श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 13 · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

Bhagavad Gita 13.32

मूल श्लोक :

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे कुन्तीनन्दन यह पुरुष स्वयं अनादि और गुणोंसे रहित होनेसे अविनाशी परमात्मस्वरूप ही है। यह शरीरमें रहता हुआ भी न करता है और न लिप्त होता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

यद्यपि चैतन्य आत्मा के सान्निध्य मात्र से देहेन्द्रियादि उपाधियाँ स्वक्रियाओं में प्रवृत्त होती हैं? तथापि आत्मा सदा अकर्त्ता ही रहता है। शास्त्रों के इस प्रतिपादन को समझना वेदान्त के प्रारम्भिक विद्यार्थियों को कठिन प्रतीत होता है। इसलिए? उपनिषदों के ऋषियों ने विशेष परिश्रमपूर्वक हमें यह समझाने का प्रयत्न किया है कि किस प्रकार एकमेव अद्वितीय? परिपूर्ण सर्वव्यापी परमात्मा अकर्ता है। पहले भीगीता में कहा जा चुका है कि आत्मा क्षेत्र के साथ तादात्म्य करके जीवरूपक्षेत्रज्ञ बन जाता है? जो कर्मों का कर्ता और फलों का भोक्ता है।शरीरों में स्थित होने पर भी आत्मा के दोषमुक्तत्व को सिद्ध करने के लिए यहाँ कुछ हेतु दिये गये हैं। जब एक न्यायाधीश श्रीगोपाल राव किसी हत्यारे अपराधी को मृत्युदण्ड सुनाते हैं? तब उसकी मृत्यु का पातक न्यायाधीश को प्रभावित नहीं कर सकता। श्रीगोपाल राव न्यायालय में न्यायाधीश के पद पर आसीन होकर निर्णय देते हैं? न कि अपनी व्यक्तिगत क्षमता में।अनादि  जिस वस्तु का कारण होता है? उसी का प्रारम्भ भी हो सकता है। प्रारम्भ रहित का अर्थ कारणरहित होगा। परम सत्य वह है जिससे सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ है। अत परमात्मा कारण रहित कारण होने से अनादि कहा गया है। इसी कारण से वह अव्यय? अविनाशी भी है।निर्गुण  गुणवान् वस्तु ही विकारी होती है। हमने देखा कि जगत्कारण परमात्मा अविकारी है? अत उसका निर्गुण होना भी आवश्यक है।यह परमात्मा अव्यय है  जगत्कारण? अनादि और निर्गुण होने से परमात्मा का अव्ययत्व सिद्ध हो जाता है।यह परमात्मा अपने सान्निध्य मात्र से जड़ उपाधियों को चेतनवत् व्यवहार करने में सक्षम करता है? परन्तु वह स्वयं किसी प्रकार की क्रिया नहीं,करता।उपर्युक्त सिद्धांत वेदान्त के कुछ सूक्ष्म सिद्धांतों में से एक है? और दुर्बल मति के विद्यार्थियों को प्राय इसे समझने में कठिनाई अनुभव होती है। यद्यपि यह वेदान्त साहित्य का कठिन भाग माना गया है? तथापि प्रयत्नपूर्वक इस पर मनन करने से सन्देह और कठिनाई दूर हो सकती हैं।उपाधियों के सभी निषिद्ध और आसुरी कर्मों में भी आत्मा के अकर्तृत्वऔर निर्गुणत्व को दर्शाने के लिए? भगवान् कुछ दृष्टान्त देते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Being without beginning and being devoid of (any) alities, the Supreme Self, imperishable, though dwelling in the body, O Arjuna, neither acts nor is tainted.

Transliteration

anāditvān nirguṇatvāt paramātmāyam avyayaḥ
śarīrastho'pi kaunteya na karoti na lipyate

अनुवाद

हे कुन्तीपुत्र! अनादि होने के कारण और निर्गुण होने के कारण यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित होने पर भी न तो कुछ करता है और न ही लिप्त होता है

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि जीवात्मा वास्तव में परमात्मा का ही अंश है जो शरीर में रहते हुए भी प्रकृति के गुणों से परे है। जैसे आकाश सर्वव्यापी होने पर भी किसी वस्तु से लिप्त नहीं होता, वैसे ही परमात्मा शरीर में स्थित होने पर भी कर्मों के फलों से अछूता रहता है। यह आत्मा अविनाशी, अनादि और दिव्य है।

Translation

O son of Kunti, because this supreme Self is beginningless and devoid of material qualities, it is imperishable; though dwelling in the body, it neither acts nor is tainted

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains to Arjuna that the supreme Self, despite residing within the physical body, remains unaffected by bodily actions. Because it is beginningless and free from the three modes of material nature (gunas), it is immutable and does not incur any karmic reactions or attachment.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
अनादित्वात्अनादि होने के कारण
निर्गुणत्वात्गुणरहित होने के कारण
परमात्मापरम आत्मा
अयम्यह
अव्ययःअविनाशी
शरीरस्थःशरीर में स्थित
अपिभी
कौन्तेयहे कुन्तीपुत्र (अर्जुन)
नानहीं
करोतिकरता है
नानहीं
लिप्यतेलिप्त होता है

Word by word

WordMeaning
anāditvātdue to being beginningless
nirguṇatvātdue to being devoid of material qualities
paramātmāthe supreme Self
ayamthis
avyayaḥimperishable
śarīrasthaḥdwelling in the body
apieven though
kaunteyaO son of Kunti
nanot
karotiacts
nanot
lipyateis tainted