Chapter 15 · पुरुषोत्तमयोग
Bhagavad Gita 15.17
मूल श्लोक :
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
उत्तम पुरुष तो अन्य ही है? जो परमात्मा नामसे कहा गया है। वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकोंमें प्रविष्ट होकर सबका भरणपोषण करता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
कोई एक व्यक्ति विभिन्न उपाधियों? व्यक्तियों? कार्यों और पदों की दृष्टि से विभिन्न नामों से संबोधित किया जाता है और यदि इन आपेक्षिक दृष्टिकोणों को दूर कर दिया जाय? तो वह व्यक्ति शून्य रूप नहीं हो जायेगा। वह मात्र एक निर्विशेष व्यक्ति रह जाता है। इसी प्रकार? जो परम तत्त्व नित्यपरिवर्तनशील जगत् के रूप में क्षर पुरुष कहलाता है और क्षर के ज्ञाता के रूप में अक्षर पुरुष? वह स्वयं इन दोनों से भिन्न ही है? जिसे यहाँ उत्तम पुरुष? परमात्मा और अव्यय ईश्वर कहा गया है।क्षर से परे पहुँचने पर अक्षर ही नहीं? वरन् उत्तम पुरुष ही रह जाता है? क्योंकि क्षरत्व के अभाव में अक्षरत्व का भी अभाव हो जाता है। तब रह जाता है? इन दोनों का परमार्थ अधिष्ठान परमात्मा। यह परमात्मा या अव्यय ईश्वर तीनों लोकों में प्रवेश करके उनका धारणपोषण करता है। संस्कृत में लोक शब्द का अर्थ है वह वस्तु जो देखी या अनुभव की जाती है। इस दृष्टि से? यहाँ लोक शब्द का अर्थ स्वर्गादि लोक हो सकता है और हमारी परिचित अनुभवों की तीन अवस्थाएं जाग्रत? स्वप्न और सुषुप्ति भी हो सकती हैं। एक ही संवित् (चैतन्य) इन तीनों को प्रकाशित करता है।यहाँ विशेष ध्यान देने की बाता यह है कि इन तीनों पुरुषों को भिन्नभिन्न नहीं समझना चाहिये। केवल उत्तम पुरुष ही पारमार्थिक सत्य है? जो दो विभिन्न उपाधियों की दृष्टि से क्षर और अक्षर के रूप में प्रतीत हो रहा है। उपाधियों के अभाव में वह केवल अपने नित्यशुद्ध? निरुपाधिक स्वरूप में रह जाता है। उदाहरणार्थ? एक ही सर्वगत आकाश घट और मठ इन दो उपाधियों से अवच्छिन्न होकर घटाकाश और मठाकाश के रूप में प्रतीत होता है। यहाँ यह स्पष्ट है कि यह कोई तीन आकाश घटाकाश? मठाकाश और महाकाश नहीं बन गये हैं। घट और मठ की उपाधियों से ध्यान दूर कर लें तो ज्ञात होता कि वस्तुत आकाश एक ही है।इसी प्रकार? उत्तम पुरुष ही दृश्य और दृष्टा के रूप में क्षर और अक्षर पुरुष कहलाता है। परन्तु उपाधियों से विवर्जित हुआ वह परमात्मा ही है।अगले श्लोक में? भगवान् श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम शब्द की व्युत्पत्ति दर्शाकर यह बताते हैं कि वे किस प्रकार परम ब्रह्म स्वरूप हैं
English Translation By Swami Sivananda
But distinct is the Supreme Purusha called the highest Self, the indestructible Lord Who, pervading the three worlds, sustains them.
Transliteration
uttamaḥ puruṣastvanyaḥ paramātmetyudāhṛtaḥ
yo lokatrayamāviśya bibhartyavyaya īśvaraḥअनुवाद
परन्तु उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो परमात्मा इस नाम से कहा गया है, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है और अविनाशी ईश्वर है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण क्षर (नाशवान) और अक्षर (अविनाशी) जीवात्मा से परे ‘उत्तम पुरुष’ अर्थात् पुरुषोत्तम का वर्णन कर रहे हैं। उन्हें ही परमात्मा कहा गया है जो संपूर्ण सृष्टि का नियंता है। वह अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में व्याप्त होकर समस्त चराचर जगत का भरण-पोषण करता है।
Translation
But the Supreme Person is yet another, called the Supreme Self, who, pervading the three worlds, sustains them as the imperishable Lord.
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes the ‘Supreme Person’ (Purushottama), who is distinct from and superior to both the perishable (Kshara) and the imperishable (Akshara) entities. He is designated as the Paramatman (Supreme Soul). As the immutable Lord, He pervades the three worlds and sustains all of creation.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| उत्तमः | उत्तम |
| पुरुषः | पुरुष |
| तु | तो |
| अन्यः | अन्य (भिन्न) |
| परमात्मा | परमात्मा |
| इति | इस प्रकार |
| उदाहृतः | कहा गया है |
| यः | जो |
| लोक-त्रयम् | तीनों लोकों में |
| आविश्य | प्रवेश करके |
| बिभर्ति | धारण-पोषण करता है |
| अव्ययः | अविनाशी |
| ईश्वरः | ईश्वर (स्वामी) |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| uttamaḥ | the supreme |
| puruṣaḥ | person |
| tu | but |
| anyaḥ | another |
| paramātmā | the Supreme Self |
| iti | thus |
| udāhṛtaḥ | is called |
| yaḥ | who |
| loka-trayam | the three worlds |
| āviśya | entering |
| bibharti | sustains |
| avyayaḥ | imperishable |
| īśvaraḥ | the Lord |