Chapter 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
Bhagavad Gita 16.10
मूल श्लोक :
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
कभी पूरी न होनेवाली कामनाओंका आश्रय लेकर दम्भ? अभिमान और मदमें चूर रहनेवाले तथा अपवित्र व्रत धारण करनेवाले मनुष्य मोहके कारण दुराग्रहोंको धारण करके संसारमें विचरते रहते हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
जिस गर्व के साथ एक नितान्त भौतिकवादी व्यक्ति अपनी उपलब्धियों के क्षेत्र में विचरण करता है? उसके आन्तरिक स्वभाव की भयंकर विद्रूपता को? व्यासजी के द्वारा किये गये इस वर्णन से अधिक अच्छी प्रकार से व्यक्त नहीं किया जा सकता। आसुरी पुरुष की मनस्थिति तथा समाज में उसके कर्मों का स्तर का और अधिक स्पष्ट एवं सम्पूर्ण वर्णन पाने के लिए हमें विश्व की सभी भाषाओं के विद्यमान साहित्य में खोजबीन करनी होगी? फिर भी इस सारगर्भित श्लोक के समतुल्य चित्रण पाने में हमें असफलता ही मिलेगी।काममाश्रित्य इच्छाओं की प्रेरणा के बिना कर्म कदापि नहीं हो सकते हैं। इच्छाओं के अभाव में जीवन की उपलब्धियाँ असंभव है। तथापि? कामनाओं का शिकार बने रहने का अर्थ है कर्मों का कोई भयंकर यन्त्र बनना? जो जगत् में अहंकार और अहंकार केन्द्रित मनोद्वेगों के विष का वमन करता रहता है। कामनाओं की तृप्ति के लिए ही जीवन धारण करना अविवेक का लक्षण है क्योंकि? कामना का यह विशेष कौशल हैकि जैसेजैसे हम उसे तृप्त करते जाते हैं वैसेवैसे ही? वह द्विगुणित होती जाती है। उन्हें तृप्त करना कठिन है? वे दुष्पूर हैं। ऐसी कामनाओं से युक्त पुरुष जब अपने विवेक और सार्मथ्य का उपयोग करता है? तब स्वाभाविक है कि व्ाह अपने मन में तथा बाह्य जगत् में विक्षेप और दुर्व्यवस्था को उत्पन्न करता है।कामना क्या है विषयोपभोग के द्वारा शाश्वत सुख और सन्तोष को प्राप्त करने का जीव का प्रयत्न ही कामना है। जब वह इस प्रकार मोहित हो जाता है? तब वह दम्भ? मद और मान का भी शिकार बन जाता है। उनके द्वारा प्रताड़ित वह अपनी निरंकुश इच्छाओं को तृप्त करने के लिए सतत संघर्ष और परिश्रम करता रहता है।मोहात् परिपूर्ण और तृप्त पुरुष के मन में कामना नहीं हो सकती। जो पुरुष अपने अनन्त स्वरूप को न जानकर स्वयं को परिच्छिन्न जीव ही समझता है? केवल उसे ही विषयों की कामना हो सकती है। इसे ही मोह कहते हैं।असुर लोगों के मन का चरित्र इस श्लोक की द्वितीय पंक्ति में पूर्ण होता है। उन्हें यहाँ अशुचिव्रता कहा गया है। इसका अभिप्राय है कि ऐसे आसुरी स्वभाव के लोग येन केन प्रकारेण अपने ही सुख और शान्ति के लिए प्रयत्न करने में अन्य लोगों का कुछ भी महत्व नहीं समझते हैं। जीवन के सभी आदर्श मूल्यों को ताक में रखकर निर्लज्ज? असहिष्णु और क्रूर तक होकर वे अपने कार्यक्षेत्र में संघर्षरत रहते हैं। कामवासना से मदोन्मत्त और स्वार्थ से संवेदनाशून्य वह व्यक्ति जगत् में पागल के समान अपने चारों ओर रक्त और अम्ल फेंकता हुआ विपत्ति और विनाश का ही कार्य करता है एक व्यष्टि की दृष्टि से यह चित्र हमें एक ऐसे भोगवादी पुरुष को दर्शाता है? जो अपने जीवन का निर्माण कामना से विक्षुब्ध हुए मन की चंचल तरंगों पर करता है। समष्टि की दृष्टि से देखने पर यही शब्द चित्र हमें भौतिकवादी जनसमुदायों और राष्ट्रों की स्थिति का दर्शन कराता है। जीवन की सुन्दरता उस तत्त्वज्ञान की सुन्दरतापर निर्भर करती है? जिस पर जीवन का निर्माण होता है यदि नींव ही असत् हो? तो उसके ऊपर निर्मित ताश का महल अधिक सुदृढ़ नहीं हो सकता। यदि हम इस श्लोक को सूक्ष्मदृष्टि से देख सकें? तो ज्ञात होगा कि इसमें आज के जगत् में सर्वत्र अनुभव हो रहे आर्थिक विघटन? सामाजिक दोष? राजनीतिक उथलपुथल और अशान्ति का सम्पूर्ण विवेचन किया गया है।उपर्य़ुक्त वर्णन के द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण अप्रत्यक्ष रूप से एक ऐसे भौतिकवादी पुरुष का चित्रण कर रहे हैं? जो अपने स्वभाव से ही नास्तिक विचारधारा का है तथा भोग के लिए ही कर्म करता है। क्या आज के भौतिकवादी युग में हम अपने को यथोक्त वर्णन के अनुरूप ही सिद्ध नहीं कर रहे हैं भगवान् आगे कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Filled with insatiable desires, full of hypocrisy, pride and arrogance, holding evil ideas through delusion, they work with impure resolves.
Transliteration
kāmam āśritya duṣpūraṃ dambhamānamadānvitāḥ
mohād gṛhītvāsadgrāhān pravartante'śucivratāḥअनुवाद
कभी न पूर्ण होने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर, दम्भ, मान और मद से युक्त होकर, अज्ञानवश असत्य सिद्धान्तों को ग्रहण करके, वे अपवित्र व्रतों को धारण कर संसार में प्रवृत्त होते हैं
भावार्थ
इस श्लोक में आसुरी स्वभाव वाले मनुष्यों की प्रवृत्तियों का वर्णन किया गया है। वे कभी न तृप्त होने वाली वासनाओं के वश में रहते हैं और अहंकार तथा पाखंड से भरे होते हैं। मोह के कारण वे गलत धारणाओं को अपना लेते हैं और अपवित्र कर्मों में लगे रहते हैं।
Translation
Sheltering in insatiable desire, filled with hypocrisy, pride, and arrogance, holding evil ideas through delusion, they engage in action with impure resolves
Meaning
This verse describes the behavior of those with demonic natures. They are driven by insatiable desires and are full of hypocrisy, pride, and arrogance. Deluded by ignorance, they adopt false values and pursue impure, materialistic goals.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| कामम् | कामनाओं का |
| आश्रित्य | आश्रय लेकर |
| दुष्पूरम् | कठिनाई से पूरी होने वाली (अतृप्त) |
| दम्भ-मान-मद-अन्विताः | दम्भ, मान और मद से युक्त |
| मोहात् | अज्ञान से / मोहवश |
| गृहीत्वा | ग्रहण करके |
| असत्-ग्राहान् | असत्य धारणाओं को |
| प्रवर्तन्ते | प्रवृत्त होते हैं |
| अशुचि-व्रताः | अपवित्र नियमों वाले / अपवित्र व्रतों को धारण करने वाले |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| kāmam | desire |
| āśritya | taking shelter of |
| duṣpūram | insatiable |
| dambha-māna-mada-anvitāḥ | filled with hypocrisy, pride, and arrogance |
| mohāt | through delusion |
| gṛhītvā | holding / adopting |
| asat-grāhān | false notions / evil ideas |
| pravartante | they engage / act |
| aśuci-vratāḥ | people of impure resolves |