Chapter 14 · गुणत्रयविभागयोग
Bhagavad Gita 14.21
मूल श्लोक :
अर्जुन उवाच
कैर्लिंगैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्ततेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
अर्जुन बोले -- हे प्रभो इन तीनों गुणोंसे अतीत हुआ मनुष्य किन लक्षणोंसे युक्त होता है उसके आचरण कैसे होते हैं और इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण कैसे किया जा सकता है
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
दर्शनशास्त्र के प्रारम्भिक अध्ययन के समय की अपरिहार्य कठिनाई और थकान दूर करने तथा अध्ययन को और अधिक मनोरंजन बनाने के लिये गीता की रचना संवाद शैली में की गई है। यह स्पष्ट है कि पूर्ण ज्ञानी भगवान् श्रीकृष्ण और मोहित पुरुष अर्जुन के इस संवाद में? कवि व्यास जी को तात्त्विक विवेचन के समय भी मानव स्वभाव का विस्मरण नहीं हुआ है। ज्ञानियों की किसी भी सभा में अर्जुन के प्रश्न बालसुलभ कौतूहल अथवा केवल बुद्धिचातुर्य के समान प्रतीत होंगे। तथापि जिस धैर्य के साथ भगवान् श्रीकृष्ण मध्यम बुद्धि के शिष्य के प्रश्नों का उत्तर देते हैं उससे ज्ञात होता है कि एक ब्रह्मनिष्ठ ज्ञानी पुरुष का यह कर्तव्य है कि उसको संयमी अथवा नास्तिक लोगों के द्वारा पूछे गये प्रश्नों के उत्तर भी विस्तारपूर्वक देने चाहिये।यदि ज्ञानदान की ऐसी स्वस्थ परंपरा को प्राप्त करने का सौभाग्य हमें मिला है? तथापि किसी कारण से? इसे रहस्य बनाये रखने की एक दुष्टभावना हमारी गौरवमयी संस्कृति की एक स्वस्थ परम्परा को लूटे लिये जा रही है। तत्त्वज्ञान के सिद्धान्तों को विचार मन्थन के द्वारा जब प्रकाश में नहीं लाया जाता? तब वे नष्टप्राय होने लगते हैं। प्रत्येक जिज्ञासु शिष्य को यह स्वतंत्रता है कि सर्वप्रथम तत्त्वज्ञान के सिद्धान्तों को भलीभाँति समझने के लिये प्रश्न पूछ सके। उन्हें समझने पर ही उनके महत्त्व को पहचाना जा सकता है। जब तक इस प्रकार की समझ और पहचान नहीं होती तब तक हम उन सिद्धान्तों को अपने दैनिक जीवन में नहीं जी सकते। हिन्दू दर्शन एक जीवनपद्धति है? न कि जीवन की ओर देखने का केवल एक दृष्टिकोण। इसलिए आवश्यक है कि इस ज्ञान को हम अपने जीवन में जियें।यहाँ अर्जुन ने तीन प्रश्न पूछे हैं (1) तीनों गुणों से अतीत हुये पुरुष के लक्षण क्या हैं जिनसे उसकी पहचान हो सकती है (2) उसका आचरण किस प्रकार का होगा और (3) किस प्रकार वह ज्ञानी पुरुष त्रिगुणों से अतीत होकर अपने आत्मवैभव को प्राप्त होता है इनके उत्तर में भगवान् श्रीकृष्ण सर्वप्रथम त्रिगुणातीत पुरुष के लक्षण बताते है
English Translation By Swami Sivananda
Arjuna said What are the marks of him who has transcended the three alities, O Lord? What is his conduct and how does he go beyond these three alities?
Transliteration
arjuna uvāca
kair liṅgais trīn guṇān etān atīto bhavati prabho
kimācāraḥ kathaṃ caitāṃs trīn guṇān ativartateअनुवाद
अर्जुन ने कहा — हे प्रभु! इन तीनों गुणों से अतीत हुआ पुरुष किन लक्षणों से युक्त होता है? उसका आचरण कैसा होता है और वह किस प्रकार इन तीनों गुणों से सर्वथा अतीत हो जाता है?
भावार्थ
इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण से गुणातीत पुरुष (जो तीनों गुणों से ऊपर उठ चुका है) के विषय में तीन प्रश्न पूछते हैं। पहला प्रश्न उसके लक्षणों के बारे में है, दूसरा उसके आचरण या व्यवहार के बारे में है, और तीसरा प्रश्न उस साधन या विधि के बारे में है जिसके द्वारा वह इन गुणों को पार करता है। यह प्रश्न आगे के श्लोकों में कृष्ण द्वारा दिए जाने वाले विस्तृत उपदेश की पृष्ठभूमि तैयार करता है।
Translation
Arjuna said: By what symptoms is one known who has transcended these three modes, O Lord? What is his behaviour, and how does he transcend these three modes?
Meaning
In this verse, Arjuna asks Lord Krishna three questions regarding a person who has transcended the three modes of material nature (guṇātīta). First, he asks about the characteristics or symptoms of such a person; second, about his conduct and behavior; and third, about the method by which he transcends these three modes. This inquiry sets the stage for Krishna’s detailed explanation in the subsequent verses.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अर्जुनः | अर्जुन |
| उवाच | ने कहा |
| कैः | किन |
| लिङ्गैः | लक्षणों से |
| त्रीन् | तीनों |
| गुणान् | गुणों को |
| एतान् | इन |
| अतीतः | पार किया हुआ (अतीत) |
| भवति | होता है |
| प्रभो | हे प्रभु |
| किम्-आचारः | कैसा आचरण करने वाला |
| कथम् | किस प्रकार |
| च | और |
| एतान् | इन |
| त्रीन् | तीनों |
| गुणान् | गुणों को |
| अतिवर्तते | पार कर जाता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| arjunaḥ | Arjuna |
| uvāca | said |
| kaiḥ | by what |
| liṅgaiḥ | symptoms / characteristics |
| trīn | three |
| guṇān | modes / qualities |
| etān | these |
| atītaḥ | transcended |
| bhavati | becomes |
| prabho | O Lord |
| kim-ācāraḥ | what conduct |
| katham | how |
| ca | and |
| etān | these |
| trīn | three |
| guṇān | modes |
| ativartate | transcends |