श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 15 · पुरुषोत्तमयोग

Bhagavad Gita 15.13

मूल श्लोक :

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

मैं ही पृथ्वीमें प्रविष्ट होकर अपनी शक्तिसे समस्त प्राणियोंको धारण करता हूँ और मैं ही रसमय चन्द्रमाके रूपमें समस्त ओषधियों(वनस्पतियों) को पुष्ट करता हूँ।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

निसन्देह कृत्रिम उर्वरकों के आविष्कार के बहुत पूर्व से पृथ्वी का दीर्घ इतिहास रहा है। संभवत अतीत के कुछ युगों में वर्तमान समय से भी अधिक जनसंख्या इस पृथ्वी रही होगी। इस पर भी पृथ्वी ने जीवन को धारण कर रखा है। इस लोक के प्राणियों के धारणपोषण करने की पृथ्वी की क्षमता? उष्णता? खनिज द्रव्य आदि सभी भगवान् के ओजस्वरूप हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि जो चैतन्य सूर्य की उपाधि में प्रकाश तथा उष्णता के रूप में व्यक्त होता है? वही चैतन्य पृथ्वी में उसकी उर्वरा शक्ति और जीवन को धारण करने वाली गुप्त पौष्टिकता के रूप में व्यक्त होता है।रसस्वरूप चन्द्रमा बनकर मैं औषधियों का पोषण करता हूँ  वही एक चेतन तत्त्व चन्द्रमा के माध्यम से चन्द्रप्रकाश के रूप में व्यक्त होकर वनस्पतियों को पौष्टिक तत्त्वों से भर देता है। यदि इस कथन को पूर्व की पीढ़ी ने अस्वीकार किया होगा? तो आज की वैज्ञानिक शिक्षा पाये हुये विद्यार्थी गण इस कथन को चुनौती देने का साहस नहीं करेंगे। आधुनिक कृषि विज्ञान यह सिद्ध करता है कि ग्रहमण्डलों का? और विशेष रूप से चन्द्रमा का? कृषि की अनुमानित उपज से एक अटूट सम्बन्ध है  आधुनिक प्रयोगों से प्राप्त विवरणानुसार जहाँ टमाटर के बीजों को पूर्णिमा के दिन बोया गया और पुन पूर्णिमा के दिन ही तोड़ा गया? तो वहाँ अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि टमाटर की उपज सामान्य की अपेक्षा अधिक हुई थी।यह एक सुविदित और सर्वत्र स्वीकृत तथ्य है कि बीजों के लिये सुरक्षित रखे गये धान को न केवल सूर्य के ताप में सुखाया जाता है? वरन् उसे चन्द्रमा के प्रकाश में भी रखा जाता है। प्राकृतिक तथा आयुर्वेदिक चिकित्सक भी कुछ औषधियों को किसी निश्चित अवधि तक चन्द्रमा के प्रकाश में रखते हैं? और उनका यह कथन है कि इससे उन औषधियों में रोगोपचार की क्षमता आ,जाती है।इस श्लोक में इन सभी तथ्यों को इंगित मात्र किया गया है? जिससे यह सिद्ध होता है कि भगवान् श्रीकृष्ण का कथन अवैज्ञानिक नहीं है।भौतिक जगत् के सूर्य? चन्द्रमा और अग्नि ये ऊर्जा के स्रोत वस्तुत अनन्तस्वरूप परमात्मा ही हैं। सूर्य में यह प्रकाश है और चन्द्रमा में वह रसस्वरूप पोषक तत्त्व है। वही चैतन्य पृथ्वी में प्रवेश कर समस्त प्राणियों का धारणपोषण करने वाला बन जाता है।और

English Translation By Swami Sivananda

Permeating the earth I support all beings by (My) energy; and having become the watery moon I nourish all herbs.

Transliteration

gām āviśya ca bhūtāni dhārayāmy aham ojasā
puṣṇāmi cauṣadhīḥ sarvāḥ somo bhūtvā rasātmakaḥ

अनुवाद

और पृथ्वी में प्रवेश करके मैं अपनी शक्ति से सब भूतों को धारण करता हूँ, और रसमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण औषधियों को अर्थात् वनस्पतियों को पुष्ट करता हूँ।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अपनी सर्वव्यापक शक्ति का वर्णन कर रहे हैं। वे बताते हैं कि वे ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी गुरुत्वाकर्षण और धारण शक्ति से सभी चराचर प्राणियों को थामे रखते हैं। इसके अतिरिक्त, वे ही अमृतमय चन्द्रमा के रूप में समस्त वनस्पतियों, औषधियों और फसलों को पोषण प्रदान करते हैं जिससे उनमें स्वाद और जीवन-शक्ति आती है।

Translation

And entering the earth, I support all beings by My vital energy; and becoming the sapful moon, I nourish all herbs and plants.

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes His all-pervading energy that sustains life. He explains that He enters the earth and supports all living beings with His vital force (gravity and sustaining power). Furthermore, as the moisture-giving moon, He nourishes all vegetation, herbs, and crops, giving them their essential sap, flavor, and nutritional value.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
गाम्पृथ्वी में
आविश्यप्रवेश करके
चऔर
भूतानिसब प्राणियों को
धारयामिधारण करता हूँ
अहम्मैं
ओजसाअपनी शक्ति से
पुष्णामिपुष्ट करता हूँ
चऔर
औषधीःऔषधियों को (वनस्पतियों को)
सर्वाःसमस्त
सोमःचन्द्रमा
भूत्वाबनकर
रसात्मकःरसयुक्त (अमृतमय)

Word by word

WordMeaning
gāmthe earth
āviśyaentering
caand
bhūtāniliving beings
dhārayāmisustain
ahamI
ojasāby My energy
puṣṇāminourish
caand
auṣadhīḥherbs (vegetation)
sarvāḥall
somaḥthe moon
bhūtvābecoming
rasātmakaḥfull of sap (juicy)