Chapter 14 · गुणत्रयविभागयोग
Bhagavad Gita 14.25
मूल श्लोक :
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यतेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जो धीर मनुष्य सुखदुःखमें सम तथा अपने स्वरूपमें स्थित रहता है जो मिट्टीके ढेले? पत्थर और सोनेमें सम रहता है जो प्रियअप्रियमें तथा अपनी निन्दास्तुतिमें सम रहता है जो मानअपमानमें तथा मित्रशत्रुके पक्षमें सम रहता है जो सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भका त्यागी है? वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
पूर्वोक्त श्लोकों में चित्रित किये गये त्रिगुणातीत पुरुष के सामान्य चित्र को यहाँ और अधिक स्पष्ट किया गया है? जिससे हम उसका समीप से सूक्ष्म अवलोकन कर सकें।मान और अपमान में सम रहना ज्ञानी पुरुष का लक्षण है। अपने दिव्य स्वरूप में दृढ़ निष्ठा प्राप्त किया हुआ पुरुष जीवन से भयभीत नहीं होता? क्योंकि जगत् की ओर देखने का उसका दृष्टिकोण अज्ञानियों से सर्वथा भिन्न होता है। जीवन का अहंकार केन्द्रित मूल्यांकन हमें मान और अपमान को क्रमश उपादेय (स्वीकार्य) और हेय (त्याज्य) मानने को बाध्य करता है।लौकिक जीवन में भी हम देखते हैं कि देश के लिये प्राणोत्सर्ग करने वाले पुरुष ऐसी स्थिति की कामना करते हैं जिसे अन्य लोग अपमान जनक समझते हैं। परन्तु समाज के मान और अपमान की ओर ध्यान दिये बिना ऐसे लोग पूर्ण उत्साह के साथ अपनी पीढ़ी से प्रेम और उसकी सेवा करते हैं। आपेक्षिक सिद्धान्त की खोज के दिन आर्कमिडीज को विवस्त्र स्थिति में सड़क पर यूरेका? यूरेका चिल्लाते हुये दौड़ने में अपमान का अनुभव नहीं हुआ? परन्तु किसी और दिन यह बात नहीं होती मान और अपमान बुद्धि के निर्णय हैं? जो स्थानस्थान पर और समयसमय पर बदलते रहते हैं। जो पुरुष अहंकार के स्तर से ऊंचा उठ गया है? उसे दोनों ही समान हैं? कांटो के मुकुट का उतना ही स्वागत है? जितना गुलाब के फूलों के मुकुट काशत्रु और मित्र के पक्षों में सम जैसे हम अपने शरीर के किसी अंग को शत्रु और किसी अंग को मित्र नहीं मानते? वैसे ही आत्मैकत्व ज्ञान प्राप्त पुरुष भी किसी से मित्रता या शत्रुता नहीं रखता। तथापि अन्य लोग उससे अवश्य ही मित्र या शत्रु भाव रख सकते हैं? किन्तु वह दोनों के प्रति समान भाव से रहता है। आत्मानुभव की दृष्टि से ज्ञानी पुरुष जानता है वे सब मैं ही हूँ।सर्वारम्भ परित्यागी आरंभ का अर्थ है कर्म। इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि त्रिगुणातीत पुरुष क्रियाशून्य हो जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि उसे अपने कर्मों में न कर्तृत्व का अभिमान होता है और न स्वार्थ का। आरम्भ शब्द में वे सब कर्म समाविष्ट हैं? जो अनेक वस्तुओं के अर्जन और संग्रह करने तथा उनपर अपना स्वामित्य स्थापित करने के लिये अहंकार और स्वार्थ से प्रेरित होते हैं। अज्ञानी जीव के लिये ये कर्म स्वाभाविर्क हैं। अहंकार रहित आत्मज्ञानी पुरुष ईश्वर से अनुप्राणित होकर ईश्वरीय पुरुष के रूप में इस जगत् में कल्याणार्थ कार्य करता है।उपर्युक्त लक्षणों से पुरुष गुणातीत कहा जाता है। इन श्लोकों में अर्जुन के द्वितीय प्रश्न का उत्तर दिया गया है।श्री शंकराचार्य अपने भाष्य में लिखते हैं कि मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक साधक को इन गुणों को साधन के रूप में अपनाना चाहिये। एक बार ज्ञान में निष्ठा प्राप्त कर लेने पर ये गुण उसके स्वाभाविक लक्षण बन जायेंगे? जो स्वसंवेद्य होते हैं। गुणातीत पुरुष के ये मुख्य लक्षण हैं।अर्जुन का तीसरा प्रश्न यह था? किस प्रकार वह तीनों गुणों से अतीत होता है इसका उत्तर देते हुये भगवान् कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Who is the same in honour and dishonour, the same to friend and foe, abandoning all undertakings he is said to have transcended the alities.
Transliteration
mānāpamānayos tulyas tulyo mitrāripakṣayoḥ
sarvārambhaparityāgī guṇātītaḥ sa ucyateअनुवाद
जो मान और अपमान में समान है, जो मित्र और शत्रु के पक्षों में समान है, तथा जिसने सभी कर्मों के आरम्भ का परित्याग कर दिया है, वह गुणातीत (गुणों से परे) कहा जाता है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण गुणातीत व्यक्ति के सामाजिक और व्यावहारिक लक्षणों का वर्णन करते हैं। ऐसा व्यक्ति आदर और अनादर में विचलित नहीं होता और न ही वह मित्र या शत्रु के प्रति पक्षपात करता है। वह कर्तापन के अहंकार से मुक्त होकर नए सकाम कर्मों का आरम्भ नहीं करता, इसलिए उसे त्रिगुणातीत कहा जाता है।
Translation
He who is equal in honor and dishonor, equal toward the sides of friend and foe, and who has renounced all undertakings—he is said to have transcended the gunas.
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes the social and practical characteristics of one who has transcended the three gunas. Such a person remains undisturbed by honor or dishonor and maintains equanimity toward friends and foes alike. Having abandoned the ego of doership, they do not initiate new selfish undertakings, and are thus called transcendental.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| मान-अपमानयोः | मान और अपमान में |
| तुल्यः | समान |
| तुल्यः | समान |
| मित्र-अरि-पक्षयोः | मित्र और शत्रु के पक्षों में |
| सर्व-आरम्भ-परित्यागी | सभी (सकाम) आरम्भों का परित्याग करने वाला |
| गुण-अतीतः | गुणों से अतीत (परे) |
| सः | वह |
| उच्यते | कहा जाता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| māna-apamānayoḥ | in honor and dishonor |
| tulyaḥ | equal |
| tulyaḥ | equal |
| mitra-ari-pakṣayoḥ | to the parties of friend and foe |
| sarva-ārambha-parityāgī | renouncer of all undertakings |
| guṇa-atītaḥ | transcended the gunas |
| saḥ | he |
| ucyate | is said |