Chapter 14 · गुणत्रयविभागयोग
Bhagavad Gita 14.7
मूल श्लोक :
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे कुन्तीनन्दन तृष्णा और आसक्तिको पैदा करनेवाले रजोगुणको तुम रागस्वरूप समझो। वह कर्मोंकी आसक्तिसे शरीरधारीको बाँधता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
अपने मन पर विजय प्राप्त करने के इच्छुक साधक को मन की उन समस्त सूक्ष्म प्रवृत्तियों एवं रुचियों का ज्ञान होना चाहिये? जिनके द्वारा वह बारम्बार उन्मत्त के समान विषयों की ओर भागता है। इस प्रकार? यह मन साधक के आन्तरिक व्यक्तित्व को नष्ट करने के षड्यन्त्र में ही लगा रहता है।रजोगुण को रागस्वरूप जानो जब अन्तकरण में रजोगुण के प्रभावों का घातक आक्रमण होता है तब वह मनुष्य के मन को असंख्य पीड़ादायक उद्वेगों से चूरचूर कर देता है। मन के स्तर पर उठने वाले ये उद्वेग ही रजोगुण के मुख्य लक्षण हैं। ये मनोवेग असंख्य प्रकार से व्यक्त होते हैं? जैसे हठ? कामना? भावना इत्यादि। तथापि इन सबका समावेश केवल दो वृत्तियों में किया जा सकता है तृष्णा और संग अर्थात् आसक्ति। यहाँ इन दोनों का ही समस्त उद्वेगों के मुख्य स्रोत के रूप में निर्देश किया गया है।तृष्णा और संग विषयोपभोग की इच्छा के लिये संस्कृत में शब्द है तृष्णा अर्थात् प्यास। एक प्यासे व्यक्ति के लिये उस समय जल से अधिक महत्व की और कोई शान्तिप्रद वस्तु प्रतीत ही नहीं होती है। वह तृष्णा के कारण छटपटाता है? और केवल किसी प्रकार किसी भी स्थान से जल प्राप्त करने के लिये प्रयत्न करता है। इसी प्रकार एक बार किसी विषय की कामना मन में उत्पन्न हो जाती है? तब उसकी सन्तुष्टि किये बिना मनुष्य को शान्ति अनुभव नहीं होती। यदि इष्ट वस्तु की प्राप्ति हो जाती है? तो उसके प्रति संग हो जाता है। संग एक ऐसा दुष्ट मनोवेग है? जो मन के सुख और शान्ति को भंग कर देता है। संक्षेपत? अप्राप्त वस्तु को पाने की काम्ाना तृष्णा कहलाती है? और प्राप्त वस्तु से आसक्ति को संग कहते हैं।विषयों के प्रति मन में उत्पन्न होने वाली तृष्णा और संग ही वे ज्वालामुखी पर्वत हैं? जो निरन्तर अपना पिघला लावा उगल कर जीवन के हंसते उपवन को झुलसाकर ध्वस्त कर देते हैं। इन आग्नेय पर्वतों से उगला गया तप्त लावा विविध प्रकार के मनोद्वेग हैं? जो मनुष्य के कामुक जीवन में असंख्य वस्तुओं को अर्जित करने? उन पर अधिकार जमाने और उन्हें सुरक्षित रखने के लिये संघर्ष और कलह को जन्म देते हैं।यह रजोगुण मनुष्य को कर्मासक्ति से बांधता है रजोगुण के वशीभूत पुरुष के मन में विभिन्न इच्छाएं उत्पन्न होती हैं? जिन्हें पूर्ण करने के लिये स्वाभाविक है कि वह दिनरात कर्म में ही व्यस्त और आसक्त हो जाता है। उसका सम्पूर्ण जीवन धन के आय और व्यय? वस्तुओं के अर्जन और रक्षण करने में ही व्यतीत होता है। इस प्रक्रिया में उसका शरीर तो वृद्ध होता जाता है परन्तु उसकी तृष्णा नवयौवन को प्राप्त होती जाती है अधिकाधिक भोग को प्राप्त करने की व्याकुलता और प्राप्त वस्तु के नष्ट होने के भय के कारण वह एक कर्म से दूसरे कर्म में प्रवृत्त रहता है। इस प्रकार अपने ही कर्मों से उत्पन्न हुए सुख दुख रूप फलों को भोगने के लिए य्ाह जीव देह से बंधा रहता है।यदि सत्त्वगुण के बन्धन में मनुष्य को यह अभिमान होता है कि मैं सुखी हूँ और मैं जानने वाला हूँ? तो रजोगुण में मैं कर्ता हूँ इस प्रकार कर्तृत्व का अभिमान होता है। इस तथ्य का हमें स्मरण रहे कि इन गुणों से उत्पन्न ये बन्धन प्रतीतिक ही हैं? वास्तविक नहीं।
English Translation By Swami Sivananda
Know thou Rajas to be of the nature of passion, the source of thirst (for sensual enjoyment) and attachment; it binds fast, O Arjuna, the embodied one by attachment to action.
Transliteration
rajo rāgātmakama viddhi tṛṣṇāsaṅgasamudbhavam
tannibadhnāti kaunteya karmasaṅgena dehinamअनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! रजोगुण को राग रूप (कामनाओं से उत्पन्न) जानो, जो तृष्णा और आसक्ति से उत्पन्न होता है। वह इस जीवात्मा को कर्मों की आसक्ति से बाँधता है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को रजोगुण के स्वभाव और उसके बंधनकारी प्रभाव के बारे में बता रहे हैं। रजोगुण मुख्य रूप से तीव्र इच्छाओं, कामनाओं और सांसारिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति से उत्पन्न होता है। यह मनुष्य को निरंतर कर्म करने और उनके फलों की लालसा में व्यस्त रखता है, जिससे वह संसार चक्र में बंधा रहता है।
Translation
O son of Kunti, know the mode of passion (rajas) to be of the nature of desire, born of longing and attachment. It binds the embodied soul through attachment to action.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains the nature and binding effect of the mode of passion (rajas) to Arjuna. Rajas is characterized by intense desires, longings, and attachment to worldly objects. It binds the embodied soul by driving it towards constant action and the craving for the fruits of those actions, keeping it entangled in the material world.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| रजः | रजोगुण को |
| राग-आत्मकम् | राग रूप (कामनाओं से युक्त) |
| विद्धि | जानो |
| तृष्णा-सङ्ग-समुद्भवम् | लालसा और आसक्ति से उत्पन्न होने वाला |
| तत् | वह (रजोगुण) |
| निबध्नाति | बाँधता है |
| कौन्तेय | हे कुन्तीपुत्र (अर्जुन) |
| कर्म-सङ्गेन | कर्मों की आसक्ति से |
| देहिनम् | शरीरधारी जीवात्मा को |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| rajaḥ | the mode of passion |
| rāga-ātmakam | of the nature of desire |
| viddhi | know |
| tṛṣṇā-saṅga-samudbhavam | born of longing and attachment |
| tat | that |
| nibadhnāti | binds |
| kaunteya | O son of Kuntī |
| karma-saṅgena | by attachment to action |
| dehinam | the embodied soul |