श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 13 · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

Bhagavad Gita 13.9

मूल श्लोक :

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

इन्द्रियोंके विषयोंमें वैराग्यका होना? अहंकारका भी न होना और जन्म? मृत्यु? वृद्धावस्था तथा व्याधियोंमें दुःखरूप दोषोंको बारबार देखना।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

इन्द्रियों के विषयों के प्रति वैराग्य  इसका अर्थ जगत् से पलायन करना नहीं है। विषयों के साथ रहते हुए भी मन से उनका चिन्तन न करना तथा उनमें आसक्त न होना? यह वैराग्य का अर्थ है। जो व्यक्ति विषयों से दूर भागकर कहीं जंगलों में बैठकर उनका चिन्तन करता रहता है? वह तो अपनी वासनाओं का केवल दमन कर रहा होता है? ऐसे पुरुष को भगवान् ने मिथ्याचारी कहा है।अहंकार का अभाव  व्यष्टिगत जीवभाव का उदय केवल तभी होता है? जब हम शरीरादि उपाधियों के साथ तथा उनके अनुभवों के साथ तादात्म्य करते हैं। अपने शुद्ध आत्मस्वरूप में स्थित होने के लिए आवश्यक पूर्व गुण यह है कि हम इस मिथ्या तादात्म्य को विचार के द्वारा नष्ट कर दें। यह प्रक्रिया भूमि जोतने के पूर्व घासपात को दूर करने के तुल्य ही है।दुखदोषानुदर्शनम्  वर्तमान दशा से असन्तुष्टि ही हमें नवीन? श्रेष्ठतर और सुखद स्थिति को प्राप्त करने के लिए प्रेरित कर सकती है। जब तक किसी राष्ट्र या समाज के लोगों में इस बात की जागरूकता नहीं आती है कि उनकी वर्तमान दशा अत्यन्त घृणित और दुखपूर्ण है? तब तक वे अपने दुखों को भूलकर अपने आप को ही उस दशा में जीने के अनुकूल बना लेते हैं। यही कारण है कि प्रत्येक राजनीतिक नेता या समाज सेवक? सर्वप्रथम? लोगों को उनकी पतित और दरिद्रता की दशा का बोध कराता है। जब लोगों में इस बात की जागरूकता आ जाती है? तब वे उत्साह के साथ? श्रेष्ठतर आनन्द और समृद्ध जीवन जीने का प्रयत्न करने को तत्पर हो ज्ााते हैं।यही पद्धति सांस्कृतिक और आध्यात्मिक क्षेत्रों में भी प्रयोज्य है। जब तक साधक को अपने आन्तरिक व्यक्तित्व के बन्धनों का पूर्णतया भान नहीं होता है? तब तक वह स्वनिर्मित दुख के गर्त में पड़ा रहता है? और उससे बाहर आने के लिए कदापि प्रयत्न नहीं करता है। मानव शरीर और मन में अपने आप को परिस्थिति के अनुकूल बना लेने की अद्भुत् क्षमता है। वे अत्यन्त घृणित अवस्था को भी स्वीकार कर लेते हैं यहाँ तक कि उसी में सुख भी अनुभव करने लगते हैं।इसलिए? यहाँ साधक को अपनी वर्तमान दशा के दोषों को विचारपूर्वक देखने का उपदेश दिया गया है। एक बार जब वह अपनी बद्धावस्था को पूर्णतया समझ लेगा? तब उसमें आवश्यक आध्यात्मिक जिज्ञासा? बौद्धिक सार्मथ्य? मानसिक उत्साह और शारीरिक साहस आदि समस्त गुण आ जायेंगे? जिनके द्वारा वह आध्यात्मिक पूर्णता की उपलब्धि सरलता से कर सकेगा।जन्ममृत्युजराव्याधि में दोष का दर्शन  प्रत्येक शरीर को ये विकार प्राप्त होते हैं। इनमें से प्रत्येक विकार नयेनये दुखों का स्रोत है। इन समस्त विकारों से प्राप्त होने वाले दुखों के प्रति जागरूकता आ जाने पर वह पुरुष उनसे मुक्ति पाने के लिए अधीर हो जाता है। दुख के विरुद्ध विद्रोह का यह भाव ही वह प्रेरक तत्त्व है? जो साधकों को पूर्णत्व के शिखर तक शीघ्रता से पहुँचने के लिए प्रेरित करता है।आगे कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Indifference to the objects of the senses and also absence of egoism; perception of (or reflection on) the evil in birth, death, old age, sickness and pain.

Transliteration

indriyārtheṣu vairāgyamanahaṅkāra eva ca
janmamṛtyujarāvyādhiduḥkhadoṣānudarśanam

अनुवाद

इन्द्रियों के विषयों में वैराग्य और अहंकार का सर्वथा अभाव, तथा जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोग में दुःख और दोषों का बार-बार विचार करना।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण ज्ञान के लक्षणों का वर्णन जारी रखते हुए वैराग्य और अहंकार के अभाव को महत्वपूर्ण बताते हैं। साधक को सांसारिक विषयों के प्रति अनासक्त होना चाहिए और स्वयं को कर्ता मानने के अहंकार से मुक्त होना चाहिए। इसके साथ ही, जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और बीमारी जैसी जीवन की अनिवार्यताओं में निहित दुखों और दोषों का निरंतर चिंतन करने से संसार के प्रति वैराग्य सुदृढ़ होता है।

Translation

Dispassion towards the objects of the senses, absence of egoism, and reflection on the evils and miseries of birth, death, old age, and disease.

Meaning

In this verse, Lord Krishna continues to describe the qualities of knowledge, emphasizing dispassion and the absence of ego. A seeker must remain unattached to sensory objects and free from the pride of doership. Furthermore, constantly contemplating the inherent miseries and defects in birth, death, old age, and disease helps strengthen one’s detachment from the material world.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
इन्द्रियार्थेषुइन्द्रियों के विषयों में
वैराग्यम्वैराग्य (अनासक्ति)
अनहङ्कारःअहंकार का अभाव
एवही
और
जन्मजन्म
मृत्युमृत्यु
जरावृद्धावस्था
व्याधिरोग
दुःखदुःख
दोषदोषों का
अनुदर्शनम्बार-बार विचार करना (देखना)

Word by word

WordMeaning
indriyārtheṣuin the sense objects
vairāgyamdispassion
anahaṅkāraḥabsence of egoism
evaindeed
caand
janmabirth
mṛtyudeath
jarāold age
vyādhidisease
duḥkhamisery
doṣaevil (defects)
anudarśanamrepeatedly observing