श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 14 · गुणत्रयविभागयोग

Bhagavad Gita 14.15

मूल श्लोक :

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

रजोगुणके बढ़नेपर मरनेवाला प्राणी मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है तथा तमोगुणके बढ़नेपर मरनेवाला मूढ़योनियोंमें जन्म लेता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

पूर्वोक्त सिद्धांत के अनुसार ही मरणकाल में रजोगुण के आधिक्य के प्रभाव से जीव कर्मासक्त मनुष्य लोक में जन्म लेता है। उसके लिए कर्म करने और फल भोगने के लिए यही अत्यन्त उपयुक्त क्षेत्र है।इसके विपरीत यदि तमोगुण के प्रवृद्ध हुए काल में जीव देह का त्याग करता है? तो उसके फलस्वरूप वह मूढ़योनि अर्थात् पशुपक्षी या वनस्पति जीवन को प्राप्त होता है।कुछ दार्शनिकों का यह मत है कि एक बार विकास के सोपान पर मनुष्यत्व को प्राप्त कर लेने के पश्चात् हमारा निम्न स्तर की योनियों में पतन नहीं होता। निसन्देह? यह सान्त्वना प्रदान करने वाला मत है परन्तु अनुभूत उपलब्ध तथ्यों के विरुद्ध होने से ग्राह्य नहीं हो सकता। वास्तविकता यह है कि प्रगति के लिए सर्वोत्तम परिस्थिति और वातावरण को उपलब्ध कराने के पश्चात् भी सभी मनुष्य समान रूप से उनका उपयोग करके गौरवमयी सांस्कृतिक प्रतिष्ठा को प्राप्त नहीं होते। एक धनी मनुष्य का सामान्य बुद्धि का पुत्र? जीवन के प्रारम्भ से ही अनुकूल स्थिति को प्राप्त करता है तथापि प्राय यह देखा जाता है कि वह अपनी स्थिति का उचित उपयोग करने के स्थान पर प्रमाद और विलास का जीवन जीकर अपना सर्वनाश ही कर लेता है।बुद्धि से सम्पन्न होने पर भी हम में से कितने लोग विवेकपूर्ण आचरण करते हैं  समाज के कुछ लोग तो पशुओं की ओर ईर्ष्या की दृष्टि से देखते हुए घोषणा भी करते हैं कि उनका जीवन श्रेष्ठतर और सुखी है  कहने का तात्पर्य यह हुआ कि कुछ अल्पसंख्यक द्विपादों की दृष्टि से चतुष्पादों का जीवन उच्चतर विकास का है  यदि किसी व्यक्ति का यही विचार हो? तो उसके लिए पशुजीवन निन्दनीय न होकर वरणीय होता है? जिसकी वह कामना करता है। मद्यपान न करने वाला एक संयमी पुरुष मधुशाला को दुखालय समझता है किन्तु एक मद्यपायी को वही स्थान सुख और शान्ति का विश्रामालय प्रतीत होता है।तामसिक प्रवृत्ति के लोगों के लिए पशुयोनि में जन्म लेना माने आनन्द प्राप्ति का अद्भुत अवसर है? जहाँ वे अपनी रुचि और प्रवृत्ति को पूर्णतया व्यक्त कर सकते हैं। इस प्रकार दर्शनशास्त्र की दृष्टि से देखने पर हमें बिना किसी सन्देह या संकोच के यह स्वीकार करना पड़ेगा कि तमोगुणी लोगों को पशु देह में ही पूर्ण सन्तोष का अनुभव होगा। अत यहाँ कहा गया है? तमोगुण के प्रवृद्ध हुए काल में मरण होने पर जीव मूढ़योनि में जन्म लेता है।प्रस्तुत प्रकरण का सारांश यही है कि

English Translation By Swami Sivananda

Meeting death in Rajas, he is born among those who are attached to action; and dying in Tamas, he is born in the womb of the senseless.

Transliteration

rajasi pralayaṃ gatvā karmasaṅgiṣu jāyate
tathā pralīnastamasi mūḍhayoniṣu jāyate

अनुवाद

रजोगुण के बढ़ने पर मृत्यु को प्राप्त होकर मनुष्य कर्मों में आसक्ति वाले मनुष्यों में जन्म लेता है तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरा हुआ मनुष्य अज्ञानी योनियों में जन्म लेता है

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण बताते हैं कि मृत्यु के समय व्यक्ति के भीतर जिस गुण की प्रधानता होती है, उसी के अनुसार उसकी अगली गति निर्धारित होती है। यदि कोई व्यक्ति रजोगुण की प्रधानता के समय शरीर त्यागता है, तो वह सकाम कर्म करने वाले मनुष्यों के बीच जन्म लेता है। वहीं, यदि तमोगुण की प्रधानता में मृत्यु होती है, तो जीवात्मा पशु-पक्षी या अन्य अज्ञानी योनियों में जन्म पाती है।

Translation

Meeting death when rajas predominates, one is born among those attached to action; likewise, dying when tamas predominates, one is born in the wombs of the ignorant.

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains how the dominant mode (guna) at the time of death determines the soul’s next destination. If a person dies when the mode of passion (rajas) is predominant, they are reborn among humans who are attached to fruitive activities. Conversely, if one dies when the mode of ignorance (tamas) prevails, they are reborn in the animal kingdom or other lower, deluded species.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
रजसिरजोगुण में
प्रलयम्मृत्यु को
गत्वाप्राप्त होकर
कर्म-सङ्गिषुकर्मों में आसक्ति वालों में
जायतेजन्म लेता है
तथावैसे ही
प्रलीनःमरा हुआ (लीन हुआ)
तमसितमोगुण में
मूढ-योनिषुअज्ञानी (पशु आदि) योनियों में
जायतेजन्म लेता है

Word by word

WordMeaning
rajasiin the mode of passion
pralayamdissolution / death
gatvāhaving attained
karma-saṅgiṣuamong those attached to action
jāyateis born
tathālikewise
pralīnaḥone who dies
tamasiin the mode of ignorance
mūḍha-yoniṣuin the wombs of the deluded / ignorant
jāyateis born