श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 15 · पुरुषोत्तमयोग

Bhagavad Gita 15.19

मूल श्लोक :

यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे भरतवंशी अर्जुन इस प्रकार जो मोहरहित मनुष्य मुझे पुरुषोत्तम जानता है? वह सर्वज्ञ सब प्रकारसे मेरा ही भजन करता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

जिस पुरुष ने अपने शरीर? मन और बुद्धि तथा उनके द्वारा अनुभव किये जाने वाले विषयों? भावनाओं एवं विचारों के साथ मिथ्या तादात्म्य को सर्वथा त्याग दिया है? वही असंमूढ अर्थात् संमोहरहित पुरुष है।इस प्रकार मुझे जानता है  यहाँ जानने का अर्थ बौद्धिक स्तर का ज्ञान नहीं? वरन् आत्मा का साक्षात् अपरोक्ष अनुभव है। स्वयं को परमात्मस्वरूप से जानना ही वास्तविक बोध है।अनात्मा के तादात्म्य को त्यागकर? जिसने मुझ परमात्मा के साथ पूर्ण तादात्म्य स्थापित कर लिया है? वही परम भक्त है? जो मुझे पूर्ण हृदय से भजता है। प्रिय से तादात्म्य ही सर्वत्र प्रेम का मापदण्ड माना जाता है। अधिक प्रेम होने पर अधिक तादात्म्य होता है। इसलिये? अंकगणित की दृष्टि से भी पूर्ण तादात्म्य का अर्थ होगा पूर्ण प्रेम अर्थात् पराभक्ति।यह पुरुषोत्तम ही चैतन्य स्वरूप से तीनों काल में समस्त घटनाओं एवं प्राणियों की अन्तर्वृत्तियों को प्रकाशित करता है। इसलिये वह सर्वज्ञ कहलाता है। जो भक्त इस पुरुषोत्तम के साथ पूर्ण तादात्म्य कर लेता है? वह भी सर्ववित् कहलाता है।इस अध्याय की विषयवस्तु भगवत्तत्त्वज्ञान है। अब? भगवान् श्रीकृष्ण इस ज्ञान की प्रशंसा करते हैं? जो ज्ञान हमें शरीरजनित दुखों? मनजनित विक्षेपों और बुद्धिजनित अशान्तियों के बन्धनों से सदा के लिये मुक्त कर देता है

English Translation By Swami Sivananda

He who, undeluded, knows Me thus as the highest Purusha, he, knowing all, worships Me with his whole being (heart), O Arjuna.

Transliteration

yo mām evam asammūḍho jānāti puruṣottamam
sa sarvavid bhajati māṃ sarvabhāvena bhārata

अनुवाद

हे भारत, जो मोहरहित पुरुष मुझे इस प्रकार पुरुषोत्तम जानता है, वह सब कुछ जानने वाला पुरुष सब प्रकार से मेरा ही भजन करता है

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण पुरुषोत्तम योग के ज्ञान का फल बताते हैं। जो मनुष्य मोह से मुक्त होकर कृष्ण को ही परम पुरुषोत्तम तत्व से जान लेता है, वह सर्वज्ञ हो जाता है। ऐसा ज्ञानी पुरुष अपनी पूरी चेतना और संपूर्ण भाव से केवल परमेश्वर की ही भक्ति में लीन रहता है।

Translation

O Bharata, he who, free from delusion, thus knows Me as the Supreme Divine Person, he, knowing all, worships Me with his whole being

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains the fruit of realizing the knowledge of the Supreme Person. One who is free from delusion and understands Krishna as the Supreme Divine Personality becomes all-knowing. Such a realized soul worships the Lord with undivided devotion and with their entire being.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
यःजो
माम्मुझको
एवम्इस प्रकार
असम्मूढःमोहरहित होकर
जानातिजानता है
पुरुषोत्तमम्पुरुषोत्तम (परम पुरुष)
सःवह
सर्ववित्सब कुछ जानने वाला
भजतिभजता है
माम्मुझको
सर्वभावेनसब भावों से (पूर्ण हृदय से)
भारतहे भरतवंशी अर्जुन

Word by word

WordMeaning
yaḥwho
māmMe
evamthus
asammūḍhaḥundeluded
jānātiknows
puruṣottamamas the Supreme Person
saḥhe
sarvavitthe knower of all
bhajatiworships
māṃMe
sarvabhāvenawith all his heart (whole being)
bhārataO descendant of Bharata