श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 14 · गुणत्रयविभागयोग

Bhagavad Gita 14.12

मूल श्लोक :

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे भरतवंशमें श्रेष्ठ अर्जुन रजोगुणके बढ़नेपर लोभ? प्रवृत्ति? कर्मोंका आरम्भ? अशान्ति और स्पृहा -- ये वृत्तियाँ पैदा होती हैं।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ रजोगुण के मुख्य लक्षणों की गणना करते हैं। जिस क्रम में उनका उल्लेख किया गया है? उसमें हम यह देखते हैं कि उत्तरोत्तर लक्षण पूर्व के लक्षण से उत्पन्न होता है। परद्रव्य की इच्छा का नाम है लोभ जो कभी सन्तुष्ट नहीं होता। लोभी पुरुष में आ जाती है प्रवृत्ति अर्थात् फिर वह क्रियाशील हो जाता है? शान्त नहीं बैठ सकता। लोभाधिक्य होने पर उसके किये गये कर्म स्वार्थपूर्वक ही होते हैं? जिनका निर्देश यहाँ कर्मों का आरम्भ इस शब्द से किया गया है। स्वार्थ और लोभ के वशीभूत पुरुष को शम अर्थात् शान्ति प्राप्त नहीं हो सकती। श्री शंकराचार्य अशम शब्द का अर्थ बताते हैं? हर्ष रागादि प्रवृत्ति। इसका अर्थ यह हुआ? कि ऐसा पुरुष सदैव इष्टानिष्ट की प्राप्ति होने पर हर्ष विषाद को प्राप्त होता रहता है? ऐसी स्थिति में उसे शान्ति कैसे मिल सकती है  वह अपने ही कर्मों के फलस्वरूप स्वयं को ऐसी स्थिति में पाता है? जो उसे अधिकाधिक कटुतर क्रूरता? नीच अनैतिकता और हत्या जैसे अपराध करने में प्रवृत्त करती है उसकी आन्तरिक शान्ति को छिन्नभिन्न कर देती है। रजोगुण से अभिभूत यह पुरुष स्पृहा अर्थात् विषयोपभोग की लालसा के वश में भी आ जाता है। अप्राप्त वस्तुओं तथा लाभ को पाने की कभी न समाप्त होने वाली यह कामना ही स्पृहा कहलाती है।संक्षेप में? रजोगुण के स्पर्शजन्य रोग के प्रभाव से हमारा मानसिक व्यक्तित्व अपनी ही चंचल प्रवृत्तियों से उत्पीड़ित होता रहता है? जो अन्तहीन योजनाओं? थका देने वाले कर्मों? व्यथित करने वाली इच्छाओं पीड़ादायक लालसाओं? उन्मत्त करने वाले लोभ और व्यथापूर्ण व्याकुलताओं के रूप में व्यक्त होती हैं। जब ऐसा व्यक्ति समाज मे कार्य करता है तब उसके दुख उस तक ही सीमित नहीं रहते? वरन् स्पर्शजन्य रोग के समान? उसके आसपास के सहस्रों लोगों को भी व्यथित करते हैं।

English Translation By Swami Sivananda

Greed, activity, the undertaking of actions, restlessness, longing  these arise when Rajas is predominant, O Arjuna.

Transliteration

lobhaḥ pravṛttirārambhaḥ karmaṇāmaśamaḥ spṛhā
rajasyetāni jāyante vivṛddhe bharatarṣabha

अनुवाद

हे भरतश्रेष्ठ! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मों का आरम्भ, अशान्ति और लालसा—ये सब उत्पन्न होते हैं

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को रजोगुण के बढ़ने के लक्षणों के बारे में बता रहे हैं। जब किसी व्यक्ति के भीतर रजोगुण की प्रधानता होती है, तो उसमें धन-सम्पत्ति के प्रति लोभ, निरंतर कर्म करने की प्रवृत्ति, नए सकाम कर्मों का आरम्भ, मन की चंचलता या अशान्ति और सांसारिक वस्तुओं के प्रति तीव्र लालसा उत्पन्न होती है। ये लक्षण रजोगुण की वृद्धि के स्पष्ट संकेतक हैं।

Translation

O best of the Bharatas, when the mode of passion increases, greed, activity, the undertaking of actions, restlessness, and longing arise

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains the symptoms that manifest when the mode of passion (rajas) becomes dominant. When rajas increases, a person experiences greed, constant activity, the initiation of self-serving endeavors, mental restlessness, and an insatiable longing for material things. These qualities indicate that the mode of passion is overpowering the other modes of nature.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
लोभःलोभ (लालच)
प्रवृत्तिःप्रवृत्ति (सक्रियता)
आरम्भःआरम्भ करना
कर्मणाम्कर्मों का
अशमःअशान्ति (चंचलता)
स्पृहालालसा (कामना)
रजसिरजोगुण के
एतानिये सब
जायन्तेउत्पन्न होते हैं
विवृद्धेबढ़ जाने पर
भरतर्षभहे भरतश्रेष्ठ (अर्जुन)

Word by word

WordMeaning
lobhaḥgreed
pravṛttiḥactivity
ārambhaḥundertaking
karmaṇāmof actions
aśamaḥrestlessness
spṛhālonging (desire)
rajasiwhen the mode of passion
etānithese
jāyantearise
vivṛddheupon being increased
bharatarṣabhaO best of the Bharatas (Arjuna)