श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 15 · पुरुषोत्तमयोग

Bhagavad Gita 15.1

मूल श्लोक :

श्री भगवानुवाच
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

(टिप्पणी प0 741) श्रीभगवान् बोले -- ऊपरकी ओर मूलवाले तथा नीचेकी ओर शाखावाले जिस संसाररूप अश्वत्थवृक्षको अव्यय कहते हैं और वेद जिसके पत्ते हैं? उस संसारवृक्षको जो जानता है? वह सम्पूर्ण वेदोंको जाननेवाला है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

यह श्लोक हमें कठोपनिषद् में वर्णित अश्वत्थ वृक्ष का स्मरण कराता है। वहाँ संसार वृक्ष का केवल निर्देश किया गया है? किन्तु यहाँ महर्षि व्यास पूर्ण रूप से उसका चित्रण करते हैं। अनित्य संसार का नित्य परमात्मा के साथ जो संबंध है उसको भी इस वर्णन में दर्शाया गया है। यदि परमात्मा एकमेव अद्वितीय सत्य है? तो उससे परिच्छिन्न जड़ जगत् कैसे उत्पन्न हुआ  उत्पन्न होने के पश्चात् कौन इसका धारण पोषण करता है  सृष्टिकर्ता अनन्त ईश्वर और सृष्ट सान्त जगत् के मध्य वस्तुत क्या संबंध है  जीवन के विषय में गंभीरता से विचार करना प्रारंभ करते ही मन में इस प्रकार के प्रश्न उठने लगते हैं।इस अध्याय में विवेचित अध्यात्म का सम्पूर्ण सिद्धान्त पीपल के वृक्ष के सुन्दर रूपक के माध्यम से इस अध्याय के प्रथम तीन श्लोकों में वर्णित है।वनस्पति शास्त्र में अश्वत्थ वृक्ष का नाम फाइकस रिलिजिओसा है जो लोक में पीपल के वृक्ष के नाम से प्रसिद्ध है। यह ध्यान रहे कि अश्वत्थ वृक्ष से वटवृक्ष नहीं सूचित किया गया है। शंकराचार्य जी के अनुसार संसार को अश्वत्थ नाम व्युत्पत्ति के आधार पर दिया गया है। अश्वत्थ का अर्थ इस प्रकार है श्व का अर्थ आगामी कल है? त्थ का अर्थ है स्थित रहने वाला? अत अश्वत्थ का अर्थ है वह जो कल अर्थात् अगले क्षण पूर्ववत् स्थित नहीं रहने वाला है। तात्पर्य यह हुआ कि अश्वत्थ शब्द से इस सम्पूर्ण अनित्य और परिवर्तनशील दृश्यमान जगत् की ओर इंगित किया गया है।इस श्लोक में कहा गया है कि इस अश्वत्थ का मूल ऊर्ध्व में अर्थात् ऊपर है। इसका यदि केवल वाच्यार्थ ही ग्रहण करें? तो ऐसा प्रतीत होगा कि किसी अशिक्षित चित्रकार ने इस संसार वृक्ष को चित्रित किया है। यह चित्र आध्यात्मिक दृष्टि से असंगत? धार्मिक दृष्टि से हानिकर और सौन्दर्य की दृष्टि से कुरूप लग सकता है। परन्तु ऐसा विचार इस ध्रर्मशास्त्रीय चित्र के महान् गौरव का अपमान है।शंकराचार्यजी ने ही उपनिषद् के भाष्य में यह लिखा है कि संसार को वृक्ष कहने का कारण यह है कि उसको काटा जा सकता है  व्रश्चनात् वृक्ष। वैराग्य के द्वारा हम अपने उन समस्त दुखों को समाप्त कर सकते हैं जो इस संसार में हमें अनुभव होते हैं। जो संसारवृक्ष परमात्मा से अंकुरित होकर व्यक्त हुआ प्रतीत होता है? उसे हम अपना ध्यान परमात्मा में केन्द्रित करके काट सकते हैं।इतिहास के विद्यार्थियों को अनेक राजवंशों की परम्पराओं का स्मरण रखना होता है। उसमें जो परम्परा दर्शायी जाती है? वह इस ऊर्ध्वमूल वृक्ष के समान ही होती है। एक मूल पुरुष से ही उस वंश का विस्तार होता है। इसी प्रकार? इस संसार वृक्ष का मूल ऊर्ध्व कहा है? जो सच्चिदानन्द ब्रह्म है। वृक्ष को आधार तथा पोषण अपने ही मूल से ही प्राप्त होता है इसी प्रकार? भोक्ता जीव और भोग्य जगत् दोनों अपना आधार और पोषण शुद्ध अनन्तस्वरूप ब्रह्म से ही प्राप्त करते हैं।तथापि अनेक लोगों की जिज्ञासा ऊर्ध्व शब्द के उपयोग को जानने की होती है। ऊर्ध्व शब्द का प्रयोग उसी अर्थ में किया गया है? जैसे लोक में हम उच्च वर्ग? उच्च अधिकारी? उच्च आभूषण आदि का प्रयोग करते हैं। उच्च शब्द से तात्पर्य रेखागणितीय उच्चता से नहीं है वरन् श्रेष्ठ? आदर्श अथवा मूल्य से है। भावनाओं की दृष्टि से भी स्वभावत मनुष्य सूक्ष्म और दिव्य तत्त्व को उच्चस्थान प्रदान करता है और स्थूल व आसुरी तत्त्व को अधस्थान। देश काल और कारण के परे होने पर भी परमात्मा को यहाँ ऊर्ध्व कहा गया है। वह जड़ प्रकृति को चेतनता प्रदान करने वाला स्वयंप्रकाश स्वरूप तत्त्व है। स्वाभाविक है कि यहाँ रूपक की भाषा में दर्शाया गया है कि यह संसार वृक्ष ऊर्ध्वमूल वाला है।इस परिवर्तनशील जगत् (अश्वस्थ) को अव्यय अर्थात् अविनाशी माना गया है। परन्तु केवल आपेक्षिक दृष्टि से ही उसे अव्यय कहा गया है। किसी ग्राम में स्थित पीपल का वृक्ष अनेक पीढ़ियों को देखता है? जो उसकी छाया में खेलती और बड़ी होती हैं। इस प्रकार? मनुष्य की औसत आयु की अपेक्षा वह वृक्ष अव्यय या नित्य कहा जा सकता है। इसी प्रकार इन अनेक पीढ़ियों की तुलना में जो विकसित होती हैं? कल्पनाएं और योजनाएं बनाती हैं? प्रयत्न करके लक्ष्य प्राप्त कर नष्ट हो जाती हैं यह जगत् अव्यय कहा जा सकता है।छन्द अर्थात् वेद इस वृक्ष के पर्ण हैं। वेद का अर्थ है ज्ञान। ज्ञान की वृद्धि से मनुष्य के जीवन में अवश्य ही गति आ जाती है। आधुनिक जगत् की भौतिक उन्नति? विज्ञान की प्रगति? औद्योगिक क्षेत्र की उपलब्धि और अतिमानवीय स्फूर्ति की तुलना में प्राचीन पीढ़ी को जीवित भी नहीं कहा जा सकता। ज्ञान की वृद्धि से भावी लक्ष्य और अधिक स्पष्ट दिखाई देता है ? जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य उसे पाने के लिये और अधिक प्रयत्नशील हो जाता है। वेद अर्थात् ज्ञान की तुलना वृक्ष के पर्णों के साथ करना अनुपयुक्त नहीं है। वृक्ष के पर्ण वे स्थान हैं जहाँ से जल वाष्प बनकर उड़ जाता है? जिससे वृक्ष की जड़ों में एक दबाव उत्पन्न होता है। इस दबाव के कारण जड़ों को पृथ्वी से अधिक जल और पोषक तत्त्व एकत्र करने में सुविधा होती है। अत यदि वृक्ष के पत्तों को काट दिया जाये? तो वृक्ष का विकास तत्काल अवरुद्ध हो जायेगा। पत्तों की संख्या जितनी अधिक होगी वृक्ष का परिमाण और विकास उतना ही अधिक होगा। जहाँ ज्ञान की अधिकता होती है वहाँ व्यक्त जीवन की चमक भी अधिक दिखाई देती है।जो पुरुष न केवल अश्वत्थ वृक्ष को ही जानता है? वरन् उसके पारमार्थिक सत्यस्वरूप ऊर्ध्वमूल को भी पहचानता है? वही पुरुष वास्तव में वेदवित् अर्थात् वेदार्थवित् है। उसका वेदाध्ययन का प्रयोजन सिद्ध हो गया है। वेदों का प्रयोजन सम्पूर्ण विश्व के आदि स्रोत एकमेव अद्वितीय परमात्मा का बोध कराना है। सत्य का पूर्णज्ञान न केवल शुद्धज्ञान (भौतिक विज्ञान) से और न केवल भक्ति से ही प्राप्त हो सकता है। यह गीता का निष्कर्ष है। जब हम इहलोक और परलोक? सान्त और अनन्त? सृष्ट और सृष्टिकर्ता इन सबको तत्त्वत जानते हैं? तभी हमारा ज्ञान पूर्ण कहलाता है। ज्ञान की अन्य शाखाएं कितनी ही दर्शनीय क्यों न हों? वे सम्पूर्ण सत्य के किसी पक्ष्ा विशेष को ही दर्शाती हैं। वेदों के अनुसार पूर्ण ज्ञानी पुरुष वह है? जो इस नश्वर संसारवृक्ष तथा इसके अनश्वर ऊर्ध्वमूल (परमात्मा) को भी जानता है। भगवान् श्रीकृष्ण उसे यहाँ वेदवित् कहते हैं।संसार वृक्ष के अन्य अवयवों का रूपकीय वर्णन अगले श्लोक में किया गया है

English Translation By Swami Sivananda

The Blessed Lord said  They (the wise) speak of the indestructible peepul tree having its root above and branches below, whose leaves are the metres or hymns: he who knows it is a knower of the Vedas.

Transliteration

śrī-bhagavān uvāca
ūrdhvamūlam adhaḥśākham aśvatthaṃ prāhur avyayam
chandāṃsi yasya parṇāni yas taṃ veda sa vedavit

अनुवाद

श्री भगवान ने कहा — ऊपर की ओर जड़ों वाले और नीचे की ओर शाखाओं वाले जिस अश्वत्थ (पीपल) के वृक्ष को अविनाशी कहते हैं, वेद जिसके पत्ते हैं, जो उस वृक्ष को जानता है, वह वेदों को जानने वाला है।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण संसार की तुलना एक उल्टे पीपल के वृक्ष (अश्वत्थ) से करते हैं, जिसकी जड़ें ऊपर (परमेश्वर में) हैं और शाखाएं नीचे (संसार में) फैली हुई हैं। इसके पत्ते वैदिक मन्त्रों के समान हैं जो कर्मकांडों के माध्यम से जीव को इस संसार में बांधे रखते हैं। जो मनुष्य इस संसार रूपी वृक्ष के वास्तविक स्वरूप को समझ लेता है, वही वास्तव में वेदों के गूढ़ रहस्य को जानता है।

Translation

The Supreme Lord said: They speak of an eternal Ashvattha tree with its roots above and branches below, whose leaves are the Vedic hymns. One who knows this tree is the knower of the Vedas.

Meaning

In this verse, Lord Krishna compares the material world to an inverted Ashvattha (banyan/peepal) tree, which has its roots facing upwards in the Supreme Divine and branches spreading downwards. The leaves of this tree represent the Vedic hymns that sustain material existence through ritualistic actions. One who understands the true nature of this cosmic tree and its source is considered to have understood the ultimate purpose of the Vedas.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
श्री-भगवान्श्री भगवान्
उवाचने कहा
ऊर्ध्व-मूलम्ऊपर की ओर जड़ों वाला
अधः-शाखम्नीचे की ओर शाखाओं वाला
अश्वत्थम्अश्वत्थ (पीपल) के वृक्ष को
प्राहुःकहते हैं
अव्ययम्अविनाशी
छन्दांसिवैदिक गीत (छन्द)
यस्यजिसके
पर्णानिपत्ते हैं
यःजो
तम्उस (वृक्ष) को
वेदजानता है
सःवह
वेद-वित्वेदों को जानने वाला है

Word by word

WordMeaning
śrī-bhagavānthe Supreme Lord
uvācasaid
ūrdhva-mūlamwith roots above
adhaḥ-śākhamwith branches below
aśvatthamthe Ashvattha (sacred fig) tree
prāhuḥthey speak of
avyayameternal / imperishable
chandāṃsithe Vedic hymns
yasyawhose
parṇānileaves
yaḥwho
tamthat (tree)
vedaknows
saḥhe
veda-vitis the knower of the Vedas