Chapter 14 · गुणत्रयविभागयोग
Bhagavad Gita 14.2
मूल श्लोक :
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति चHindi Translation By Swami Ramsukhdas
इस ज्ञानका आश्रय लेकर जो मनुष्य मेरी सधर्मताको प्राप्त हो गये हैं? वे महासर्गमें भी पैदा नहीं होते और महाप्रलयमें भी व्यथित नहीं होते।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
इस अध्याय में उपदिष्ट ज्ञान की महत्ता सैद्धान्तिक दृष्टि से उतनी अधिक नहीं है? जितनी कि साधना में उसके द्वारा होने वाले लाभ से है। इस अध्याय के गम्भीर अभिप्रायों को सम्यक् रूप से जानने वाला साधक पूर्णत्व की स्थिति को प्राप्त होता है। भगवान् कहते हैं? वे मेरे स्वरूप को प्राप्त होते हैं।गीता में? भगवान् श्रीकृष्ण मैं शब्द का प्रयोग आध्यात्मिक पूर्णत्व की दृष्टि से ही करते हैं। इस अध्याय का विषय उन गुणों की क्रीड़ा का अध्ययन करना है? जो हमें उपाधियों ओर अहंभाव के साथ बांध देते हैं। यदि एक बार हम उनसे मुक्त होकर अपने मन पर होने वाले उनके प्रभाव को समाप्त कर दें? तो तत्क्षण ही जीव भाव से मुक्त होकर हम अपने पारमार्थिक स्वरूप का अनुभव कर सकते हैं।स्वप्नद्रष्टा को स्वप्नावस्था में सत्य प्रतीत होने वाले दुख जाग्रत् अवस्था में असत् हो जाते हैं। नियम यह है कि एक अवस्था के सुखदुखादि अनुभव अन्य अवस्था में प्रभावशील नहीं होते हैं। अत? आत्म अज्ञान की अवस्था का उपाधि तादात्म्य तथा तज्जनित संसार का बन्धन जीव को ही सत्य प्रतीत होता है आत्मज्ञानी पुरुष को नहीं। ज्ञानी पुरुष अपने उस सर्वत्र व्याप्त सत्यस्वरूप को पहचानता है? जिसकी न उत्पत्ति है और न प्रलय।इसे यहाँ एक वाक्य से इंगित किया गया है? वे सृष्टि के आदि में जन्म नहीं लेते हैं सृष्टि मन का एक खेल है। जब हम मन से तादात्म्य नहीं करेंगे? तब हम उससे अविच्छिन्न भी नहीं होंगे? और इस प्रकार हमें सृष्टि का कोई अनुभव भी नहीं होगा। उदाहरणार्थ? जब कोई व्यक्ति क्रोधावेश में आ जाता है? तब वह एक क्रोधी व्यक्ति के रूप में व्यवहार करता है परन्तु क्रोध से निवृत्त होने और मन के शान्त हो जाने पर वह वैसा व्यवहार नहीं कर सकता। मन की युक्ति यह है कि वह विचारों के द्वारा एक सृष्टि की कल्पना करता है? और फिर उसी के साथ तादात्म्य कर स्वयं को इस प्रकार बन्धन में अनुभव करता है मानो उससे मुक्ति पाना कदापि संभव ही न हो। जब तक हम मन में ही डूबे रहेंगे तब तक उसके क्षोभ से उद्वेलित भी होते रहेंगे। मन से अतीत अर्थात् मुक्त होने पर शुद्ध आत्मा में कोई सृष्टि नहीं है? तब हमें जन्म का अनुभव कैसे हो सकता है और उस स्थिति में प्रलय से भय कैसा वह पूर्ण मुक्ति की स्थिति है।परन्तु अपने मन पर विजय पाने के लिये? साधक को मन की उन युक्तियों (योजनाओं) का पूर्ण ज्ञान होना आवश्यक है? जिनके द्वारा यह प्राय उसे छलता रहता है। शत्रु पर आक्रमण करने के पूर्व उसकी रणनीति का ज्ञान प्राप्त करना अपरिहार्य होता है। इस दृष्टि से? भगवान् का यह कथन भी समीचीन है कि इन तीन गुणों का सम्पूर्ण ज्ञान साधक को अपने मन पर विजय प्राप्त कराने में सहायक होगा और इस प्रकार वह अपनी समस्त प्रकार की अपूर्णताओं से मुक्ति प्राप्त कर सकेगा।अब? भगवान् कहते हैं कि किस प्रकार जड़ और चेतन के सम्बन्ध में इस दुखपूर्ण संसार की उत्पत्ति होती है
English Translation By Swami Sivananda
They who, having taken refuge in this knowledge, have attained to unity with Me, are neither born at the time of creation nor are they disturbed at the time of dissolution.
Transliteration
idaṃ jñānamupāśritya mama sādharmyamāgatāḥ
sarge'pi nopajāyante pralaye na vyathanti caअनुवाद
इस ज्ञान का आश्रय लेकर मेरे परम स्वरूप (साधर्म्य) को प्राप्त हुए पुरुष सृष्टि के आदि में पुनः उत्पन्न नहीं होते और प्रलयकाल में भी व्याकुल नहीं होते हैं।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण उस परम ज्ञान की महिमा बता रहे हैं जिसे प्राप्त कर साधक जन्म और मरण के चक्र से सर्वथा मुक्त हो जाता है। ऐसा ज्ञानी पुरुष परमात्मा के दिव्य स्वभाव को प्राप्त कर लेता है। इसलिए, सृष्टि के आरंभ में उसका पुनर्जन्म नहीं होता और महाप्रलय के समय भी वह विचलित या नष्ट नहीं होता।
Translation
Having taken refuge in this knowledge, those who have attained unity with My supreme nature are not born again even at the time of creation, nor are they disturbed at the time of dissolution.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains the glory of the supreme knowledge that frees a seeker from the cycle of birth and death. By taking refuge in this wisdom, the soul attains qualitative oneness with the Divine. Consequently, they are not reborn at the beginning of creation, nor are they affected or distressed during the cosmic dissolution.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| इदम् | इस |
| ज्ञानम् | ज्ञान को |
| उपाश्रित्य | आश्रय लेकर (अपनाकर) |
| मम | मेरे |
| साधर्म्यम् | समान स्वभाव को (परम स्वरूप को) |
| आगताः | प्राप्त हुए पुरुष |
| सर्गे | सृष्टि के आदि में |
| अपि | भी |
| न | नहीं |
| उपजायन्ते | उत्पन्न होते हैं |
| प्रलये | प्रलयकाल में |
| न | न तो |
| व्यथन्ति | व्याकुल होते हैं |
| च | और |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| idam | this |
| jñānam | knowledge |
| upāśritya | having taken refuge in |
| mama | My |
| sādharmyam | same nature (divine nature) |
| āgatāḥ | having attained |
| sarge | at the time of creation |
| api | even |
| na | not |
| upajāyante | are born |
| pralaye | at the time of dissolution |
| na | nor |
| vyathanti | are disturbed / distressed |
| ca | and |