
| anyaḥ | other |
| asti | is |
| sadṛśaḥ | equal |
| mayā | to me |
| yakṣye | I will sacrifice |
| dāsyāmi | I will give charity |
| modiṣye | I will rejoice |
| iti | thus |
| ajñāna-vimohitāḥ | deluded by ignorance |