Chapter 14 · गुणत्रयविभागयोग
Bhagavad Gita 14.18
मूल श्लोक :
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
सत्त्वगुणमें स्थित मनुष्य ऊर्ध्वलोकोंमें जाते हैं रजोगुणमें स्थित मनुष्य मृत्युलोकमें जन्म लेते हैं और निन्दनीय तमोगुणकी वृत्तिमें स्थित मनुष्य अधोगतिमें जाते हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
विकास के सोपान के तीन पाद हैं। न्यूनतम विकास की अवस्था में वनस्पति और पशु जगत् हैं। बुद्धि और प्रतिभा से सम्पन्न मनुष्य मध्य में स्थित है और वेदों से ज्ञात होता है कि स्वर्ग के देवतागण मनुष्य से उच्चतर अवस्था में रहते हैं। यहाँ विकास का अर्थ है अनुभवों का विशाल क्षेत्र और ज्ञान? विक्षेपों की न्यूनता और बुद्धि की प्रखरता का होना। विकास को नापने का मापदण्ड प्राणियों के द्वारा अनुभव की गई सुख? शान्ति और आनन्द की मात्रा है।इस दृष्टि से पाषाण का विकास शून्य माना जायेगा। तत्पश्चात् विकास की श्रेष्ठतर अवस्थाओं का क्रम है वनस्पति? पशु? मनुष्य और देवता। निसन्देह प्रखर बुद्धि युक्त मनुष्य पशुओं से श्रेष्ठ प्राणी है किन्तु उसकी,भी देशकाल की सीमाएं होती हैं। इन सीमाओं के टूट जाने पर मनुष्य देवताओं की श्रेष्ठतर योनि प्राप्त करता है। उदाहरणार्थ? दो मंजिलों की एक इमारत है। दूसरी मंजिल पर स्थित कमरे में पहँचने के लिये जो सोपान बना है? वह दो भागों में विभाजित है। प्रथम भाग में कुछ पायदानों को चढ़ने के पश्चात् मध्य में एक स्थान है? जहाँ से घूमकर सोपान के दूसरे भाग पर चढ़ना पड़ता है। जो लोग सबसे नीचे खड़े हैं? उन्हें विकास के निम्नस्तर पर मानें और जो मध्यस्थान में खड़े है वे उच्चतर स्थिति में हैं? जबकि सोपान के दूसरे भाग को चढ़कर जो लोग वहाँ हैं? वे उच्चतम अवस्था में हैं। सबसे नीचे हैं वनस्पति और पशु मध्य में है मनुष्य और उससे उच्चतर स्थिति में हैं देवतागण।ध्यान रहे कि इन तीनों में से कोई भी उस आराम और सुखसुविधाओं से पूर्ण कमरे में नहीं पहुँचा है। मध्य में स्थित मनुष्य को उच्चतर या निम्नतर स्थिति में जाने की स्वतंत्रता है। इस चित्र को यदि हम भलीभांति समझ लेते हैं तो हिन्दू दर्शनशास्त्र में वर्णित विकास के सिद्धान्त को हमने किसी सीमा तक समझ लिया है यह माना जा सकता है। यहाँ विकास का माप दण्ड प्रत्येक विकसित प्राणी के द्वारा अभिव्यक्ति की गयी चैतन्य की मात्रा है।सत्त्वस्थ पुरुष उच्च लोकों को प्राप्त होते हैं जो लोग विवेक? विचार? यथार्थ निर्णय और आत्मसंयम का शुद्ध जीवन जीते हैं? उनमें सत्त्वगुण की उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाती है। ऐसे शान्त? रचनात्मक और शक्तिशाली पुरुष की प्रगति उच्चतर लोक की ओर होती है।कामना और विक्षेप? महत्त्वाकांक्षा और उपलब्धि से पूर्ण रजोगुणी स्वभाव के लोग बारम्बार मनुष्य लोक को तब तक प्राप्त होते रहते हैं? जब तक वे आवश्यक चित्तशुद्धि नहीं प्रप्त कर लेते हैं।प्रमाद? मोह और अज्ञान जैसी हीन प्रवृत्तियों में रमने वाले जीव अपना अधपात करा लेते हैं।मरणोपरान्त भी जीव के अस्तित्व की अखण्डता का वर्णन करते समय भगवान् श्रीकृष्ण ने जीव की गति पर पड़ने वाले त्रिगुणों के प्रभाव को भी दर्शाया था। उपर्युक्त श्लोक उसी का सारांश है। परन्तु फिर संसार से मुक्ति कहाँ है रज्जुस्वरूप ये तीनों गुण हमें देह और उसके दुखों? मन और उसके विक्षेपों? बुद्धि और उसके स्पन्दनों और उसके परिच्छेदों से बांध देते हैं। इस संसार बन्धन से मुक्त होकर अपने सच्चिदानन्द स्वरूप का अनुभव हमें कब होगाअब तक त्रिगुणों के स्वरूप? लक्षण तथा मरणोपरान्त जीव की गति पर पड़ने वाले प्रभाव का वर्णन किया गया है। परन्तु यह सब हमारे बन्धनों के कारणों का ही वर्णन है।प्रकृति में स्थित पुरुष ही जीव कहलाता है। अनित्य जगत् का अनुभव? निराशाओं के दुख यही सब जीव का संसार है। त्रिगुणों से अतीत होने पर ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।अत्यधिक ज्वर से पीड़ित रोगी के मस्तक और पीठ में असहनीय पीड़ा होती है। यह पीड़ा रोग का लक्षण है। ज्वर के उतरने पर भी रोगी को कष्ट होता रहता है। उस रोग के लक्षणों से सर्वथा मुक्त होकर जब उस पुरुष को पूर्व की भाँति स्वास्थ्य और शक्ति प्राप्त हो जाती है? केवल तभी उसे हम पूर्ण स्वस्थ कह सकते हैं। उसी प्रकार? वास्तविक मोक्ष तीनों गुणों से अतीत होकर अपने आनन्दस्वरूप में स्थित हो जाना है।अब? सम्यक् दर्शन से मोक्ष किस प्रकार प्राप्त होता है उसका वर्णन करते है
English Translation By Swami Sivananda
Those who are seated in Sattva go upwards; the Rajasic dwell in the middle; and the Tamasic, abiding in the function of the lowest Guna, go downwards.
Transliteration
ūrdhvaṃ gacchanti sattvasthā madhye tiṣṭhanti rājasāḥ
jaghanyaguṇavṛttisthā adho gacchanti tāmasāḥअनुवाद
सत्त्वगुण में स्थित लोग ऊपर की ओर (उच्च लोकों को) जाते हैं, रजोगुण में स्थित लोग मध्य में (मनुष्य लोक में) रहते हैं, और निकृष्ट तमोगुण की वृत्तियों में स्थित तामसी लोग नीचे की ओर (पशु-पक्षी आदि योनियों तथा नरकों में) जाते हैं।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण तीनों गुणों के प्रभाव से होने वाली गतियों का वर्णन कर रहे हैं। सत्त्वगुणी व्यक्ति अपनी पवित्रता के कारण उच्च दिव्य लोकों को प्राप्त करते हैं। रजोगुणी व्यक्ति अपनी सांसारिक इच्छाओं के कारण पुनः मृत्युलोक में जन्म लेते हैं, जबकि तमोगुणी व्यक्ति अपने अज्ञान और आलस्य के कारण पशु योनियों या नरक जैसे निम्न स्तरों में गिर जाते हैं।
Translation
Those situated in the mode of goodness rise upward; those situated in the mode of passion remain in the middle; and those situated in the lowest mode of ignorance go downward.
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes the destinations reached by individuals under the influence of the three modes of nature. Those established in Sattva-guna ascend to higher, celestial realms due to their purity. Those dominated by Raja-guna remain in the middle, taking birth again in the human world, while those steeped in Tama-guna sink to lower levels of existence, such as animal life or hellish realms.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| ऊर्ध्वम् | ऊपर की ओर |
| गच्छन्ति | जाते हैं |
| सत्त्वस्थाः | सत्त्वगुण में स्थित लोग |
| मध्ये | मध्य में (मनुष्य लोक में) |
| तिष्ठन्ति | रहते हैं |
| राजसाः | रजोगुणी लोग |
| जघन्य-गुण-वृत्ति-स्थाः | निकृष्ट तमोगुण की वृत्तियों में स्थित |
| अधः | नीचे की ओर |
| गच्छन्ति | जाते हैं |
| तामसाः | तामसी लोग |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| ūrdhvam | upwards |
| gacchanti | go |
| sattvasthāḥ | those situated in the mode of goodness |
| madhye | in the middle |
| tiṣṭhanti | stay / remain |
| rājasāḥ | those in the mode of passion |
| jaghanya-guṇa-vṛtti-sthāḥ | situated in the functions of the lowest mode (ignorance) |
| adhaḥ | downwards |
| gacchanti | go |
| tāmasāḥ | those in the mode of ignorance |