श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 14 · गुणत्रयविभागयोग

Bhagavad Gita 14.24

मूल श्लोक :

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

जो धीर मनुष्य सुखदुःखमें सम तथा अपने स्वरूपमें स्थित रहता है जो मिट्टीके ढेले? पत्थर और सोनेमें सम रहता है जो प्रियअप्रियमें तथा अपनी निन्दास्तुतिमें सम रहता है जो मानअपमानमें तथा मित्रशत्रुके पक्षमें सम रहता है जो सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भका त्यागी है? वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

जीवन की निरन्तर परिवर्तनशील परिस्थितियों में ज्ञानी पुरुष के मन के समत्व और सन्तुलन का वर्णन इस श्लोक में किया गया है। त्रिगुणों की क्रूरताओं से परे आत्मा में ज्ञानी पुरुष स्थित रहता है? जहाँ सत्त्वगुण का रोमांचक सुख नहीं है? न रजोगुण का कोलाहल है और न ही तमोगुण की थकान है। वह सच्चिदानन्द स्वरूप है।सामान्य मनुष्य को समता की यह स्थिति पूर्ण मृत्यु ही प्रतीत होगी। और? निसन्देह? यह वास्तविकता भी है यह परिच्छिन्न अहंकार की मृत्यु है? जो सांसारिक अनुभवों का भोक्ता है। उपाधियुक्त आत्मा ही जीवरूप में प्रतीत होता है? जो सदैव विक्षुब्ध मन की प्रचण्ड चंचल वृत्तियों पर समुद्री सतह पर बहते हुये काष्ठ खण्ड के समान व्यवहार करता है। प्रेम और घृणा? राग और द्वेष के तूफानों से सदैव विचलित हुआ यह दुखी जीव असंख्य विक्षेपों और दुखों को भोगता रहता है।इसलिये? तृष्णा और आसक्ति के इस दुर्व्यवस्थित क्षेत्र से स्वयं को विलग कर स्वस्वरूप में ही स्थित होना ही मुक्ति है। ज्ञानी पुरुष का जगत् के साथ क्या सम्बन्ध होता है  यह प्रश्न ऐसा ही है? जैसे  जाग्रत पुरष का अपने स्वप्नजगत् से क्या सम्बन्ध होता है  त्रिगुणों के बन्धनों से मुक्त पुरुष जगत् की अनात्म वस्तुओं के साथ के अविद्याजनित अहं और मम भाव को सर्वथा त्याग देता है। उस वास्तविक दैवी जाग्रति की अवस्था में निम्न स्तर के अनुभव? इस जगत् के सुख और दुख? प्रिय और अप्रिय तथा निन्दा और स्तुति का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता है। समस्त अनुभवों में वह सम? असंग साक्षी बनकर रहता है।स्वस्थ  अपने सर्व उपाधिविवर्जित सच्चिदानन्द स्वरूप में स्थित पुरुष स्वस्थ कहलाता है। अत उपाधियों के द्वारा अनुभूत जगत् से वह अछूता रहता है।समदुखसुख  इन्द्रियों के द्वारा बाह्य जगत् के सम्पर्क में आकर पूर्वकाल में अर्जित किये हुये समान अनुभवों की तुलना में उसका मूल्यांकन करना और तत्पश्चात् उसे सुख या दुख के रूप में अनुभव करना? यह हमारे व्यष्टि मन की युक्ति है। यदि बाह्य जगत् की वस्तुओं में ही सुख या दुख होता? तो सभी व्यक्तियों का अनुभव एक समान होता जैसे सूर्य के प्रकाश का सबका अनुभव एक समान है? क्योंकि प्रकाश सूर्य का धर्म है। परन्तु विषयों के सम्बन्ध में यह बात नहीं देखी जाती। कोई विषय किसी एक व्यक्ति को सुखदायक प्रतीत होता है तो अन्य व्यक्ति को दुखदायक। इससे सिद्ध होता है कि हमारे सुखदुख अपने मन की कल्पना मात्र हैं? वस्तुस्थिति न्ाहीं। ज्ञानी पुरुष मन और बुद्धि के उपनेत्रों से जगत् को नहीं देखता और? इसलिये? संसारी पुरुषो द्वारा कहे जाने वाले सुख और दुख में वह समान रहता है।समलोष्टाश्मकाञ्चन  वह लोष्ट (मिट्टी)? अश्म (पाषाण) और काञ्चन (स्वर्ण) इन सबको समदृष्टि से देखता है। वस्तुओं का परिग्रह करने में संसारी लोगों की अत्यधिक रुचि होती है। लोग स्वर्ण? हीरे? मोती आदि बहुमूल्य वस्तुओं को एकत्र करना चाहते हैं? किन्तु सामान्य मिट्टी? पाषाण आदि की उपेक्षा करते हैं। परन्तु जिसे परमार्थ वस्तु की उपलब्धि हो गई है? वह ज्ञानी पुरुष मिट्टी? पाषाण? स्वर्ण इन सबको एक समान ही देखता है ? क्योंकि पारमार्थिक सत्य की दृष्टि से ये सब मिथ्या वस्तुएं ही हैं। वस्तुत? उनमें कोई भी मूल्यवान नहीं है।बाल्यावस्था में? छोटे बालक मयूरपंख? शुक्तिका? संगमर्मर के टुकड़े? टूटी चूड़ियां? पुरानी टिकटें आदि वस्तुओं का संग्रह करते हैं और उनके लिये वह एक बहुमूल्य कोष के समान होता है। परन्तु युवावस्था के प्राप्त होने पर उस कोष का कोई महत्त्व नहीं रह जाता। वे उसे अपने छोटे भाई को दे देते हैं तो वह उस धरोहर को पाकर अत्यन्त प्रसन्न हो जाता है। इसी प्रकार? जीवभाव में स्थित अज्ञानी पुरुष असंख्य वस्तुओं का संग्रह करना चाहता है? जो ज्ञानी की दृष्टि में बच्चों का एक खेल मात्र है।तुल्यप्रियाप्रिय  यदि हम अनेक व्यक्तियों के साथ के अपने सम्बन्धों पर विचार करें? तो यह ज्ञात होगा कि हमें अपने समस्वभाव का व्यक्ति प्रिय प्रतीत होगा और प्रतिकूल स्वभाव का व्यक्ति अप्रिय। यही बात वस्तुओं और परिस्थितियों के सम्बन्ध में भी सत्य है। यह प्रिय और अप्रिय का अनुभव मन के स्तर पर रहने वाले लोगों के लिये ही है? मन से परे आत्मस्वरूप में स्थित हुये ज्ञानी पुरुष के लिये नहीं। जगत् में सामान्य दृष्टि से किन्हीं वस्तुओं और घटनाओं को प्रिय या अप्रिय समझा जाता है। ज्ञानी पुरुष के लिये वे सब तुल्य हैं? क्योंकि वह समान्य जनों के मापदण्ड से जगत् की ओर नहीं देखता है।तुल्यनिन्दात्मसंस्तुति  स्वप्नावस्था में स्वप्नद्रष्टा पुरुष की कोई निन्दा करते हैं और कोई प्रशंसा। जब वह स्वप्न से जाग जाता है तो क्या वह उस निन्दा और स्तुति को तुल्य नहीं समझेगा  संसारी लोग अपनीअपनी बुद्धि और ज्ञान के अनुसार कभी किसी की निन्दा करते हैं? तो कभी स्तुति। सर्वोच्च आत्मज्ञान में निष्ठा प्राप्त पुरुष के लिये दोनों का ही कोई महत्त्व नहीं होता।उपर्युक्त अनुभवों के चार सुन्दर उदाहरणों के द्वारा व्यासजी ने जीवन के कुछ प्रमुख अनुभव दर्शाये हैं? जिनमें सामान्य मनुष्य सुख और दुख का अनुभव करता है।आगे कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Who is the same in pleasure and pain, who dwells in the Self, to whom a clod of earth, stone and gold are alike, who is the same to the dear and the unfriendly, who is firm, and to whom censure and praise are as one.

Transliteration

samaduḥkhasukhaḥ svasthaḥ samaloṣṭāśmakāñcanaḥ
tulyapriyāpriyo dhīrastulyanindātmasaṃstutiḥ

अनुवाद

जो दुःख और सुख में समान रहने वाला है, अपने स्वरूप में स्थित है, मिट्टी के ढेले, पत्थर और सुवर्ण को समान समझने वाला है, प्रिय और अप्रिय को एक जैसा मानने वाला है, धैर्यवान है और अपनी निंदा तथा स्तुति में समान भाव रखने वाला है

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण गुणातीत (तीनों गुणों से परे गए) पुरुष के लक्षणों का वर्णन कर रहे हैं। ऐसा व्यक्ति सुख और दुःख के द्वंद्वों से विचलित नहीं होता क्योंकि वह अपने आत्म-स्वरूप में स्थित रहता है। उसके लिए भौतिक वस्तुओं का मूल्य (जैसे मिट्टी, पत्थर या सोना) एक समान होता है, और वह प्रशंसा या आलोचना से प्रभावित नहीं होता है।

Translation

He who is alike in pleasure and pain, who is established in his own self, to whom a clod of earth, a stone, and gold are equal, to whom the pleasant and the unpleasant are the same, who is wise, and who remains equal in censure and praise

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes the characteristics of a person who has transcended the three modes of material nature (guṇātīta). Such a self-realized soul remains undisturbed by the dualities of pleasure and pain because he is firmly established in his true self. He views material objects like clay, stone, and gold with an equal eye, and remains unaffected by praise or criticism.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
सम-दुःख-सुखःदुःख और सुख में समान रहने वाला
स्वस्थःअपने स्वरूप में स्थित
सम-लोष्ट-अश्म-काञ्चनःमिट्टी के ढेले, पत्थर और सुवर्ण को समान समझने वाला
तुल्य-प्रिय-अप्रियःप्रिय और अप्रिय को एक जैसा मानने वाला
धीरःधैर्यवान (बुद्धिमान)
तुल्य-निन्दा-आत्म-संस्तुतिःअपनी निंदा और स्तुति में समान भाव रखने वाला

Word by word

WordMeaning
sama-duḥkha-sukhaḥequal in pain and pleasure
svasthaḥestablished in the self
sama-loṣṭa-aśma-kāñcanaḥregarding a clod of earth, a stone, and gold as equal
tulya-priya-apriyaḥalike to the pleasant and the unpleasant
dhīraḥwise (steady)
tulya-nindā-ātma-saṃstutiḥequal in censure and praise of oneself