Chapter 13 · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
Bhagavad Gita 13.30
मूल श्लोक :
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः
यः पश्यति तथाऽऽत्मानमकर्तारं स पश्यतिHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जो सम्पूर्ण क्रियाओंको सब प्रकारसे प्रकृतिके द्वारा ही की जाती हुई देखता है और अपनेआपको अकर्ता देखता (अनुभव करता) है? वही यथार्थ देखता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
विभिन्न मोटर कम्पनियों के द्वारा निर्मित विभिन्न अश्वशक्ति की असंख्य कारों में से प्रत्येक वाहन का कार्य सम्पादन विशिष्ट होता है। इससे हम यह नहीं कह सकते कि इन कारों में प्रयुक्त पेट्रोल विभिन्न क्षमताओं का है। बल्ब अनेक हैं? परन्तु विद्युत् तो एक ही है। ये दृष्टान्त इस श्लोक में व्यक्त किये गये आत्मैकत्व के सिद्धान्त को भली भाँति स्पष्ट करते हैं।सब कर्म आत्मा की केवल उपस्थिति में प्रकृति से उत्पन्न उपाधियों के द्वारा ही किये जाते हैं। अब विभिन्न व्यक्तियों के कर्मों में जो भेद है? वह उनके विभिन्न शुभाशुभ संस्कारों और इच्छाओं के कारण है? आत्मा के कारण नहीं। केवल क्षेत्र या क्षेत्रज्ञ में कोई कर्म नहीं होते हैं।आत्मा अकर्ता है कर्म करने के लिये शरीरादि कारणों की और मन में इच्छा की आवश्यकता होती है? परन्तु आत्मा सर्वव्यापी? निराकार और सर्व उपाधि रहित होने से उसमें कोई कर्म ही नहीं हो सकते? तो फिर वह कर्ता कैसे हो सकता है आत्मा के अकर्तृत्व के विषय में अन्य कारण भी आगे प्रस्तुत किये जायेंगे।जो प्रकृति की क्रियाओं में आत्मा को अकर्ता जानता है? वही पुरुष वास्तव में तत्त्व को देखता है। उपाधियों के अभाव में समस्त जीवों के गुणों और कर्मों की विलक्षणता का अभाव होकर केवल परमात्मा ही स्वस्वरूप में अवस्थित रह जाता है।पुन? ज्ञानी पुरुष के सम्यक् दर्शन को दूसरे शब्दों में बताते हुये कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
He sees, who sees that all actions are performed by Nature alone and that the Self is actionless.
Transliteration
prakṛtyaiva ca karmāṇi kriyamāṇāni sarvaśaḥ
yaḥ paśyati tathātmānamakartāraṃ sa paśyatiअनुवाद
और जो पुरुष सम्पूर्ण कर्मों को सब प्रकार से प्रकृति द्वारा ही किये जाते हुए देखता है और आत्मा को अकर्ता देखता है, वही वास्तव में देखता है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि संसार के सभी कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा संचालित होते हैं। जीवात्मा अज्ञानवश स्वयं को कर्ता मान लेता है। जो व्यक्ति इस सत्य को जान लेता है कि शुद्ध आत्मा निष्क्रिय और निर्लिप्त है, वही यथार्थ दृष्टि रखता है।
Translation
And he who sees that all actions are performed in every way by nature alone, and likewise that the self is the non-doer, he indeed sees.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains that all activities in the material world are carried out by material nature (prakriti). The true self (atman) is transcendental and does not perform any action. One who realizes this distinction between the active nature and the inactive self possesses true spiritual vision.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| प्रकृत्या | प्रकृति के द्वारा |
| एव | ही |
| च | और |
| कर्माणि | कर्मों को |
| क्रियमाणानि | किये जाते हुए |
| सर्वशः | सब प्रकार से |
| यः | जो |
| पश्यति | देखता है |
| तथा | तथा |
| आत्मानम् | आत्मा को |
| अकर्तारम् | अकर्ता (न करने वाला) |
| सः | वह |
| पश्यति | वास्तव में देखता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| prakṛtyā | by nature |
| eva | alone |
| ca | and |
| karmāṇi | actions |
| kriyamāṇāni | being performed |
| sarvaśaḥ | all-around / in all respects |
| yaḥ | who |
| paśyati | sees |
| tathā | and also |
| ātmānam | the self |
| akartāram | as the non-doer |
| saḥ | he |
| paśyati | actually sees |