श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 15 · पुरुषोत्तमयोग

Bhagavad Gita 15.10

मूल श्लोक :

उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

शरीरको छोड़कर जाते हुए या दूसरे शरीरमें स्थित हुए अथवा विषयोंको भोगते हुए भी गुणोंसे युक्त जीवात्माके स्वरूपको मूढ़ मनुष्य नहीं जानते? ज्ञानरूपी नेत्रोंवाले ज्ञानी मनुष्य ही जानते हैं।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

यह एक सर्वत्र अनुभव सत्य है कि सामान्य बुद्धि का पुरुष यद्यपि वस्तु को देखता है? तथापि उसे पूर्ण तथा यथार्थ रूप से समझ नहीं पाता है। वस्तु का वास्तविक ज्ञान केवल उस विषय के ज्ञानियों को ही उपलब्ध होता है।प्रत्येक व्यक्ति किसी साहित्यिक रचना को पढ़ सकता है? परन्तु एक भाषाविद् पुरुष ही उस रचनाकार की दृष्टि को यथार्थत समझकर उसका पूर्ण आनन्द अनुभव कर सकता है। एक जौहरी ही मणियों के गुणस्तर और वास्तविक मूल्य को आंक सकता है। अन्य लोग केवल देख ही सकते हैं। सभी लोग संगीत सुन सकते हैं? किन्तु एक कुशल संगीतज्ञ ही किसी सर्वोत्कृष्ट गायन की शास्त्रीय सूक्ष्मता एवं सुन्दरता का आनन्द उठा सकता है।इसी प्रकार? इसी चैतन्य आत्मा की उपस्थिति से ही हम विषय? भावनाओं और विचारों का अनुभव करते हैं? परन्तु केवल आत्मज्ञानी पुरुष ही इसे पहचानते हैं और स्वयं आत्मस्वरूप बनकर जीते हैं।आत्मा तो नित्य विद्यमान है। इसका अभाव कभी नहीं होता। देहत्याग के समय सूक्ष्म शरीर को चेतनता प्रदान करने वाला आत्मा ही होता है। एक देहविशेष के जीवन काल में आत्मा ही समस्त अनुभवों को प्रकाशित करता है। सुखदुखात्मक मानसिक अनुभवों तथा बुद्धि के निर्णयों का प्रकाशक भी आत्मा ही है। इसी प्रकार क्षणक्षण परिवर्तनशील हमारे मन के सात्त्विक (शांति)? राजसिक (विक्षेप) और तामसिक (मोहादि) भावों का ज्ञान भी चैतन्य के कारण ही संभव होता है फिर भी अविवेकी जन उसे पहचान नहीं पाते जिसकी उपस्थिति से ही कोई अनुभव संभव हो सकता है।सामान्य जन अपने अनुभवों तथा उनके विषयों के प्रति ही इतने अधिक आसक्त और व्यस्त हो जाते हैं कि उनका सम्पूर्ण ध्यान बाह्य विषयों और सुन्दर संरचनाओं की सुन्दरता में ही आकृष्ट रहता है। वे उस आत्मा की उपेक्षा करते हैं तथा उसे पहचान नहीं पाते? जिसकी उपस्थिति से ही कोई अनुभव संभव हो सकता है।इनके सर्वथा विपरीत वे ज्ञानीजन हैं? जो नाम और रूपों के विस्तार से विरक्त होकर इस विस्तार के सार तत्त्व उस ब्रह्म को देखते हैं? जो उनके हृदय में आत्मरूप से स्थित सभी को प्रकाशित करता है। इस आत्मतत्त्व का दर्शन वे ज्ञानचक्षु से करते हैं। ज्ञानचक्षु कोई अन्तरिन्द्रिय नहीं हैं। विवेक वैराग्य आदि गुणों से सम्पन्न साधक जब वेदान्त प्रमाण के द्वारा आत्मविचार करता है? तब उस विचार से प्राप्त आत्मबोध ही ज्ञानचक्षु है। श्री शंकराचार्य ने इस ज्ञानचक्षु का और कलात्मक वर्णन अपने आत्मबोध नामक ग्रन्थ में,किया है।आत्मदर्शन करने में अज्ञानी की विफलता और ज्ञानी की सफलता का कारण अगले श्लोक में वर्णन करते हैं

English Translation By Swami Sivananda

The deluded do not see Him Who departs, stays and enjoys; but they who possess the eye of knowledge behold Him.

Transliteration

utkrāmantaṃ sthitaṃ vāpi bhuñjānaṃ vā guṇānvitam
vimūḍhā nānupaśyanti paśyanti jñānacakṣuṣaḥ

अनुवाद

शरीर को छोड़कर जाते हुए को, अथवा शरीर में स्थित हुए को अथवा विषयों को भोगते हुए को और गुणों से युक्त हुए को भी अज्ञानी मनुष्य नहीं देख पाते; केवल ज्ञान रूपी नेत्रों वाले ही देख पाते हैं

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण समझाते हैं कि जीवात्मा किस प्रकार एक शरीर से दूसरे शरीर में जाती है या शरीर में रहकर विषयों का भोग करती है। जो लोग अज्ञानी हैं और भौतिक संसार के मोह में फंसे हैं, वे इस सूक्ष्म प्रक्रिया को नहीं देख पाते। केवल वे ही इसे देख पाते हैं जिनके पास विवेक और ज्ञान रूपी नेत्र हैं।

Translation

Those who are deluded do not perceive the soul departing, staying, or enjoying, associated with the modes of nature; but those who possess the eyes of knowledge do perceive it

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains that the deluded cannot perceive the soul as it departs the body, dwells within it, or experiences life under the influence of the material modes. Only those who have developed the eyes of wisdom and spiritual discrimination can perceive the presence and movement of the soul.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
उत्क्रामन्तम्शरीर से बाहर जाते हुए को
स्थितम्शरीर में स्थित हुए को
वाअथवा
अपिभी
भुञ्जानम्भोगते हुए को
वाअथवा
गुण-अन्वितम्गुणों से युक्त को
विमूढाःमूर्ख / अज्ञानी लोग
नहीं
अनुपश्यन्तिदेख पाते हैं
पश्यन्तिदेखते हैं
ज्ञान-चक्षुषःज्ञान रूपी नेत्रों वाले

Word by word

WordMeaning
utkrāmantamdeparting (the body)
sthitamstaying (in the body)
or
apieven
bhuñjānamenjoying / experiencing
or
guṇa-anvitamassociated with the modes of nature
vimūḍhāḥthe deluded ones
nanot
anupaśyantido perceive
paśyantido see
jñāna-cakṣuṣaḥthose with the eyes of knowledge