Chapter 15 · पुरुषोत्तमयोग
Bhagavad Gita 15.2
मूल श्लोक :
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोकेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
उस संसारवृक्षकी गुणों(सत्त्व? रज और तम) के द्वारा बढ़ी हुई तथा विषयरूप कोंपलोंवाली शाखाएँ नीचे? मध्यमें और ऊपर सब जगह फैली हुई हैं। मनुष्यलोकमें कर्मोंके अनुसार बाँधनेवाले मूल भी नीचे और ऊपर (सभी लोकोंमें) व्याप्त हो रहे हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
संसार वृक्ष का और विस्तृत चित्रांकन इस श्लोक में किया गया है। गूढ़ अभिप्राय वाले प्रतीकों को शब्दश नहीं लेना चाहिये? फिर वे प्रतीक साहित्य के हों अथवा कला के। वेदों की शैली ही लक्षणात्मक है। दर्शनशास्त्र के सूक्ष्म सिद्धान्तों को व्यक्त करने के लिए जगत् की किसी उपयुक्त वस्तु का वर्णन ऐसी काव्यात्मक शैली में करना? जिससे धर्म के गूढ़ सन्देश या अभिप्राय का बोध कराया जा सके? लक्षणात्मक शैली कही जाती है।भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस वृक्ष की शाखाएं ऊपर और नीचे फैली हुईं हैं। इनसे तात्पर्य देवता? मनुष्य? पशु इत्यादि योनियों से है। मनुष्य के व्यक्तिगत तथा जगत् के विकास की दिशा कभी उन्नति की ओर होती है? किन्तु प्राय यह पशु जीवन के निम्न स्तर की ओर रहती है। अध और ऊर्ध्व इन दो शब्दों से इन्हीं दो दिशाओं अथवा प्रवृत्तियों की ओर निर्देश किया गया है।गुणों से प्रवृद्ध हुई जीवों की ऊर्ध्व या अधोगामी प्रवृत्तियों का धारण पोषण प्रकृति के सत्त्व? रज और तम? इन तीन गुणों के द्वारा किया जाता है। इन गुणों का विस्तृत विवेचन पूर्व अध्याय में किया जा चुका है।किसी भी वृक्ष की शाखाओं पर हम अंकुर या कोपलें देख सकते हैं जहाँ से अवसर पाकर नईनई शाखाएं फूटकर निकलती हैं। प्रस्तुत रूपक में इन्द्रियों के शब्दस्पर्शादि विषयों को प्रवाल अर्थात् अंकुर कहा गया है। यह सुविदित तथ्य है कि विषयों की उपस्थिति में हम अपने उच्च आदर्शों को विस्मृत कर विषयाभिमुख हो जाते हैं। तत्पश्चात् उन भोगों की पूर्ति के लिये उन्मत्त होकर नयेनये कर्म करते हैं। अत विषयों को प्रवाल कहना समीचीन है।इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस वृक्ष की गौण जड़ें नीचे फैली हुई हैं। परमात्मा तो इस संसार वृक्ष का अधिष्ठान होने से इसका मुख्य मूल है किन्तु इसकी अन्य जड़े भी हैं ? जो इस वृक्ष का अस्तित्व बनाये रखती हैं। मनुष्य देह में यह जीव असंख्य प्रकार के कर्म और कर्मफल का भोग करता है? जिसके फलस्वरूप उसके मन में नये संस्कार या वासनाएं अंकित होती जाती हैं। ये वासनाएं ही अन्य जड़ें हैं? जो मनुष्य को अपनी अभिव्यक्ति के लिये कर्मों में प्रेरित करती रहती हैं। शुभ और अशुभ कर्मों का कारण भी ये वासनाएं ही हैं। जैसा कि लोक में हम देखते हैं? वृक्ष की ये अन्य जड़ें ऊपर से नीचे पृथ्वी में प्रवेश कर वृक्ष को दृढ़ता से स्थिर कर देती हैं? वैसे ही ये संस्कार शुभाशुभ कर्म और कर्मफल को उत्पन्न कर मनुष्य को इस लोक के राग और द्वेष? लाभ और हानि? आय और व्यय आदि प्रवृत्तियों के साथ बाँध देते हैं।अगले दो श्लोकों में इसका वर्णन किया गया है कि किस प्रकार हम इस संसार वृक्ष को काटकर इसके ऊर्ध्वमूल परमात्मा का अपने आत्मस्वरूप से अनुभव कर सकते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Below and above spread its branches, nourished by the Gunas; sense-objects are its buds; and below, in the world of men, stretch forth the roots, originating action.
Transliteration
adhaś cordhvaṃ prasṛtās tasya śākhā guṇapravṛddhā viṣayapravālāḥ
adhaś ca mūlāny anusantatāni karmānubandhīni manuṣyalokeअनुवाद
उस संसार-वृक्ष की शाखाएँ नीचे और ऊपर फैली हुई हैं, जो गुणों द्वारा विकसित हुई हैं और विषय-भोग जिनकी कोंपलें हैं, तथा नीचे मनुष्य-लोक में कर्मों के अनुसार बाँधने वाली जड़ें भी फैली हुई हैं।
भावार्थ
इस श्लोक में संसार रूपी अश्वत्थ वृक्ष का और विस्तार से वर्णन किया गया है। इसकी शाखाएँ तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) द्वारा पोषित होकर ऊपर (देवलोक आदि) और नीचे (पशु-पक्षी आदि योनियों) में फैली हुई हैं। इन्द्रियों के विषय इस वृक्ष की नई कोमल पत्तियाँ हैं, और मनुष्य लोक में कर्मों के अनुसार बाँधने वाली इसकी गौण जड़ें नीचे की ओर फैली हुई हैं जो जीव को सांसारिक बंधनों में जकड़े रखती हैं।
Translation
Downwards and upwards extend its branches, nourished by the modes of nature, with the sense-objects as their twigs; and downwards in the world of men are stretched the roots, binding to action.
Meaning
This verse further describes the metaphorical banyan tree of material existence. Its branches, nourished by the three modes of material nature (gunas), extend both upwards to higher planetary systems and downwards to lower species. The sense objects are the tender buds or twigs, and the secondary roots extend downwards into the human world, binding living entities to the cycle of karma (action and reaction).
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अधः | नीचे |
| च | और |
| ऊर्ध्वम् | ऊपर |
| प्रसृताः | फैली हुई हैं |
| तस्य | उसकी |
| शाखाः | शाखाएँ |
| गुण-प्रवृद्धाः | गुणों (प्रकृति के तीनों गुणों) द्वारा बढ़ाई हुई |
| विषय-प्रवालाः | विषय-भोग रूपी कोंपलों वाली |
| अधः | नीचे |
| च | और |
| मूलानि | जड़ें |
| अनुसन्ततानि | लगातार फैली हुई हैं |
| कर्म-अनुबन्धीनि | कर्मों के अनुसार बाँधने वाली |
| मनुष्य-लोके | मनुष्य लोक में |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| adhaḥ | downwards |
| ca | and |
| ūrdhvam | upwards |
| prasṛtāḥ | extended |
| tasya | its |
| śākhāḥ | branches |
| guṇa-pravṛddhāḥ | nourished by the modes of nature |
| viṣaya-pravālāḥ | having sense-objects as buds |
| adhaḥ | downwards |
| ca | and |
| mūlāni | roots |
| anusantatāni | stretched |
| karma-anubandhīni | binding to action |
| manuṣya-loke | in the world of humans |