Chapter 14 · गुणत्रयविभागयोग
Bhagavad Gita 14.20
मूल श्लोक :
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुतेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
देहधारी (विवेकी मनुष्य) देहको उत्पन्न करनेवाले इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण करके जन्म? मृत्यु और वृद्धावस्थारूप दुःखोंसे रहित हुआ अमरताका अनुभव करता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
पाठशाला में कार्यकर रहे व्यक्ति को अग्नि की उष्णता और धुंए का कष्टसहना पड़ता है? तो ग्रीष्म काल की धूप में खड़े व्यक्ति को सूर्य के ताप और चमक को सहन करना पड़ता है। यदि ये दोनों व्यक्ति अपने उन स्थानों से हटकर अन्य शीतल स्थान पर चले जायें? तो उनके कष्टों की निवृत्ति हो जायेगी। इसी प्रकार? हम अपनी उपाधियों में क्रीड़ा कर रहे तीन गुणों के साथ तादात्म्य करके सांसारिक जीवन के बन्धनों और दुखों को भोग रहे हैं। इनसे अतीत हो जाने पर इनकी क्रूरता का अन्त हो जाता है? क्योंकि परिपूर्ण सच्चिदानन्द आत्मा में इन सबका कोई अस्तित्व नहीं है।यहाँ सत्त्वादि गुणों को शरीर की उत्पत्ति का कारण बताया गया है। वेदान्त की भाषा में आत्मस्वरूप के अज्ञान को कारण शरीर कहते हैं जिसका अनुभव हमें अपनी निद्रावस्था में होता है। इन तीनों गुण से भिन्न यह अज्ञान कोई वस्तु नहीं है। इस कारण अवस्था से ये त्रिगुण? सूक्ष्म शरीर अर्थात् अन्तकरण की विभिन्न वृत्तियों और भावनाओं के रूप में व्यक्त होते हैं। विचाररूप में परिणत ये गुण शुभ या अशुभ कर्मों के रूप में व्यक्त होने के लिये स्थूल शरीर का रूप ग्रहण करते हैं।प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचारों और भावनाओं को प्रगट करने के लिए एक उपयुक्त माध्यम की आवश्यकता होती है। उदाहरणार्थ? चित्रकार को एक पट? तूलिका और रंगों की? तो संगीतज्ञ को वाद्यों की आवश्यकता होती है। चित्रकार को वाद्य और संगीतज्ञ के हाथ में तूलिका देने से दोनों को कोई लाभ नहीं होगा। इसी प्रकार? पशु की वृत्तियों वाले जीव को पशु का देह धारण करना मनुष्य शरीर की अपेक्षा अधिक उपयुक्त होगा। यह सब कार्य इन तीन गुणों का ही है।इससे स्पष्ट हो जाता है कि त्रिगुणों से परे पहुँचा हुआ व्यक्ति सूक्ष्म और कारण शरीरों के दुखों से भी मुक्त हो जाता है।विकार और परिवर्तन जड़ पदार्थ के धर्म हैं। अत भौतिक तत्त्वों से बने हुये सभी स्थूल शरीर विकारों को प्राप्त होते हैं? जिनका क्रम है जन्म? वृद्धि? व्याधि? जरा (क्षय) और मृत्यु। इनमें से प्रत्येक विकार दुखदायक होता है। जन्म में पीड़ा है वृद्धि व्यथित करने वाली है? वृद्धावस्था विचलित करने वाली है? व्याधि अत्यन्त क्रूर है तो मृत्यु अत्यन्त भयंकर परन्तु ये समस्त दुख देहाभिमानी अज्ञानी जीव को ही होते हैं? आत्म स्वरूप में स्थित आत्मज्ञानी को नहीं? क्योंकि वह अपने उपाधियों से परे स्वरूप को पहचान लेता है। बाढ़? अकाल? युद्ध? महामारी? अन्त्येष्टि? विवाह एवं अन्य सहस्र घटनाओं को सूर्य प्रकाशित करता है? किन्तु सूर्य में इनमें से एक भी घटना का अस्तित्व नहीं है। इसी प्रकार आत्मचैतन्य हमारी उपाधियों को तथा तत्संबंधित अनुभवों को प्रकाशित करता है? परन्तु उसका इन सबके साथ कोई सम्बन्ध नहीं होता। अत आत्मवित् पुरुष इन सभी संघर्षों से मुक्त हो जाता है।और वह अमृतत्त्व को प्राप्त होता है आत्मज्ञान का फल केवल दुख निवृत्ति ही नहीं वरन् परमानन्द प्राप्त भी है। भगवान् के कथन में इसी तथ्य का निर्देश है। निद्रावस्था में रोगी व्यक्ति अपनी पीड़ा को भूल जाता है निराश व्यक्ति अपनी निराशाओं से मुक्त हो जाता है क्षुधा से व्याकुल पुरुष को क्षुधा का अनुभव नहीं होता और दुखी को दुख का विस्मरण हो जाता है। परन्तु? इससे यह नहीं कहा जा सकता है कि रोगोपशम हो गया? निराशा निवृत्त हो गयी? क्षुधा शांत हो गयी और दुख का शमन हो गया। निद्रा तो वर्तमान दुख के साथ होने वाली अस्थायी सन्धिमात्र है। जाग्रत अवस्था में आने पर पुन ये सब दुख भी लौटकर आ जाते हैं। परन्तु आत्मानुभूति में दुखों की आत्यन्तिक निवृत्ति और परमानन्द की प्राप्ति होती है। इसलिये यहाँ कहा गया है कि अमृतत्त्व अर्थात् मोक्ष की इस स्थिति को इसी जगत् में? इसी जीवन में और इसी देह में रहते हुये प्राप्त किया जा सकता है। इस पृथ्वी पर ईश्वरीय पुरुष बनने का अनुभव वास्तव में विरला है। ऐसे मुक्त पुरुष के लक्षण क्या हैं? जिन्हें जानकर हम उसे समझ सकें और अपने में भी उस स्थिति को पाने का प्रयत्न कर सकें वह जगत् में किस प्रकार व्यवहार करेगा तथा जगत् के साथ उस ज्ञानी का संबंध किस प्रकार का होगा प्रश्न पूछने के लिये एक अवसर पाकर अर्जुम पूछता है
English Translation By Swami Sivananda
The embodied one having crossed beyond these three Gunas out of which the body is evolved, is freed from birth, death, decay and pain, and attains to immortality.
Transliteration
guṇānetānatītya trīndehī dehasamudbhavān
janmamṛtyujarāduḥkhairvimukto'mṛtamaśnuteअनुवाद
शरीर की उत्पत्ति के कारण इन तीनों गुणों को पार करके, देहधारी जीवात्मा जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और दुखों से मुक्त होकर मोक्ष (अमृत) को प्राप्त करता है
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण गुणातीत (गुणों से परे) होने के परम लाभ का वर्णन करते हैं। जब जीवात्मा प्रकृति के तीनों गुणों (सत्त्व, रज और तम) से ऊपर उठ जाती है, तो वह शारीरिक बंधनों से मुक्त हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप, वह जन्म, मृत्यु और बुढ़ापे के चक्र से छूटकर परम आनंद और अमरता का अनुभव करती है।
Translation
Having transcended these three qualities which are the source of the physical body, the embodied soul, freed from the pains of birth, death, and old age, attains immortality
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes the ultimate benefit of transcending the three modes of material nature. When the embodied soul rises above sattva, rajas, and tamas, which are responsible for the physical manifestation, it becomes free from the cycle of birth, old age, and death. Consequently, the soul attains liberation and experiences eternal bliss.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| गुणान् | गुणों को |
| एतान् | इन |
| अतीत्य | पार करके |
| त्रीन् | तीनों |
| देही | देहधारी (जीवात्मा) |
| देह | शरीर की |
| समुद्भवान् | उत्पत्ति के कारण रूप |
| जन्म | जन्म |
| मृत्यु | मृत्यु |
| जरा | बुढ़ापा |
| दुःखैः | और दुखों से |
| विमुक्तः | मुक्त होकर |
| अमृतम् | अमृत (मोक्ष) को |
| अश्नुते | प्राप्त करता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| guṇān | modes of nature |
| etān | these |
| atītya | having transcended |
| trīn | three |
| dehī | the embodied soul |
| deha | of the body |
| samudbhavān | which are the source of origin |
| janma | birth |
| mṛtyu | death |
| jarā | old age |
| duḥkhaiḥ | and distresses |
| vimuktaḥ | being freed from |
| amṛtam | immortality |
| aśnute | attains |