श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 13 · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

Bhagavad Gita 13.29

मूल श्लोक :

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्
न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

क्योंकि सब जगह समरूपसे स्थित ईश्वरको समरूपसे देखनेवाला मनुष्य अपनेआपसे अपनी हिंसा नहीं करता? इसलिये वह परमगतिको प्राप्त हो जाता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

वेदान्त हमें जगत् से पलायन नहीं सिखाता? बल्कि वह इस दृश्यमान जगत् का पुनर्मूल्यांकन करने का उपदेश देता है। सामान्यत जगत् की ओर देखने की हमारी दृष्टि हमारे प्रिय विचारों एवं भावनाओं से रंजित होती है। स्पष्ट है कि उस स्थिति में हम जगत् को यथार्थ रूप में नहीं देखते। इस अज्ञान की दृष्टि का त्यागकर ज्ञान की दृष्टि से विश्व को देखने का अर्थ वर्तमान काल के सुस्त और उदास? दुखी कुरूप जगत् में ही पूर्णता और आनन्द? दिव्यता और पवित्रता का दर्शन करना है। दुर्व्यवस्थित प्रमाणों के द्वारा परमार्थ सत्य का विपरीत दर्शन ही यह जगत् है? जो द्रष्टा जीव को ही पीड़ित करता रहता है।उपाधियों के साथ तादात्म्य करके जीवभाव को प्राप्त आत्मा जब देखता है? तब उसे नानाविध सृष्टि दिखाई देती है। भ्रान्तिजनित यह जगत् कभी उसे खिसियाते और नृत्य करते हुए तो कभी चीखते और हुंकारते हुए प्रतीत होता है। इन सब दुखपूर्ण परिवर्तनों के मध्य ही पारमार्थिक सत्य स्वरूप को पहचानने से ही सभी विक्षेपों? अर्थहीन लक्ष्यों और परिश्रमों की समाप्ति हो सकती है? क्योंकि वह परमेश्वर ही सर्वत्र समान रूप से स्थित देखता है। ज्ञान के अपने इस अनुभव के कारण फिर ज्ञानी पुरुष को कोई दुख अथवा भय नहीं होता। मिथ्या प्रेत के अधिष्ठान स्तम्भ को पहचान लेने पर पूर्व का भय और दुख समाप्त हो जाता है।वह अपने द्वारा अपना नाश नहीं करता है  पूर्व में भी भगवान् श्रीकृष्ण ने स्पष्ट वर्णन किया है कि किस प्रकार हम अपने शत्रु या मित्र बन जाते हैं। जब हमारा निम्नस्तर का अहंकारकेन्द्रित व्यक्तित्व या मन हमारी उच्चतर ज्ञानवती बुद्धि के मार्गदर्शनानुसार कार्य करने के लिए उपलब्ध नहीं होता? तब वह मन हमारा शत्रु बन जाता है। यदि वाहन के ऊपर हमारा नियन्त्रण न रहे? तो वह वाहन हमारी सेवा करने के स्थान पर हमारे नाश का ही कारण बन जाता है। जिस पुरुष ने सर्वत्र रमण कर रहे परमात्मा का दर्शन कर लिया है? उसका मन कभी भी अपनी दुष्ट छाया से परमात्मा के वैभव को आच्छादित नहीं कर सकता।इससे वह परम गति को प्राप्त होता है  आत्मअज्ञान तथा तज्जनित मिथ्याज्ञान के कारण हमारे शुद्ध आत्मस्वरूप पर आवरण पड़ा रहता है। इस अविद्या के कारण मनुष्य न केवल अपने स्वरूप को नहीं जानता? वरन् स्वरूप से सर्वथा भिन्न देहादि अनात्म उपाधियों को ही अपना स्वरूप मान लेता है। परिणामत उसका व्यवहार अनुचित और जीवन का लक्ष्य अधिकाधिक विषयोपभोग के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता। इस लक्ष्य को पाने के लिये वह ऐसे हीन कर्म करता है? जो स्वयं के लिये और समाज के लिये भी दुखकारक और हानिकारक होते हैं। वह किसी भी स्थान पर परमात्मा की महानता और कीर्ति का दर्शन नहीं कर सकता। परन्तु? जब वह विवेक वैराग्यादि साधनों से सम्पन्न होकर आत्मबोध प्राप्त करता है? तब अज्ञानसहित मिथ्याज्ञान की सर्वथा निवृत्ति हो जाती है? और वह परम गति को प्राप्त होता है।सभी जीवों के गुण और कर्मों में भेद दिखाई देने के कारण यह मानना होगा कि आत्माएं अनेक हैं? एक नहीं। इस मत का खण्डन करते हुये भगवान् कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Because he who sees the same Lord eally dwelling everywhere does not destroy the Self by the self; he goes to the highest goal.

Transliteration

samaṃ paśyan hi sarvatra samavasthitam īśvaram
na hinasty ātmanā'tmānaṃ tato yāti parāṃ gatim

अनुवाद

क्योंकि सभी जगह समान रूप से स्थित परमेश्वर को समान रूप से देखता हुआ मनुष्य अपने द्वारा अपने आप को नष्ट नहीं करता, जिससे वह परम गति को प्राप्त होता है

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण समझाते हैं कि जो व्यक्ति सभी प्राणियों में एक ही परमात्मा को समान रूप से देखता है, वह कभी भी अज्ञानवश अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मा) को हानि नहीं पहुँचाता। ऐसा समदर्शी पुरुष सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर परम गति अर्थात् मोक्ष को प्राप्त करता है। आत्म-साक्षात्कार का यह मार्ग समता की दृष्टि से ही सुलभ होता है।

Translation

Because seeing the Supreme Lord equally situated everywhere, he does not destroy the self by the self; therefore, he attains the supreme goal

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains that a person who perceives the same Supreme Lord dwelling equally in all living beings does not degrade or destroy his own self through ignorance. Such a self-realized soul, possessing the vision of equality, transcends the material world and attains the ultimate spiritual destination, which is liberation.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
समम्समान रूप से
पश्यन्देखता हुआ
हिक्योंकि
सर्वत्रसब जगह
समवस्थितम्भली-भांति स्थित
ईश्वरम्परमेश्वर को
ननहीं
हिनस्तिनष्ट करता है
आत्मनाअपने द्वारा
आत्मानम्अपने आप को (आत्मा को)
ततःउससे (इस कारण)
यातिप्राप्त करता है
पराम्परम
गतिम्गति को

Word by word

WordMeaning
samamequally
paśyanseeing
hibecause
sarvatraeverywhere
samavasthitamequally situated
īśvaramthe Supreme Lord
nanot
hinastidestroys
ātmanāby the self
ātmānamthe self
tataḥthereby
yātiattains
parāmthe supreme
gatimdestination