श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 14 · गुणत्रयविभागयोग

Bhagavad Gita 14.26

मूल श्लोक :

मां च योऽव्यभिचारेण भक्ितयोगेन सेवते
स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा मेरा सेवन करता है? वह इन गुणोंका अतिक्रमण करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

धर्म का व्यावहारिक शास्त्रीय ग्रंथ होने के कारण गीता में केवल सिद्धान्तों का प्रतिपादन नहीं किया गया है। इसमें प्रत्येक सिद्धान्त के विवेचन के पश्चात् उस साधन का वर्णन किया गया है? जिसके अभ्यास से एक साधक सिद्धावस्था को प्राप्त हो सकता है।जो अव्यभिचारी भक्तियोग से मेरी सेवा करता है  ईश्वर से परम प्रीति भक्ति कहलाती है। प्रिय वस्तु में हमारा मन सहजता से रमता है। हमारा सम्पूर्ण स्वभाव हमारे विचारों से पोषित होता है। यथा विचार तथा मन? यह नियम है। इसलिये एकाग्र चित्त से आत्मा के अनन्तस्वरूप का चिन्तन करने से परिच्छिन्न नश्वर अहंकार की समाप्ति और स्वस्वरूप में स्थिति हो जाती है।यह सत्य है कि परमात्मा का अखण्ड चिन्तन एक समान निष्ठा एवं प्रखरता के साथ संभव नहीं होता है। जिस स्थिति में आज हम अपने को पाते हैं? उसमें यह सार्मथ्य नहीं है कि मन को दीर्घकाल तक ध्यानाभ्यास में स्थिर कर सकें। साधकों की इस अक्षमता को जानते हुये भगवान् एक उपाय बताते हैं? जिसके द्वारा हम दीर्घकाल तक ईश्वर का स्मरण बनाये रख सकते हैं। और वह उपाय है  सेवा। तृतीय अध्याय में यह वर्णन किया जा चुका है कि ईश्वरार्पण की भावना से किए गए सेवा कर्म ईश्वर की पूजा (यज्ञ) बन जाते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि केवल मूर्तिपूजा? या भजन ही पर्याप्त नहीं है। गीताचार्य की अपने भक्तों से यह अपेक्षा है कि वे अपने धर्म को केव्ाल पूजा के कमरे या मन्दिरों में ही सीमित न रखें। उन्हें चाहिये कि वे अपने दैनिक जीवन? कार्य क्षेत्र और लोगों के साथ व्यवहार में भी धर्म का अनुसरण करें।अखण्ड ईश्वर स्मरण तथा सेवासाधना मन के विक्षेपों को दूर करके उसे ध्यान की सूक्ष्मतर साधना के योग्य बना देती है। तमस और रजस की मात्रा घटती जाती है और उसी अनुपात में सत्त्वगुण प्रवृद्ध होता जाता है। ऐसा सत्त्वगुण प्रधान साधक ध्यान की साधना के योग्य बन जाता है। ऐसे साधक से आत्मानुभूति दूर नहीं रहती।उत्तम अधिकारी ब्रह्मस्वरूप का अनुभव कर स्वयं ब्रह्म बन जाता है। जैसे स्वप्नद्रष्टा जागने पर स्वयं ही जाग्रत पुरुष बनता है।यह साधक स्वयं ब्रह्म कैसे बनता बनता है  सुनो

English Translation By Swami Sivananda

And he who serves Me with unswerving devotion, he, crossing beyond the alities, is fit for becoming Brahman.

Transliteration

māṃ ca yo'vyabhicāreṇa bhaktiyogena sevate
sa guṇānsamatītyaitān brahmabhūyāya kalpate

अनुवाद

और जो पुरुष अव्यभिचारी (अनन्य) भक्तियोग के द्वारा मुझको भजता है, वह इन तीनों गुणों को भली-भांति पार करके ब्रह्मभाव (सच्चिदानन्दघन ब्रह्म की प्राप्ति) के लिए योग्य बन जाता है।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण गुणातीत होने का व्यावहारिक उपाय बता रहे हैं। वे कहते हैं कि जो साधक बिना किसी विचलन के, अनन्य भक्ति भाव से केवल परमेश्वर की शरण में रहता है, वह प्रकृति के तीनों गुणों (सत्त्व, रज और तम) के बंधनों को आसानी से पार कर जाता है। ऐसा स्थिर बुद्धि वाला भक्त अंततः ब्रह्म-साक्षात्कार या मोक्ष का अधिकारी बनता है।

Translation

And he who serves Me with unswerving devotion, transcending these three modes of material nature, becomes fit for attaining the state of Brahman.

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains the practical method to transcend the three gunas. He states that one who worships and serves Him with unswerving, exclusive devotion easily overcomes the binding influence of sattva, rajas, and tamas. Such a devotee rises above material nature and qualifies for the realization of the Supreme Brahman.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
माम्मुझको
चऔर
यःजो
अव्यभिचारेणअव्यभिचारी (बिना किसी विचलन के/अनन्य)
भक्ति-योगेनभक्तियोग के द्वारा
sevateभजता है (सेवा करता है)
सःवह
गुणान्गुणों को
समतित्यभली-भांति पार करके
एतान्इन (तीनों)
ब्रह्म-भूयायब्रह्मभाव के लिए
कल्पतेयोग्य बन जाता है

Word by word

WordMeaning
māmMe
caand
yaḥwho
avyabhicāreṇawith unswerving (constant)
bhakti-yogenaby the yoga of devotion
sevateserves
saḥhe
guṇānmodes of nature
samatītyatranscending
etānthese
brahma-bhūyāyafor the state of Brahman
kalpatebecomes fit