श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 13 · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

Bhagavad Gita 13.31

मूल श्लोक :

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

जिस कालमें साधक प्राणियोंके अलगअलग भावोंको एक प्रकृतिमें ही स्थित देखता है और उस प्रकृतिसे ही उन सबका विस्तार देखता है? उस कालमें वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

किसी वस्तु या घटना के वैज्ञानिक अध्ययन की पूर्णता उसके बौद्धिक विश्लेषण तथा प्रायोगिक प्रत्यक्षीकरण से ही होती है।जब भौतिक विज्ञान में यह ज्ञात होता है कि परमाणु पदार्थ की इकाई है? तब इस ज्ञान के साथ यह भी समझना चाहिए कि ये परमाणु ही विभिन्न संख्या एवं प्रकारों में संयोजित होकर असंख्य रूप और गुणों वाली वस्तुओं के इस जगत् की रचना करते हैं। इसी प्रकार समस्त नाम और रूपों के पीछे एक आत्मतत्त्व ही सत्य है? यह जानना मात्र आंशिक ज्ञान है। ज्ञान की पूर्णता तो इसमें होगी कि जब हम यह भी जानेंगे कि इस एक आत्मा से विविधता की यह सृष्टि किस प्रकार प्रकट हुई है।जिस प्रकार? समुद्र को जानने वाला पुरुष असंख्य और विविध तरंगों का अस्तित्व एक समुद्र में ही देखता है? इसी प्रकार आत्मज्ञानी पुरुष भी भूतों के पृथक्पृथक् भाव को एक परमात्मा में ही स्थित देखता है। समस्त तरंगें समुद्र का ही विस्तार होती हैं। ज्ञानी पुरुष का भी यही अनुभव होता है कि एक आत्मा से ही इस सृष्टि का विस्तार हुआ है। स्वस्वरूपानुभूति के इन पवित्र क्षणों में ज्ञानी पुरुष स्वयं ब्रह्म बनकर यह अनुभव करता है कि एक ही आत्मतत्त्व अन्तर्बाह्य सबको व्याप्त और आलिंगन किए है? सबका पोषण करते हुए स्थित है न केवल गहनगम्भीर और असीमअनन्त में वह स्थित है? वरन् सभी सतही नाम और रूपों में भी वह व्याप्त है।स्वयं आत्मस्वरूप बनकर ही आत्मा का अनुभव होता है। जिसने यह पूर्णत जान लिया है कि स्वहृदय में स्थित आत्मा ही सर्वत्र भूतमात्र में स्थित आत्मा (ब्रह्म) है तथा किस प्रकार अविद्या के आवरण के कारण विविध नामरूपों में सत्य का दीप्तिमान स्वरूप आवृत हो जाता है? वही पुरुष तत्त्वज्ञ और सम्यक्दर्शी कहा जाता है। उस अनुभव में वह स्वयं उपाधियों से परे ब्रह्म से तादात्म्य को प्राप्त होता है।एक ही आत्मा के समस्त देहों में स्थित होने से उसे भी उपाधियों के दोष प्राप्त होते होंगे। ऐसी शंका के निवारण के लिए भगवान् कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

When a man sees the whole variety of beings as resting in the One, and spreading forth from That alone, he then becomes Brahman.

Transliteration

yadā bhūtapṛthagbhāvam ekastham anupaśyati
tata eva ca vistāraṃ brahma sampadyate tadā

अनुवाद

जब मनुष्य विभिन्न भूतों के पृथक-पृथक भाव को एक ही परमात्मा में स्थित देखता है और उस परमात्मा से ही उन सब का विस्तार देखता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण समझाते हैं कि जब कोई साधक सभी प्राणियों की विविधता के पीछे छिपी एकता को देख लेता है, तो वह परम सत्य को जान जाता है। वह समझता है कि सभी जीव एक ही परमात्मा से उत्पन्न होते हैं और उसी में स्थित रहते हैं। इस प्रकार की समदर्शिता और अद्वैत दृष्टि प्राप्त होने पर मनुष्य ब्रह्म-भाव को प्राप्त कर लेता है।

Translation

When one perceives the diverse existence of living beings as centered in the One, and their expansion from That alone, then one attains Brahman.

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains that when a seeker perceives the underlying unity behind the diverse existence of all living entities, they realize the ultimate truth. They understand that all beings originate from and rest in the single Supreme Spirit. Achieving this vision of oneness and non-duality leads the individual to attain the state of Brahman.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
यदाजब
भूतजीवों के
पृथक्-भावम्पृथक-पृथक अस्तित्व को
एकस्थम्एक (परमात्मा) में स्थित
अनुपश्यतिशास्त्र के अनुसार देखता है
ततःउससे
एवही
चऔर
विस्तारम्विस्तार को
ब्रह्मब्रह्म को
सम्पद्यतेप्राप्त होता है
तदातब

Word by word

WordMeaning
yadāwhen
bhūtaof living beings
pṛthag-bhāvamthe separated existence
ekasthamsituated in one
anupaśyatione sees according to authority
tataḥfrom that
evaalone
caand
vistāramthe expansion
brahmaBrahman
sampadyatehe attains
tadāat that time