श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 14 · गुणत्रयविभागयोग

Bhagavad Gita 14.5

मूल श्लोक :

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे महाबाहो प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले सत्त्व? रज और तम -- ये तीनों गुण अविनाशी देहीको देहमें बाँध देते हैं।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

गुण शब्द अध्यात्मशास्त्र की पारिभाषिक शब्दावली का होने के कारण उसका किसी अन्य भाषा में अनुवाद करना कठिन है। विशेषकर अंग्रेजी में उसका समानार्थी कोई शब्द नहीं है। इसका कारण यह है कि पाश्चात्य मनोविज्ञान अभी भी शैशव अवस्था में ही है। जब उनके द्वारा मनोविज्ञान का सैद्धान्तिक और प्रायोगिक निरीक्षण तथा अध्ययन पूर्ण कर लिया जायेगा? केवल तभी? वे प्रत्येक व्यक्ति के अन्तकरण में उदित होने वाले विचारों पर इन गुणों के पड़ने वाले प्रभाव को समझ पायेंगे।आध्यात्मिक साहित्य में सत्त्व? रज और तम? इन तीन गुणों को क्रमश श्वेत? रक्त और कृष्ण वर्ण के द्वारा सूचित किया जाता है।संस्कृत में गुण शब्द का अर्थ रज्जु अर्थात् रस्सी भी होता है। तात्पर्य यह हुआ कि प्रकृति के ये तीन गुण रज्जु के समान हैं? जो सच्चित्स्वरूप आत्मतत्त्व को असत् और जड़ अनात्मतत्त्व के साथ बांध देते हैं। सारांशत? ये गुण वे तीन विभिन्न प्रकार के भाव हैं जिनके वशीभूत् होकर हमारा मन? निरन्तर परिवर्तनशील परिस्थितियों में विविध प्रकार से अपनी प्रतिक्रियारूपी क्रीड़ा करता रहता है।ये गुण प्रकृति से उत्पन्न हुये हैं। वे आत्मा को देह के साथ मानो बांध देते हैं? जिसके कारण वह जीव भाव को प्राप्त होकर जन्म और मरण के अविरल चक्र और संसार के दुखों में फँस जाता है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है? प्रकृति के ये गुण द्रव्याश्रित धर्म नहीं हैं। हम केवल इतना ही कह सकते हैं कि ये विभिन्न प्रकार के भाव हैं? जिनके कारण भिन्नभिन्न व्यक्तियों का व्यवहार भिन्नभिन्न प्रकार का होता है।आत्मा और अनात्मा का यह संबंध मिथ्या है? वास्तविक नहीं। देशकालादि के परिच्छेदों से मुक्त आत्मा को इन परिच्छेदों से युक्त? स्वप्न के समान प्रक्षेपित? जड़ उपाधियों के साथ कभी नहीं बांधा जा सकता। वह इनके दोषों से सदा असंस्पृष्ट ही रहता है? जैसे?  स्तंभ अपने में अध्यस्त प्रेत से और जाग्रत् पुरुष स्वप्न द्रष्टा के अपराधों से वस्तुत अलिप्त ही रहता है। इसी प्रकार? जब तक त्रिगुण जनित बन्धन बना रहता है? तब तक ऐसा प्रतीत होता है? मानो आत्मा इन अनात्म उपाधियों के संसर्गवशात् जीव भाव को प्राप्त हुआ है? परन्तु यथार्थत वह नित्यमुक्त ही रहता है।उपर्युक्त विवेचन से अब यह स्पष्ट हो जाता है कि किस प्रकार इन गुणों के स्वरूप तथा उनसे उत्पन्न बन्धन की प्रक्रिया का स्पष्ट ज्ञान हमें मुक्ति का अधिकार पत्र प्रदान कर सकता है।अब? भगवान् श्रीकृष्ण सर्वप्रथम सत्त्वगुण का लक्षण बताते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Purity, passion and inertia  these alities, O Arjuna, born of Nature, bind fast in the body, the embodied, the indestructible.

Transliteration

sattvaṃ rajastama iti guṇāḥ prakṛtisambhavāḥ
nibadhnanti mahābāho dehe dehinamavyayam

अनुवाद

हे महाबाहो! सत्त्व, रज और तम — प्रकृति से उत्पन्न ये तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि प्रकृति से उत्पन्न होने वाले तीन गुण (सत्त्व, रज और तम) किस प्रकार अविनाशी जीवात्मा को भौतिक शरीर के साथ बाँधते हैं। यद्यपि आत्मा स्वयं दिव्य और निर्गुण है, फिर भी शरीर में स्थित होने पर वह इन गुणों के प्रभाव में आ जाती है। यह बंधन ही संसार में जीव के जन्म और मरण का कारण बनता है।

Translation

O mighty-armed one! Sattva, rajas, and tamas — these three qualities born of material nature bind the imperishable soul within the body

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains to Arjuna how the three modes of material nature (sattva, rajas, and tamas) bind the imperishable soul to the physical body. Although the soul is inherently divine and transcendental, it becomes conditioned by these qualities when it resides in the body. This conditioning is what keeps the living entity bound to the cycle of birth and death.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
सत्त्वम्सत्त्व गुण
रजःरज गुण
तमःतम गुण
इतिइस प्रकार (ये)
गुणाःतीनों गुण
प्रकृतिभौतिक प्रकृति से
संभवाःउत्पन्न होने वाले
निबध्नन्तिबाँधते हैं
महाबाहोहे विशाल भुजाओं वाले (अर्जुन)
देहेशरीर में
देहिनम्शरीरधारी (जीवात्मा) को
अव्ययम्अविनाशी

Word by word

WordMeaning
sattvamthe mode of goodness
rajaḥthe mode of passion
tamaḥthe mode of ignorance
itithus (these)
guṇāḥqualities
prakṛtifrom material nature
sambhavāḥborn
nibadhnantibind
mahābāhoO mighty-armed one
dehein the body
dehinamthe embodied soul
avyayamthe imperishable