श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 14 · गुणत्रयविभागयोग

Bhagavad Gita 14.4

मूल श्लोक :

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे कुन्तीनन्दन सम्पूर्ण योनियोंमें प्राणियोंके जितने शरीर पैदा होते हैं? उन सबकी मूल प्रकृति तो माता है और मैं बीजस्थापन करनेवाला पिता हूँ।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

सृष्टि की ओर एक दृष्टिक्षेप करने से ही यह ज्ञान होता है कि यहाँ प्राणियों की निरन्तर उत्पत्ति हो रही है। मृत प्राणियों का स्थान असंख्य नवजात जीव लेते रहते हैं। मनुष्य? पशु? मृग? वनस्पति इन सभी योनियों में यही प्रक्रिया निरन्तर चल रही है। ये सभी प्राणी जड़ और चेतन के संयोग से ही बने हैं। इनमें विषमता या भेद जड़ उपाधियों के कारण है? जबकि सभी में चेतन तत्त्व एक ही है। यह जड़ प्रकृति ही महद्ब्रह्म शब्द से इंगित की गई है।भगवान् श्रीकृष्ण अपने सच्चिदानन्दस्वरूप के साथ तादात्म्य करके कहते हैं? इस प्रकृति रूप योनि में बीज की स्थापना करने वाला पिता मैं हूँ। उनका यह कथन लाक्षणिक है। जैसा कि पूर्व श्लोक की व्याख्या में हम देख चुके है? प्रकृति में परमात्मा का चैतन्यरूप में व्यक्त होना ही उनके द्वारा बीज स्थापित करना है? जिसके फलस्वरूप वह जड़ प्रकृति चेतन होकर कार्यक्षम होती है जैसे वाष्पशक्ति से युक्त होने पर ही इन्जिन में गति आती है? अन्यथा वह एक आकार विशेष में लोहमात्र होता है  यही स्थिति चैतन्य के बिना शरीर? मन और बुद्धि उपाधियों की भी होती है। एक अविवाहित पुरुष में प्रजनन की क्षमता होने मात्र से ही वह किसी का पिता नहीं कहलाया जा सकता। इसके लिये विवाहोपरान्त उसे गर्भ में अपना बीज स्थापित करना होता है। इसी प्रकार? प्रकृति के बिना केवल पुरुष स्वयं को व्यक्त नहीं कर सकता। इसी सिद्धान्त को भगवान् यहाँ सारांश में बताते हैं कि वे सम्पूर्ण विश्व के सनातन पिता हैं? जो विश्व मञ्च पर जीवननाटक के मंचन की व्यवस्था करते हैं।यद्यपि अन्य धर्म के अनुयायियों के द्वारा हमें यह विश्वास दिलाने का प्रयत्न किया जाता है कि ईश्वर का जगत्पितृत्व केवल ईसाई धर्म ने ही सर्वप्रथम पहचाना और मान्य किया? तथापि वस्तुस्थिति इस धारणा का खण्डन ही करती है? क्योंकि ईसा मसीह से हजारों वर्ष पूर्व गीता का उपदेश अर्जुन को दिया गया था। अधिकसेअधिक हम इतना ही कह सकते हैं कि इस विचार को ईसा मसीह ने अपने से पूर्व विद्यमान धर्मों से ही लिया होगा। हिन्दुओं ने ईश्वर के जगत्पितृत्व पर अधिक बल नहीं दिया। यद्यपि यह कल्पना काव्यात्मक है? तथापि सैद्धान्तिक दृष्टि से अधिक युक्तिसंगत नहीं कही जा सकती। परन्तु? सामान्य जनता को यह कल्पना सरलता से बोधगम्य होने के कारण पश्चात् के धर्म संस्थापकों ने इसे पूर्वकालीन धर्मों से उदारतापूर्वक स्वीकार कर लिया।इस अध्याय के मुख्य विषय का प्रारम्भ करते हुये भगवान् श्रीकृष्ण बताते हैं कि प्रकृति के वे गुण कौन से हैं और वे किस प्रकार आत्मा को अनात्मा के साथ बांध देते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Whatever forms are produced, O Arjuna, in any womb whatsoever, the great Brahma is their womb and I am the seed-giving father.

Transliteration

sarvayoniṣu kaunteya mūrtayaḥ sambhavanti yāḥ
tāsāṃ brahma mahadyonirahaṃ bījapradaḥ pitā

अनुवाद

हे कुन्तीपुत्र! सब योनियों में जो भी मूर्तियाँ (शरीर) उत्पन्न होती हैं, उन सब की गर्भधारिणी माता महत्-ब्रह्म (मूल प्रकृति) है और मैं बीज स्थापित करने वाला पिता हूँ

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि संसार की सभी योनियों में उत्पन्न होने वाले सभी जीवों की माता भौतिक प्रकृति (महत्-ब्रह्म) है। भगवान स्वयं उस प्रकृति रूपी गर्भ में चेतना का बीज स्थापित करने वाले परम पिता हैं। इस प्रकार, प्रकृति और पुरुष के संयोग से ही समस्त सृष्टि का सृजन होता है।

Translation

O son of Kunti, whatever forms are produced in all the wombs, their great womb is the material nature, and I am the seed-giving father

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains to Arjuna that material nature (mahat-brahma) acts as the womb or mother for all living entities born in various species. The Lord Himself is the supreme seed-giving father who injects the consciousness (the individual souls) into this material nature. Thus, the union of material nature and the spiritual seed results in the manifestation of all living beings.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
सर्व-योनिषुसभी योनियों में
कौन्तेयहे कुन्तीपुत्र (अर्जुन)
मूर्तयःशरीर / आकृतियाँ
सम्भवन्तिउत्पन्न होती हैं
याःजो भी
तासाम्उन सब की
ब्रह्म महत्महत्-ब्रह्म (महान प्रकृति)
योनिःगर्भ (माता)
अहम्मैं
बीज-प्रदःबीज देने वाला
पितापिता हूँ

Word by word

WordMeaning
sarva-yoniṣuin all wombs
kaunteyaO son of Kunti
mūrtayaḥforms / bodily manifestations
sambhavantiare born / produced
yāḥwhich
tāsāmof them
brahma mahatthe great material nature
yoniḥthe womb
ahamI
bīja-pradaḥthe seed-giving
pitāfather