Chapter 14 · गुणत्रयविभागयोग
Bhagavad Gita 14.23
मूल श्लोक :
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गतेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जो उदासीनकी तरह स्थित है और जो गुणोंके द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता तथा गुण ही (गुणोंमें) बरत रहे हैं -- इस भावसे जो अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता है और स्वयं कोई भी चेष्टा नहीं करता।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
भगवान् श्रीकृष्ण तीन श्लोकों में जगत् की वस्तुओं और व्यक्तियों के साथ ज्ञानी पुरुष जो सम्बन्ध रखता है? उसका विस्तृत वर्णन करते हैं। मनुष्य की संस्कृति एक मिथ्या मुखौटा हो सकती है। जब तक पर्याप्त रूप से प्रलोभित करने वाली परिस्थितियां हमारे समक्ष उपस्थित नहीं होती? तब तक हममें से बहुत से लोग ईश्वर के समान व्यवहार कर सकते हैं। मनुष्य के हाथ में जब तक सत्ता नहीं आती? तब तक हो सकता है कि वह क्रूर न हो वह जब तक दरिद्री है? तब तक शान्त जीवन व्यतीत करता हो और प्रलोभनों के अभाव में वह भ्रष्टाचार से ऊपर हो। इस प्रकार? अनेक ऐसे सद्गुण जिनसे अनेक व्यक्तियों को हम सम्पन्न समझते हैं? वे सब केवल कृत्रिम सौन्दर्य के ही होते हैं। उनका वास्तविक हीन स्वरूप उस मुखौटे से छिपा रहता है।सम्भावित दुष्ट पुरुष ऋण लिये सद्गुणों के कृत्रिम परिधानों को धारण करके जगत् में विचरण करते रहते हैं। इसलिए? ज्ञानी पुरुष की वास्तविक परीक्षा या पहचान जंगलों या गिरिकन्दराओं में नहीं? वरन् बीच बाजार में हो सकती है? जहाँ वह जगत् की दुष्टताओं से पीड़ित किया जाता है। ईसा मसीह इतने महान् कभी नहीं थे जितने वे सूली पर चढ़ाये जाने के समय हुए जगत् के द्वारा कुचले जाने पर ही हमारा वास्तविक स्वभाव प्रगट होता है। घर्षण से ही चन्दन की सुगन्ध प्रगट होती है। जिन उँगलियों से हम तुलसी दल को पीसते हैं वह उन्हीं पर अपना सुगन्ध छोड़ जाता है।ज्ञानी पुरुष उदासीन के समान आसीन हुआ गुणों के द्वारा विचलित नहीं होता है। जगत् के सभी शुभ? अशुभ और उपेक्ष्य अनुभवों में वह उदासीन के समान रहता है? क्योंकि वह जानता है कि यह सब मन का खेल मात्र है। चित्रपट ग्रह में दर्शाये जा रहे चलचित्र के सुखान्त अथवा दुखान्त से हम विचलित नहीं होते? क्योंकि हम जानते हैं कि यह छायाचित्र का खेल हमारे मनोरंजन के लिये प्रस्तुत किया जा रहा है। इसका अर्थ यह नहीं समझना चाहिये कि ज्ञानी पुरुष जगत् की घटनाओं से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध ही नहीं रखता है। व्यासजी अत्यन्त सावधानीपूर्वक शब्दों को चुनते हैं। वे कहते हैं कि ज्ञानी पुरुष ऐसा प्रतीत होता है? मानो वह उदासीन्ा हो उदासीनवत् आसीन। इसका अभिप्राय यह हुआ कि वह अपने जीवन में तथा बाह्य जगत् में होने वाली घटनाओं से विक्षुब्ध या उत्तेजित नहीं हो जाता।वह भलीभाँति जानता है कि उसके अन्तकरण में होने वाले ये निरन्तर परिवर्तन केवल गुणों के ही हैं और फिर बाह्य जगत् का अनुभव भी मनस्थिति के अनुसार परिवर्तन होता रहता है। सम्यक्दर्शी पुरुष अपने आन्तरिक तथा बाह्य जगत् में होने वाले परिवर्तनों की प्रक्रिया को जानकर उनसे अविचलित रहता है।इन गुणों की क्रीड़ा देखने के लिये स्वयं साक्षी बनकर रहना होता है। अपने आत्मस्वरूप में स्थित रहकर वह गुणों की अन्तर्बाह्य क्रीड़ा को देखते हुये उसका आनन्द उठाता है। गली में हो रहे लड़ाईझगड़े को ऊपर छज्जे पर से देखने वाला व्यक्ति उस लड़ाई से प्रभावित नहीं होता है। उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष भी अपनी समत्व की स्थिति से गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता है।पूर्व श्लोक को और अधिक स्पष्ट करते हुये कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
He who, seated like one unconcerned, is not moved by the alities, and who, knowing that the alities are active, is self-centred and moves not.
Transliteration
udāsīnavadāsīno guṇairyo na vicālyate
guṇā vartanta ityeva yo'vatiṣṭhati neṅgateअनुवाद
जो उदासीन के समान बैठा हुआ गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जाता है, और ‘गुण ही कार्य कर रहे हैं’ ऐसा समझकर जो स्थिर रहता है और कभी विचलित नहीं होता है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण गुणातीत (तीनों गुणों से परे गए) पुरुष के लक्षणों का वर्णन कर रहे हैं। ऐसा व्यक्ति संसार के द्वंद्वों और गुणों के विकारों से अप्रभावित रहता है। वह साक्षी भाव में स्थित रहता है, यह जानते हुए कि सभी क्रियाएं केवल प्रकृति के गुणों के परस्पर व्यवहार के कारण हो रही हैं, न कि उसकी आत्मा के द्वारा।
Translation
He who, seated like one unconcerned, is not moved by the qualities, and who, knowing that ‘it is only the qualities that act’, remains firm and does not waver.
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes the characteristics of a person who has transcended the three modes of material nature (guṇātīta). Such a person remains as a neutral observer, undisturbed by the dualities of the world. He stays firmly established in the self, understanding that all actions are merely the modes of nature interacting with one another, and not the work of the true Self.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| उदासीन-वत् | उदासीन के समान |
| आसीनः | स्थित / बैठा हुआ |
| गुणैः | गुणों के द्वारा |
| यः | जो |
| न | नहीं |
| विचाल्यते | विचलित किया जाता है |
| गुणाः | गुण ही |
| वर्तन्ते | कार्य कर रहे हैं |
| इति | इस प्रकार |
| एव | ही |
| यः | जो |
| अवतिष्ठति | दृढ़ रहता है |
| न | नहीं |
| इङ्गते | विचलित होता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| udāsīna-vat | like an unconcerned witness |
| āsīnaḥ | seated |
| guṇaiḥ | by the modes of nature |
| yaḥ | who |
| na | not |
| vicālyate | is agitated |
| guṇāḥ | the modes |
| vartante | are acting |
| iti | thus |
| eva | only |
| yaḥ | who |
| avatiṣṭhati | remains established |
| na | not |
| iṅgate | wavers |