Chapter 15 · पुरुषोत्तमयोग
Bhagavad Gita 15.5
मूल श्लोक :
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
जो मान और मोहसे रहित हो गये हैं? जिन्होंने आसक्तिसे होनेवाले दोषोंको जीत लिया है? जो नित्यनिरन्तर परमात्मामें ही लगे हुए हैं? जो (अपनी दृष्टिसे) सम्पूर्ण कामनाओंसे रहित हो गये हैं? जो सुखदुःखरूप द्वन्द्वोंसे मुक्त हो गये हैं? ऐसे (ऊँची स्थितिवाले) मोहरहित साधक भक्त उस अविनाशी परमपद(परमात्मा) को प्राप्त होते हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
भारत में दर्शनशास्त्र आचार के लिये है? प्रचारमात्र के लिए नहीं। इस ज्ञान की पूर्णता साक्षात् अनुभव करने में है। यही कारण है कि हमारे धर्मशास्त्रों तथा अध्यात्म के प्रकरण ग्रन्थों में जीवन के लक्ष्य का तथा उसकी प्राप्ति के उपायों का अत्यन्त विस्तृत विवेचन मिलता है। किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए कुछ आवश्यक योग्यताएं होती हैं? जिनके बिना मनुष्य उस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता है। अत आत्मज्ञान भी कुछ विशिष्ट गुणों के से सम्पन्न अधिकारी को ही पूर्णत प्राप्त हो सकता है। उन गुणों का निर्देश इस श्लोक में किया गया है। उत्साही और साहसी साधकों को इन गुणों का सम्पादन करना चाहिये। भगवान् श्रीकृष्ण आश्वासन देते हैं कि साधन सम्पन्न साधकों को अव्यय पद की प्राप्ति अवश्य होगी। वही कृत्कृत्यता और वही परम पुरुषार्थ है।जो मान और मोह से रहित है मान का अर्थ है स्वयं को पूजनीय व्यक्ति मानना। अपने महत्व का त्रुटिपूर्ण मूल्यांकन मान अथवा गर्व कहलाता है। ऐसा मानी व्यक्ति अपने ऊपर मान को बनाये रखने का अनावश्यक भार या उत्तरदायित्व ले लेता है। तत्पश्चात् उसके पास कभी समय ही नहीं होता कि वह वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर सके और अपने अवगुणों का त्याग कर सुसंस्कृत बन सके। इसी प्रकार मोह का अर्थ है अविवेक। बाह्य जगत् की वस्तुओं? व्यक्तियों? घटनाओं आदि को यथार्थत न समझ पाना मोह है। इसके कारण हम वास्तविक जीवन की तात्कालिक समस्याओं का सामना करने के स्थान पर अपने ही काल्पनिक जगत् में विचरण करते रहते हैं। अत आत्म्ाज्ञान के जिज्ञासुओं को इन अवगुणों का सर्वथा त्याग करना चाहिये।जिन्होंने संग दोष को जीत लिया है देह के साथ तादात्म्य कर केवल इन्द्रियों के विषयोपभोग में रमने का अर्थ? स्वयं को जीवन की श्रेष्ठतर संभावनाओं से वंचित रखकर अपनी ही प्रवंचना करना है। ऐसा मूढ़ व्यक्ति अत्यन्त विषयासक्त होता है। यह आसक्ति जितनी अधिक होगी उतनी ही अधिक उसकी अनियंत्रित विषयाभिमुख प्रवृत्ति भी होगी। वह विषयों का दास बनकर उनके परिवर्तनों और विनाश की लय पर नृत्य करता हुआ अपनी शक्तियों का अपव्यय करता रहता है।? फिर उसे आत्मानुभव की प्राप्ति कैसे हो सकती है इसलिये जिन्होंने इस संग नामक दोष को जीत लिया है? वे ही पुरुष मोक्ष के अधिकारी होते हैं।अध्यात्मनित्या मन का स्वभाव है किसी न किसी वस्तु में आसक्त रहना। अत मन को बाह्य जगत् से विरत करने के लिये उसे श्रेष्ठ और दिव्य आत्मस्वरूप में स्थित करने का प्रयत्न करना चाहिये। मनुष्य का मन विधेयात्मक उपदेश का पालन कर सकता है? परन्तु शून्य में नहीं रह सकता। सरल शब्दों में? तात्पर्य यह है कि उसे कुछ करने को कहा जा सकता है? परन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि कुछ मत करो। उदाहरणार्थ? यदि किसी व्यक्ति से कहा जाये कि प्रातकाल जागने के साथ उसे अण्डे का स्मरण नहीं करना चाहिये तो दूसरे दिन सर्वप्रथम उसे अण्डे का स्मरण होगा। परन्तु? इसके स्थान पर उसे भगवान् नारायण का स्मरण करने को कहा जाये? तो अण्डे का स्मरण होने का अवसर ही नहीं रह जाता। इसी प्रकार विषयासक्ति को जीतने के लिये सतत आत्मानुसंधान करते रहना चाहिये।जिनकी कामनाएं पूर्णत निवृत्त हो चुकी हैं जब तक बाह्य जगत् के सम्बन्ध में यह धारणा बनी रहेगी कि वह सत्य है और उसमें सुख है? तब तक कामनाओं का त्याग होना संभव ही नहीं है। अत हमें विचारपूर्वक जगत् के मिथ्यात्व का निश्चय करना चाहिये और यह भी जानना चाहिये कि सुख तो आत्मा का स्वरूप है? विषयों का धर्म नहीं। ऐसे दृढ़ निश्चय से कामनायें निवृत्त हो सकती हैं। इच्छाओं के अभाव में मन स्वत शान्त हो जाता है।जो पुरुष सुखदुख नामक द्वन्द्वों से विमुक्त हो गये हैं मनुष्य कभी भी जगत् का वस्तुनिष्ठ दर्शन नहीं करता है। वह जगत् की वस्तुओं को प्रिय और अप्रिय दो भागों में विभाजित कर देता है। इस द्वन्द्व से उत्पन्न होती है प्रिय की ओर प्रवृत्ति और अप्रिय से निवृत्ति। तत्पश्चात्? यदि प्रिय की प्राप्ति हो तो सुख? अन्यथा दुख होता है। दुर्भाग्य से मनुष्य के राग और द्वेष भी सदैव परिवर्तित होते रहते हैं। इस कारण कल जिस वस्तु को वह सुख का साधन समझता था? आज उसी वस्तु को वह दुखदायी समझता है। इस प्रकार? मन की तरंगों में जो व्यक्ति फँसा रहता है? वह इन द्वन्द्वों से कभी मुक्त नहीं हो सकता। इसलिये साधक को अपने व्यक्तिगत राग और द्वेष को सर्वथा समाप्त कर देना चाहिये।इस श्लोक के अन्त में भगवान् श्रीकृष्ण की यह निश्चयात्मक और आशावादी घोषणा है कि ऐसे सम्मोहरहित योग्य अधिकारी साधक अव्यय पद को प्राप्त होते हैं। इस घोषणा की शैली में एक आदेश की दृढ़ता है। उपाधियों से अवच्छिन्न आत्मा यह संसारी दुर्भाग्यशाली मनुष्य है और उपाधिविवर्जित मनुष्य ही सच्चिदानन्दस्वरूप आत्मा है। यही अपरोक्षानुभूति है।उस अव्यय पद की ही विशेषता अगले श्लोक में वर्णित है।
English Translation By Swami Sivananda
Free from pride and delusion, victorious over the evil of attachment, dwelling constantly in the Self, their desires having completely turned away, freed from the pairs of opposites known as pleasure and pain, the undeluded reach the eternal goal.
Transliteration
nirmānamohā jitasaṅgadoṣā adhyātmanityā vinivṛttakāmāḥ
dvandvairvimuktāḥ sukhaduḥkhasaṃjñair gacchantyamūḍhāḥ padamavyayaṃ tatअनुवाद
जो मान और मोह से रहित हैं, जिन्होंने आसक्ति रूपी दोष को जीत लिया है, जो अध्यात्म में नित्य स्थित हैं, जिनकी कामनाएँ पूर्णतः निवृत्त हो चुकी हैं, और जो सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से मुक्त हैं — ऐसे ज्ञानी पुरुष उस अविनाशी परम पद को प्राप्त करते हैं।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण उस परम पद (मोक्ष) को प्राप्त करने वाले साधकों की योग्यताओं का वर्णन करते हैं। जो साधक अहंकार, मोह और आसक्ति से मुक्त हो चुके हैं, जिनका मन सदैव परमात्मा में लीन रहता है, और जो सुख-दुःख के द्वन्द्वों से विचलित नहीं होते, वही उस अविनाशी धाम को प्राप्त करने के अधिकारी हैं। यह मार्ग पूर्ण आत्म-समर्पण और वैराग्य का है।
Translation
Free from pride and delusion, having conquered the evil of attachment, ever devoted to the Supreme Self, with desires completely stilled, liberated from the dualities known as pleasure and pain, the undeluded reach that eternal, imperishable state.
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes the qualifications of those who attain the supreme, imperishable state. Those who are free from pride, delusion, and attachment, who are constantly established in spiritual knowledge, and who remain unaffected by the dualities of pleasure and pain, reach the eternal goal. This path requires complete self-surrender and detachment from worldly desires.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| निर्मानमोहाः | मान और मोह से रहित |
| जितसङ्गदोषाः | जीत लिया है आसक्ति रूपी दोष जिन्होंने |
| अध्यात्मनित्याः | अध्यात्म में नित्य स्थित |
| विनिवृत्तकामाः | पूर्णतः निवृत्त हो चुकी हैं कामनाएँ जिनकी |
| द्वन्द्वैः | द्वन्द्वों से |
| विमुक्ताः | मुक्त |
| सुखदुःखसंज्ञैः | सुख और दुःख नाम वाले |
| गच्छन्ति | प्राप्त करते हैं |
| अमूढाः | ज्ञानी (मोह-रहित) जन |
| पदम् | पद को |
| अव्ययम् | अविनाशी |
| तत् | उस |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| nirmānamohāḥ | free from pride and delusion |
| jita-saṅga-doṣāḥ | having conquered the evil of attachment |
| adhyātma-nityāḥ | eternally devoted to the Supreme Self |
| vinivṛtta-kāmāḥ | whose desires are completely stilled |
| dvandvaiḥ | from the dualities |
| vimuktāḥ | liberated |
| sukha-duḥkha-saṃjñaiḥ | known as pleasure and pain |
| gacchanti | they attain |
| amūḍhāḥ | the undeluded |
| padam | state / abode |
| avyayam | imperishable |
| tat | that |