Chapter 13 · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
Bhagavad Gita 13.7
मूल श्लोक :
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतनाधृतिः
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
इच्छा? द्वेष? सुख? दुःख? संघात? चेतना (प्राणशक्ति) और धृति -- इन विकारोंसहित यह क्षेत्र संक्षेपसे कहा गया है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
अब यहाँ मुख्य विषय का प्रारम्भ होता है जिसे भगवान् ने पहले केवल यह शरीर कहकर निर्देशित किया था? उस क्षेत्र के तत्त्वों का यहाँ नामोल्लेख करके गणना की गई है।महाभूतानि आकाश? वायु? अग्नि? जल और पृथ्वी ये पंचमहाभूत हैं। ये महाभूत अपने सूक्ष्म रूप में तन्मात्रा कहलाते हैं। इन्हीं तन्मात्राओं के परस्पर मिलन से पाँच स्थूल महाभूत उत्पन्न होते हैं? जिनका निर्देश यहाँ इन्द्रियों के पाँच विषय कहकर किया गया है।अहंकार चैतन्य का उपाधियों के साथ तादात्म्य होने पर अहंभाव या अहंकार की उत्पत्ति होती है। यही उपाधियों द्वारा कर्मों का कर्ता और फलों का भोक्ता बनता है। संसार के सुखदुखादिक इसी के लिए होते हैं।बुद्धि समष्टि की दृष्टि से यहाँ बुद्धि शब्द प्रयुक्त है? जिसे सांख्यदर्शन में महत्तत्त्व कहते हैं। अन्तकरण की निश्चयात्मिका वृत्ति बुद्धि कहलाती है। जीवन में वस्तु की यथार्थता? अनुभवों का शुभ और अशुभ रूप में निर्धारण करना ही बुद्धि का कार्य है।अव्यक्त मनुष्य के मन और बुद्धि जिससे प्रेरित होते हैं? वह अव्यक्त वासनाएं हैं। जगत् में हम जो कर्म करते हैं तथा फल भोगते हैं? उनसे हमारे मन में संस्कार उत्पन्न होते हैं? जो हमारे भावी कर्म? विचार एवं भावनाओं को दिशा प्रदान करते हैं।एक व्यष्टि जीव के समस्त कर्मों का स्रोत उसकी वासनाएं होती हैं। इसलिए स्वाभाविक है कि समष्टि की दृष्टि से सम्पूर्ण चराचर सृष्टि का स्रोत समष्टि वासनाएं ही होनी चाहिए। इसी समष्टि वासना को सांख्यदर्शन में मूलप्रकृति कहा गया है? तो वेदान्त ने इसे माया कहा है। माया या मूलप्रकृति की उपाधि से विशिष्ट परमात्मा ही सृष्टिकर्ता ईश्वर है और वही परमात्मा व्यष्टि वासना की उपाधि (अविद्या) से विशिष्ट जीव बनता है।इस विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि अव्यक्त ही वह अदृष्ट कारण है? जिससे यह दृश्य जगत् कार्यरूप में व्यक्त हुआ है।दस इन्द्रियाँ पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ ही वे कारण हैं? जिनके द्वारा प्रत्येक मनुष्य क्रमश विषय ग्रहण करके अपनी प्रतिक्रियाएं व्यक्त करता है।एक (मन) प्रस्तुत प्रकरण के सन्दर्भ में एक शब्द से निर्दिष्ट वस्तु मन है। प्रत्येक ज्ञानेन्द्रिय केवल एक ही विषय का ग्रहण करती है। पाँचों इन्द्रियों से सम्बद्ध मन समस्त विषय संवेदनाओं को एकत्र कर बुद्धि के समक्ष निर्णय के लिए प्रस्तुत करता है। तत्पश्चात् उस निर्णय को वह पाँच कर्मेन्द्रियों के द्वारा कार्यान्वित करता है। इस प्रकार? विषय ग्रहण तथा प्रतिक्रिया का व्यक्त होना इन दोनों का कार्य एक मन ही करता है? इसलिए उसे यहाँ एक शब्द से इंगित करते हैं।पाँच इन्द्रियगोचर विषय पंच ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा ग्रहण किये जाने वाले पाँच विषय हैं शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्ध। यही सम्पूर्ण जगत् है।इस प्रकार? इस श्लोक में सांख्य दर्शन के प्रसिद्ध चौबीस तत्त्वों की गणना की गयी है।क्षेत्र के तत्त्वों को बताने के पश्चात्? भगवान् उसके विकारों को बताते हैं। वे विकार हैं इच्छा? द्वेष? सुख? दुख? स्थूल देह? अन्तकरण वृत्ति तथा धृति अर्थात् धैर्य। संक्षेपत केवल शरीर? इन्द्रियाँ? मन और बुद्धि ही क्षेत्र नहीं है? वरन् उसमें इन उपाधियों द्वारा अनुभूत विषय? भावनाएं और विचार भी समाविष्ट हैं।द्रष्टा से भिन्न जो कुछ भी है? वह सब दृश्य है? क्षेत्र है। इस द्रष्टा आत्मचैतन्य की दृष्टि से जो कुछ भी दृश्य? ज्ञात तथा अनुभूत वस्तु है? वह सब क्षेत्र है। इसे गीता में अत्यन्त संक्षिप्त वाक्य यह शरीर के द्वारा दर्शाया गया है।इस सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करने वाला चैतन्यस्वरूप आत्मा क्षेत्रज्ञ कहलाता है। अविद्या दशा में यह जीव? शरीर आदि क्षेत्र को ही अपना स्वरूप अर्थात् क्षेत्रज्ञ समझता है? इस कारण उसे अपने शुद्ध आत्मस्वरूप का बोध कराने के लिए? सर्वप्रथम? जड़ और चेतन का विवेक कराना आवश्यक है। इसीलिए? यहाँ क्षेत्र को इतने विस्तार पूर्वक बताया गया है।अब अगले पाँच श्लोकीय प्रकरण में ज्ञान को बताया गया है जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है? यहाँ ज्ञान शब्द से तात्पर्य उस अन्तकरण से है? जो आत्मज्ञान के लिए आवश्यक गुणों से सम्पन्न हो? क्योंकि शुद्ध अन्तकरण के द्वारा ही आत्मा का अनुभव सम्भव होता है। अत? अब प्रस्तुत प्रकरण में भगवान् श्रीकृष्ण बीस गुणों को बताते हैं? जो सदाचार और नैतिक नियम हैं।वे गुण हैं
English Translation By Swami Sivananda
Desire, hatred, pleasure, pain, the aggregate (the body), intelligence, fortitude the field has thus been briefly described with its modifications.
Transliteration
icchā dveṣaḥ sukhaṃ duḥkhaṃ saṅghātaś cetanā dhṛtiḥ
etat kṣetraṃ samāsena savikāram udāhṛtamअनुवाद
इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल शरीर (संघात), चेतना और धैर्य— यह क्षेत्र अपने विकारों सहित संक्षेप में कहा गया है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण ‘क्षेत्र’ (शरीर और प्रकृति के कार्यक्षेत्र) के विकारों और मानसिक अवस्थाओं का वर्णन कर रहे हैं। इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, शरीर का संघात, चेतना और धैर्य—ये सभी प्रकृति के कार्य हैं और क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं। आत्मा इन सब से परे इनका केवल ज्ञाता (क्षेत्रज्ञ) है।
Translation
Desire, hatred, pleasure, pain, the physical body, consciousness, and fortitude— this, in brief, is described as the field (kṣetra) along with its modifications.
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes the mental states and physical modifications that constitute the ‘field’ (kṣetra). Desire, aversion, pleasure, pain, the bodily aggregate, consciousness, and determination are all products of material nature. The soul is distinct from these, acting merely as the knower of this field.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| इच्छा | इच्छा (चाह) |
| द्वेषः | द्वेष (घृणा) |
| सुखम् | सुख |
| दुःखम् | दुःख |
| संघातः | शरीर का संघात (पंचभूतों का समूह) |
| चेतना | चेतना (प्राणशक्ति) |
| धृतिः | धैर्य (धारण शक्ति) |
| एतत् | यह |
| क्षेत्रम् | क्षेत्र (शरीर) |
| समासेन | संक्षेप में |
| स-विकारम् | विकारों सहित |
| उदाहृतम् | कहा गया है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| icchā | desire |
| dveṣaḥ | hatred |
| sukham | pleasure |
| duḥkham | pain |
| saṅghātaḥ | the bodily aggregate |
| cetanā | consciousness |
| dhṛtiḥ | fortitude |
| etat | this |
| kṣetram | the field |
| samāsena | in brief |
| sa-vikāram | with modifications |
| udāhṛtam | is declared |