Chapter 14 · गुणत्रयविभागयोग
Bhagavad Gita 14.6
मूल श्लोक :
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे पापरहित अर्जुन उन गुणोंमें सत्त्वगुण निर्मल (स्वच्छ) होनेके कारण प्रकाशक और निर्विकार है। वह सुख और ज्ञानकी आसक्तिसे (देहीको) बाँधता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
विज्ञान की सभी शाखाओं में इस तथ्य को स्वीकार किया गया है कि किसी वस्तु के लक्षणों का वर्णन किये बिना उसे परिभाषित नहीं किया जा सकता है। किसी रोग या किसी भावना के विषय में भी यही बात सत्य है। इसी प्रकार इन गुणों की भी अपने आप में कोई परिभाषा नहीं दी जा सकती। आगे के श्लोकों में यह वर्णन किया गया है कि इन गुणों के लक्षण क्या हैं तथा जब कभी कोई गुण अधिक प्रबल हो जाता है? तब उससे प्रभावित व्यक्ति का व्यवहार किस प्रकार होता है। निसन्देह? यह लक्षणात्मक वर्णन हम साधकों के लिए अधिक सहायक होगा? क्योंकि हम अपने मन में उठने वाले विचारों एवं भावनाओं का निरीक्षण और विश्लेषण कर यह निश्चित कर सकेंगे कि किसी क्षण विशेष में हम कौन से गुण के वश में हैं। इस प्रकार? उस प्रभाव के बन्धन से मुक्त होने का प्रयत्न भी हम कर सकेंगे।निर्मल होने से सत्त्वगुण प्रकाशमय है जिस प्रकार जल स्वत शुद्ध होता है? परन्तु अन्य मिश्रणों से अशुद्ध बन जाता है। उसी प्रकार सत्त्वगुण भी स्वत निर्मल होने से प्रकाशक अर्थात् आत्मचैतन्य को स्पष्ट प्रतिबिम्बित करने वाला है। उसमें न रजोगुण का विक्षेप है न तमोगुण का घोर अज्ञान।अनामय इस शब्द का अर्थ है उपद्रवरहित अर्थात् दोषरहित। आत्मस्वरूप का अज्ञान तथा उससे उत्पन्न अहंकार और स्वार्थ ही मूल दोष हैं? जिनसे अन्य अनर्थों की उत्पत्ति होती है। ये दोष रजोगुण और तमोगुण से ही उत्पन्न होते हैं। इसलिये यहाँ कहा गया है कि सत्त्वगुण स्वत इन दोषों से रहित है। यद्यपि सत्त्वगुण निर्मल है तथापि वह भी बन्धनकारक होता है। उससे उत्पन्न होने वाले बंधनों का निर्देश यहाँ किया गया है।सत्त्वगुण सुख और ज्ञान की आसक्ति से जीव को बांधता है अपने आनन्दस्वरूप को न जानकर जीव सदैव विषयों में ही सुख की खोज करता रहता है। यह अज्ञान तमोगुण का लक्षण है तथा विषयों में सुख की कल्पना और विक्षेप रजोगुण का लक्षण है। प्रयत्नों के फलस्वरूप जब कभी इष्ट विषय की प्राप्ति होती है? तब क्षणभर के लिये विक्षेपों की शान्ति हो जाती है। उस शान्त स्थिति में आत्मा का आनन्द अभिव्यक्त होता है। परन्तु जीव यही समझता है कि वह सुख उसे विषय से प्राप्त हुआ है और मन की उस सुख वृत्ति के साथ तादात्म्य करके कहता है? मैं सुखी हूँ। इस प्रकार? विषयोपभोग से उत्पन्न यह सुखवृत्ति क्षेत्र का धर्म होने पर भी उसे अपना धर्म समझ कर उसमें आसक्त होना ही सत्त्वगुण से उत्पन्न हुआ बंधन है।सत्त्वगुण प्रधान बुद्धि स्वभावत स्थिर होती है। इसलिये उसमें चैतन्य का प्रकाश स्पष्टरूप से प्रतिबिम्बित होता है। इस प्रतिबिम्बित प्रकाश को ही हम बुद्धि का प्रकाश कहते हैं? जिसके द्वारा हमें विषयों का ज्ञान होता है। यही कारण है कि इस गुण के न्यूनाधिक्य के कारण ही सभी व्यक्तियों की बौद्धिक क्षमता एक समान नहीं होती।इस प्रकार? बुद्धि के इस प्रकाश से प्रकाशित होकर विषय के ज्ञान की वृत्ति अन्तकरण में उदित होती है मनुष्य इसी वृत्ति के साथ तादात्म्य करके अभिमानपूर्वक कहता है? मैं इस वस्तु का ज्ञाता हूँ। यहाँ भी क्षेत्र के धर्म के साथ तादात्म्य है और यही ज्ञान से आसक्ति का बन्धन है।इन दोनों का सरल अर्थ यह भी है कि जब मनुष्य को सूक्ष्मतर सुख या ज्ञान का अनुभव हो जाता है? तब उसका मन उसी में इतना अधिक आसक्त होकर रमता है कि उसका ध्यान सूक्ष्मतम वस्तु की ओर सहसा आकर्षित ही नहीं होता। यह सत्त्वगुण का बन्धन है। यह स्वर्ण की शृंखला है? परन्तु है तो शृंखला हीभगवान् कहते हैं कि सत्त्वगुण सुख संग और ज्ञान के साथ आसक्ति से बांध देता है। एक बार जब कोई व्यक्ति रचनात्मक चिन्तन तथा सदाचार और ज्ञान के अनुप्राणित जीवन के सात्त्विक आनन्द का अनुभव कर लेता है? तब उसमें वह इतना आसक्त हो जाता है कि फिर उसके लिये वह अपने सर्वस्व का भी त्याग करने के लिये तत्पर रहता है। विज्ञान को अपना जीवन समर्पित किये हुये प्रयोगशाला में कार्यरत एक सच्चा वैज्ञानिक क्षुधा और व्याधि से दुर्बल अपनी चित्रशाला में चित्रांकन कर रहा चित्रकार समाज द्वारा बहिष्कृत सार्वजनिक उद्यानों में रहकर अपनी कल्पनाओं? भावों और शब्दों के ही आनन्द में निमग्न एक कवि क्रूर उत्पीड़न को सहने वाले देशभक्त दीर्घकाल तक देश निष्कासन का जीवन जीने वाले राजनीतिज्ञ मृत्यु का आलिंगन करने वाले पर्वतारोही ये सब उदाहरण ऐसे पुरुषों के हैं? जिन्हें सात्त्विक आनन्द का अनुभव होता है और जो उसी में आसक्त हो जाते हैं? जैसे स्थूल बुद्धि के लोग धन तथा अन्य भौतिक वस्तुओं के परिग्रह में आसक्त रहते हैं।रजोगुण का बन्धन निम्न प्रकार से होता है
English Translation By Swami Sivananda
Of these, Sattva, which from its stainlessness is luminous and healthy, binds by attachment to happiness and by attachment to knowledge, O sinless one.
Transliteration
tatra sattvaṃ nirmalatvāt prakāśakam anāmayam
sukhasaṅgena badhnāti jñānasaṅgena cānaghaअनुवाद
हे निष्पाप अर्जुन! उन तीनों गुणों में से सत्त्वगुण अपने निर्मल होने के कारण प्रकाश करने वाला और उपद्रवरहित है, वह सुख की आसक्ति से और ज्ञान की आसक्ति से जीवात्मा को बाँधता है
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण सत्त्वगुण के लक्षणों और उसके द्वारा जीवात्मा के बंधन की प्रक्रिया का वर्णन करते हैं। सत्त्वगुण अत्यंत पवित्र, प्रकाशमान और शांत होता है, जिससे मनुष्य में ज्ञान और सुख का उदय होता है। परंतु, यह गुण भी जीवात्मा को ‘मैं सुखी हूँ’ या ‘मैं ज्ञानी हूँ’ इस अहंकार और आसक्ति में बाँधकर संसार चक्र में फंसाए रखता है।
Translation
O sinless one, among these, the quality of goodness (sattva), being pure, is illuminating and free from disease; it binds the soul through attachment to happiness and attachment to knowledge
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes the characteristics of Sattva-guna (the mode of goodness) and how it binds the soul. Sattva is pure, illuminating, and peaceful, leading to happiness and wisdom. However, it still binds the conditioned soul to the material world through attachment to the ego of being happy and knowledgeable.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| तत्र | उनमें (तीनों गुणों में) |
| सत्त्वम् | सत्त्वगुण |
| निर्मलत्वात् | निर्मल होने के कारण |
| प्रकाशकम् | प्रकाश करने वाला |
| अनामयम् | विकाररहित (स्वस्थ) |
| सुख-सङ्गेन | सुख के सम्बन्ध से (आसक्ति से) |
| बध्नाति | बाँधता है |
| ज्ञान-सङ्गेन | ज्ञान के सम्बन्ध से (आसक्ति से) |
| च | और |
| अनघ | हे निष्पाप (अर्जुन) |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| tatra | there (among those) |
| sattvam | the mode of goodness |
| nirmalatvāt | due to being pure |
| prakāśakam | illuminating |
| anāmayam | free from disease (healthy) |
| sukha-saṅgena | by attachment to happiness |
| badhnāti | binds |
| jñāna-saṅgena | by attachment to knowledge |
| ca | and |
| anagha | O sinless one (Arjuna) |