श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग

Bhagavad Gita 16.12

मूल श्लोक :

आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

वे आशाकी सैकड़ों फाँसियोंसे बँधे हुए मनुष्य कामक्रोधके परायण होकर पदार्थोंका भोग करनेके लिये अन्यायपूर्वक धनसंचय करनेकी चेष्टा करते रहते हैं।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

आसुरी लोगों के स्वभाव को अधिक स्पष्ट करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण इस श्लोक में उनके कार्य कलापों का वर्णन करते हैं। सैकड़ों आशापाशों से बन्धे हुए पुरुष की मानसिक और बौद्धिक क्षमताओं का ह्रास होता रहता है। फिर वह अशान्त पुरुष प्रत्येक वस्तु? व्यक्ति और घटना के साथ अपने धैर्य को खोकर अपने विवेक और मानसिक सन्तुलन को भी खो देता है। उत्तेजना और सतत असन्तोष से ग्रस्त यह पुरुष काम और क्रोध के वशीभूत हो जाता है। कामना के अतृप्त या अवरुद्ध होने पर क्रोध उत्पन्न होना निश्चित है। कामना की पूर्ति के लिए वह संघर्ष करता है? परन्तु प्रतिस्पर्धा से पूर्ण इस जगत् में सदैव इष्ट प्राप्ति होना असंभव है और ऐसी परिस्थति में उसकी कामना उन्मत्त और उद्वेगपूर्ण क्रोध में परिवर्तित हो जाती है।ईहन्ते  अथक परिश्रम के द्वारा वे अपनी नित्य वर्धमान कामना को सन्तुष्ट करने में प्रयत्नशील होते हैं। भोग के लिए विषयों का परिग्रह आवश्यक होता है। वे शान्ति और सुख को खोजने के स्थान पर उस एक संज्ञाविहीन तृष्णा को तृप्त करने का प्रयत्न करते रहते हैं? जो कि एक दीर्घकालीन असाध्य रोग के समान होती है। अपनी मनप्रवृत्तियों का निरीक्षण? अध्ययन एवं यथार्थ निर्णय पर पहुँचने के लिए आवश्यक मनसन्तुलन का उनमें सर्वथा अभाव होता है। इच्छापूर्ति की विक्षिप्त भागदौड़ में वे जीवन के दिव्यतत्त्व से पराङ्मुख हो जाते हैं और सत्यासत्य के विवेक की भी उपेक्षा करते हैं। कामना से प्रेरित होने पर वे अन्यायपूर्वक अर्थ का संचय करने में व्यस्त हो जाते हैं।यद्यपि आसुरी लोगों के इन लक्षणों को पाँच हजार वर्षों पूर्व लिखा गया था? परन्तु आश्चर्य है कि इस खण्ड को पढ़ने पर ऐसा प्रतीत होता है? मानो यह आज के युग की कटु किन्तु सत्य आलोचना है  इस प्रकार? यदि गीता के विद्यार्थी आज के गौरवशाली विज्ञान? भौतिक समृद्धि? लौकिक उपलब्धि और राजनीतिक मुक्ति के युग का परीक्षण करें? तो इस युग को आसुरी श्रेणी में ही मान्यता प्राप्त होगी। औद्योगिक संस्थानों के व्यापक प्रसार के चीखते हुए भोपुओं की कर्णकटु ध्वनि और आधुनिक वैज्ञानिक अस्त्रों के भयानक धमाके के मध्य तथा हमारे द्वारा आविष्कृत स्वविनाश की प्राकृतिक शक्तियों के कोलाहल में? हम भले ही सुदूर काल के ज्ञानी पुरुषों के द्वारा उद्घोषित सत्य की ओर ध्यान न दें? किन्तु गीता के निष्ठावान विद्यार्थी उन घोषणाओं की अकाट्य सत्यता को प्रत्यक्ष देखते हैं? और स्वभावत अपने युग के प्रति उनका मन उदास हो जाता है।उन पुरुषों के विचार इस प्रकार होते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Bound by a hundred ties of hope, given over to lust and anger, they strive to obtain by unlawful means hoards to wealth for sensual enjoyments.

Transliteration

āśāpāśaśatairbaddhāḥ kāmakrodhaparāyaṇāḥ
īhante kāmabhogārthamanyāyenārthasañcayān

अनुवाद

सैकड़ों आशा रूपी फाँसियों से बंधे हुए, काम और क्रोध के परायण हुए, वे काम-भोगों की तृप्ति के लिए अन्यायपूर्वक धन का संग्रह करने की चेष्टा करते हैं

भावार्थ

इस श्लोक में आसुरी प्रवृत्ति वाले मनुष्यों के आचरण का वर्णन किया गया है। वे अनगिनत इच्छाओं और आशाओं के जाल में जकड़े रहते हैं और काम-क्रोध के वशीभूत होकर जीते हैं। अपनी इंद्रिय-तृप्ति के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं और अन्यायपूर्ण तरीकों से धन इकट्ठा करने में संकोच नहीं करते।

Translation

Bound by hundreds of shackles of desire, devoted to lust and anger, they strive to accumulate wealth by unjust means for the gratification of their desires

Meaning

This verse describes the behavior of those with demoniac qualities. Bound by hundreds of desires and expectations, and completely dominated by lust and anger, they lose their moral compass. Consequently, they strive to amass wealth through illegal and unjust means solely to satisfy their sensory appetites.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
आशा-पाश-शतैःआशा रूपी फाँसियों के सैकड़ों (जालों) द्वारा
बद्धाःबंधे हुए
काम-क्रोधकाम और क्रोध के
परायणाःपरायण (आश्रित)
ईहन्तेचेष्टा करते हैं
काम-भोग-अर्थम्इंद्रिय-भोगों की तृप्ति के लिए
अन्यायेनअन्यायपूर्वक
अर्थ-सञ्चयान्धन के संग्रहों को

Word by word

WordMeaning
āśā-pāśa-śataiḥby hundreds of shackles of hope and desire
baddhāḥbound
kāma-krodhato lust and anger
parāyaṇāḥdevoted
īhantethey desire / strive
kāma-bhoga-arthamfor the purpose of gratifying desires
anyāyenaby unjust means
artha-sañcayānaccumulation of wealth