श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 13 · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

Bhagavad Gita 13.33

मूल श्लोक :

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते
सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

जैसे सब जगह व्याप्त आकाश अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे कहीं भी लिप्त नहीं होता? ऐसे ही सब जगह परिपूर्ण आत्मा किसी भी देहमें लिप्त नहीं होता।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

यहाँ प्रकृति और पुरुष के सम्बन्ध को दर्शाने के लिए आकाश का दृष्टान्त दिया गया है। अवकाशात् आकाश? अर्थात् जो वस्तुओं को रहने के लिए स्थान प्रदान करे वह आकाश है। पंचमहाभूतों में यह सूक्ष्मतम है? और इस कारण से सर्वगत है। सूक्ष्म आकाश उसमें स्थित सभी स्थूल वस्तुओं को व्याप्त किये हुए है? किन्तु उनमें से कोई भी वस्तु उसे मर्यादित या अपने दोष से लिप्त नहीं कर सकती।परमात्मा आकाश का भी कारण होने से उससे भी सूक्ष्मतर और उसे व्याप्त किये हुए है। वह सबको व्याप्ता है? परन्तु उसे कोई व्याप नहीं सकता। अत वह परमात्मा देह में स्थित होकर भी उससे लिप्त नहीं होता।स्वप्नावस्था के हत्यारे के हाथ जागृत पुरुष को रक्तरञ्जित नहीं कर सकते। प्रेत के रक्तरञ्जित वस्त्र स्तम्भ पर अपने चिन्ह नहीं छोड़ सकते। मृगमारीचिका से रेत गीली नहीं हो जाती। ये सब उदाहरण भ्रम और अध्यास के हैं। यह जगत् परम सत्य के अज्ञान से प्रक्षेपित होने के कारण किसी भी प्रकार से परमात्मा को दूषित नहीं कर सकता।तब? इस आत्मा का देह में क्या कार्य है  सुनो

English Translation By Swami Sivananda

As the all-pervading ether is not tainted, because of its subtlety, so the Self seated everywhere in the body is not tainted.

Transliteration

yathā sarvagataṃ saukṣmyādākāśaṃ nopalipyate
sarvatrāvasthito dehe tathā'tmā nopalipyate

अनुवाद

जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त आकाश अपनी सूक्ष्मता के कारण लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार शरीर में सर्वत्र स्थित आत्मा भी लिप्त नहीं होती।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण आत्मा की निर्लिप्तता को समझाने के लिए आकाश का उदाहरण देते हैं। जैसे आकाश सब कुछ अपने भीतर समेटे हुए भी अपनी सूक्ष्मता के कारण किसी भी वस्तु के गुणों या दोषों से अछूता रहता है, वैसे ही आत्मा पूरे शरीर में व्याप्त होने पर भी शरीर के विकारों और कर्मों से सर्वथा निर्लिप्त रहती है।

Translation

Just as the all-pervading ether, due to its subtlety, is not contaminated, so the soul, situated everywhere in the body, is not contaminated.

Meaning

In this verse, Lord Krishna uses the analogy of space (ether) to explain the untainted nature of the soul. Just as space pervades everything but remains unaffected and unsoiled due to its subtle nature, the soul, although pervading the entire physical body, remains completely untouched by the body’s changes, actions, and impurities.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
यथाजिस प्रकार
सर्वगतम्सर्वत्र व्याप्त
सौक्ष्म्यात्सूक्ष्मता के कारण
आकाशम्आकाश
ननहीं
उपलिप्यतेलिप्त होता है
सर्वत्रसब जगह
अवस्थितःस्थित
देहेशरीर में
तथाउसी प्रकार
आत्माआत्मा
ननहीं
उपलिप्यतेलिप्त होती है

Word by word

WordMeaning
yathāas
sarva-gatamall-pervading
saukṣmyātdue to subtlety
ākāśamthe sky/ether
nanot
upalipyateis contaminated
sarvatraeverywhere
avasthitaḥsituated
dehein the body
tathāso
ātmāthe soul
nanot
upalipyateis contaminated